अल्पसंख्यक कॉलेजों को लेकर दिए शासनादेश पर इलाहाबाद HC का हथौड़ा

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कोर्ट ने कहा, अल्पसंख्यक कॉलेज के नाम पर मनमर्जी नहीं चलेगी, राष्ट्रीय व छात्रों के हितों के विपरीत नहीं होगा काम  

Allahabad-high-court-01इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार के एक और वोटबैंक से प्रभावित नीति को पलट दिया है। अखिलेश सरकार की साल 2015 में जारी शासनादेश पर रोक लगा दी है, जिसमें अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को तकनीकी कोर्स में छात्रों के प्रवेश लेने की खुली छूट दी गई थी। कोर्ट ने शासनादेश अनुच्छेद 14 एवं राष्ट्रीय व छात्रों के हितों के विपरीत करार दिया है। इस आदेश से अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थाओं को तगड़ा झटका लगा है।

न्यायमूर्ति सुनीत कुमार ने शमा परवीन गर्ल्स डिग्री कालेज आगरा की याचिका पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया है। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह अल्पसंख्यक संस्था है। अनुच्छेद 30 के तहत उसे प्रबंधन का अधिकार है। इसलिए स्वीकृत सभी सीटों पर उसे अपनी मर्जी से छात्रों का प्रवेश लेने का अधिकार है। किन्तु उसे काउंसिलिंग के छात्रों का प्रवेश देने के लिए बाध्य किया जा रहा है।

याची का कहना है कि उसे डीएल एड कोर्स की सभी सीटों पर छात्रों के प्रवेश लेने का अल्पसंख्यक शिक्षण संस्था होने के नाते अधिकार है। नियमानुसार पचास फीसदी सीट अपने समुदाय से तथा पचास फीसदी सीट केंद्रीकृत काउंसिलिंग के छात्रों से भरा जाना है। कोर्ट ने याचिका को जनहित याचिका मानते हुए संबंधित खण्डपीठ को सौंपने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने कहा कि टीएमए पाई फाउण्डेशन केस के फैसले के तहत छात्र हित देखा जायेगा। योग्य छात्रों की अध्यापक पद पर नियुक्ति से समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अल्पसंख्यक विद्यालयों को तकनीकी कोर्स में अपनी मर्जी से नहीं, मेरिट से प्रवेश देने का अधिकार है। अनुच्छेद 21 ए अल्पसंख्यक विद्यालयों पर भी लागू है जो अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था करता है। शिक्षा की गुणवत्ता कायम रखने के लिए योग्य छात्रों का प्रवेश जरूरी है। अल्पसंख्यक कॉलेज केवल पचास फीसदी सीटों पर ही अपनी मर्जी से प्रवेश ले सकते हैं। शिक्षा की गुणवत्ता के लिए शासनादेश जनहित व छात्रहित के खिलाफ है।

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