‘विवेकवान ही आस्तिकता के पूरे करते हैं मानदंड’

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large-black-holesप्रस्तुती-रिपोर्ट4इंडिया।
नास्तिक निरंकुश होता है, उसे उद्दंडता अपनाने में दैवी अनुशासन का भय नहीं रहता। तत्काल फल न मिलने पर वह दूरदर्शिता नहीं अपना पाता। लेकिन आस्तिकता मानव जीव में समाहित उत्कृष्टताओं का मापदण्ड है। इस मान्यता के आधार पर ही हमारी नीतिमत्ता सुरक्षित रहती है। जिसे कर्म-फल पर विश्वास होगा, पाप से डरेगा और पुण्य परमार्थ के संचय में निरत रहेगा। यही सर्वतोमुखी प्रगति और सुनिश्चित सुख शान्ति का मार्ग है।
परब्रह्म को सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय भी कहा जाता है। दूसरों शब्दों में वह उत्कृष्ट, आदर्शवादी भी है। ईश्वर उपासना का तात्पर्य है- उसी के ढाँचे में अपने गुण, कर्म, स्वभाव को ढालना। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखना। सज्जनोचित सदाशयता से अपने आपे को ओत-प्रोत करना। आस्तिकता की यही अवधारणा वास्तविक और श्रेयस्कर है। जहां वह रहेगी वहां आध्यात्मिकता भी आत्मावलम्बन के रूप में रहेंगी और व्यवहार में धार्मिकता, कर्तव्य परायणता के रूप में दृष्टिगोचर होती रहेंगी।
सच्ची आस्तिकता में साधक परमेश्वर को आत्मसमर्पण करता है। उसके अनुशासन में चेतना है, अपनी रीति-नीति ऐसी बनाता है जो ईश्वर भक्त को शोभा देती है। नाला अपने आपको जब नदी में मिलाता है तो उसी के प्रवाह में, उसी के अनुरूप बहता है। ईंधन जब अग्नि को समर्पित होता है तो अपने में आग के सारे गुण समाविष्ट कर लेता है। समर्पण ही ईश्वर भक्ति है। उसमें कामना के लिए याचना के लिए कोई गुँजाइश नहीं रहती। केवल उसी की इच्छा को समझाने, अपनाने के लिए तैयार करना पड़ता है। दृष्टिकोण में ऐसा बदलाव लाना पड़ता है कि कामनाएँ, तृष्णाएँ, महत्वाकाँक्षाएँ शेष न रहें, केवल प्रभु की इच्छा बना लेने कायाकल्प जैसा सर्वतोमुखी परिष्कृत प्रयास चल पड़े। इसकी सीधी परिणति होती है- चिन्तन में, चरित्र में, व्यवहार में आदर्शवादी उत्कृष्टता का समावेश। जीवन-क्रम में जितनी शालीनता भर चले तो समझना चाहिए कि उससे उतनी ही सार्थक भक्ति भावना सध नहीं है।
तथाकथित भक्तजन तथ्यों के सर्वथा विपरीत मानस बनाये रहते हैं और प्रतिकूल आचरण से व्यक्तित्व को भरे रहते हैं। देवताओं को जिन-तिस कर्मकाण्ड के सहारे अपना गुलाम बनाने की चेष्टा करते हैं और उनसे उचित अनुचित मनोरथ पूरे कर लेने की मनौती मनाते रहते हैं। इसी प्रयोजन के लिए छुट-पुट भेंट-पूजाएँ चढ़ाते और स्तवन के रूप में वे प्रशंसा के पुल बाँधते हैं। यह समूचे आडम्बर एक ही प्रयोजन के लिए होते हैं कि मनोकामनाएँ पूरी होने लगें। संकट टलते रहें और प्रतिकूलताओं का अनुकूलता के रूप में परिवर्तन बन पड़े, वातावरण बदले। परिस्थितियाँ अनुरूप अनुकूल ढलें।
लेकिन यह समझने की बात है कि जिसकी पात्रता नहीं है उसके लिए भी अनुग्रह मांगना न्योचित नहीं है। देवताओं के आगे कुछ पूजा-सामग्री रखकर उसके बदले में अपात्र को सपात्र नहीं बना सकते। कर्मफल का सिद्धांत महत्वपूर्ण है।
भक्ति का उद्देश्य अपने आपको देवता के प्रति देवत्व के प्रति समर्पित करना है। मनुष्य में देवत्व का उत्पादन, अभिवर्धन प्रत्यक्षीकरण करता है। इसी प्रकार भजन पूजन बन पड़ता है और उसका प्रयोजन पूरा होता है। प्रामाणिकता, पवित्रता, प्रखरता और उदार सेवा भावना के आधार पर देवता प्रसन्न होते, अनुग्रह करते और वरदान देते देखे जाते हैं। यही यथार्थता है। पर जो लोग वास्तविकता में आंखें मूँद लेते हैं और चतुरता भरी तिकड़म भिड़ाकर सस्ते प्रलोभन के बल बहुमूल्य वरदान पाना चाहते हैं उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। पूजा के छद्म में जो समय श्रम लगता है वह बेकार चला जाता है। उपचारों में नियोजित किये गये साधन भी निरर्थक चले जाते हैं।
आस्तिकता कृषि कर्म जैसी, उद्यान आरोपण जैसी प्रत्यक्ष फलदायिनी पुण्य प्रक्रिया है। उस हेतु जो बोया जाता है वह सहस्र गुना होकर फलता है, किन्तु आवश्यकता इस बात की भी है कि उसमें खाद पानी की कमी न पड़ने दी जाय। आध्यात्मिकता, आत्म-परिष्कृति खाद है, धार्मिकता, कर्तव्य परायणता पानी। जो इन दोनों की व्यवस्था नहीं करते और देव अनुग्रह का प्रतिफल पाना चाहते हैं, उन्हें अविवेकी ही कहा जायेगा। बुद्धिहीन भी।

 

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