परिवर्तन से ही है प्रगति और जीवन

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“आगे बढ़ने वाले परिवर्तन से डरते नहीं, उसका समर्थन करते हैं। आकाश में सभी ग्रह गोल रूप में हैं और बेहद गतिशील हैं। इससे उनका चुम्बकत्व स्थिर रहता और उसके सहारे उनका मध्यवर्ती सहकार बना रहता है। यदि वे निष्क्रिय रहते तो अपनी ऊर्जा गंवा बैठते। जो आगे नहीं बढ़ता वह स्थिर भी नहीं रह सकता।”

planet-01प्रस्तुती-रिपोर्ट4इंडिया।

परिवर्तन प्रगति की निशानी है। परिवर्तन जहां नए प्राविधि को जन्म देता है वहीं, निय नए निर्माण, विकल्प, और गति को प्रदान करता है। वह नये चिन्तन, नये अनुभव और नये अनुभव का पथ प्रशस्त करता है। जीवन प्रगतिशील है, इसलिए उसमें परिवर्तन आवश्यक होता है और अनिवार्य भी। जबकि स्थिरता जड़ता का चिन्ह है। स्थिरता में नीरसता है, निस्तब्धता और निष्क्रियता है।

प्रगति को लेकर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति परिवर्तन से डरते नहीं, उसका समर्थन करते हैं। आकाश में सभी ग्रह गोल रूप में हैं और बेहद गतिशील हैं। इससे उनका चुम्बकत्व स्थिर रहता और उसके सहारे उनका मध्यवर्ती सहकार बना रहता है। यदि वे निष्क्रिय रहते तो अपनी ऊर्जा गंवा बैठते। जो आगे नहीं बढ़ता वह स्थिर भी नहीं रह सकता। स्थिरता पर जब संकट आता हौ तो उसके पास विकल्प के रूप में केवल विनाश ही रह जाता है। अस्तु जीवन को गतिशील रहना पड़ता है। जो निर्जीव है वह भी गतिहीन नहीं है।

युग बदलते हैं, परिवर्तन क्रम में आशा और निराशा के अवसर आते हैं और चले जाते हैं। रात्रि और दिन स्वप्न और जागृति, जीवन और मरण, शौत और ग्रीष्म, हानि और लाभ, संयोग और वियोग का अनुभव लगता तो परस्पर विरोधी है, पर अन्ततः वे एक-दूसरे के साथ गुँथे रहते हैं और दुहरे रसास्वादन का आनन्द देते हैं। ऋण और धन धाराओं का मिलन ही बिजली के सामर्थ्यवना प्रवाह को जन्म देता है।

आपत्तियाँ मनुष्य को सशक्त और जागरुक साहसी बनाती हैं। असुविधाएँ उत्साह बढ़ाती और प्रगति के लिए सुविधाएँ प्रदान करती हैं। एकाकी रहने पर दोनों अपूर्ण हैं। पूर्णता के लिए ऐसा कुछ चाहिए जिसमें अग्रगमन का उत्साह और अवरोध से जूझने का पराक्रम प्रकट होता रहे।

 

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