‘सही मायने में ‘भारत भाग्य विधाता’ थे स्वामी विवेकानंद’

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Swami-Vivekananda-01Dr.-manoj-kr.-tiwaryडॉ. मनोज कुमार तिवारी/रिपोर्ट4इंडिया

भारतीय संस्कृति में जो अवधारणाएं आतीं हैं, उन अवधारणाओं के अतिरिक्त धर्म (अंग्रेजी का Religion वाला नहीं) में कुछ और भी आता है। धर्म हम पर पड़े सहज़ स्वभाव का आवरण भी है और आवरण का अनावरण भी। धर्म कारक भी है और क्रिया भी, जबकि संस्कृति केवल क्रिया है लेकिन सकर्मक क्रिया। स्वामी विवेकानंद ने वस्तुत: दुनिया को हिन्दू धर्म की इन्हीं बारीकियों से अवगत कराया और वह भी 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में।

तत्कालीन समय में भारत स्वयं औपनिवेशिक मनोभाव से ग्रस्त था। यह औपनिवेशिक मनोभाव केवल मानविकी क्षेत्र में ही नहीं बल्कि विज्ञान के क्षेत्र में भी रहा। विशेषकर ज्ञान के उस क्षेत्र में जिसने यह स्थापना दी कि ऊर्जा दो पदार्थों की है, दो विरुद्ध पदार्थों के टकराव से होती है। यह समस्त विश्व, यंत्र है और मनुष्य इस यंत्र का पालक है। या उसने कहा कि जो बलवान है उसे जीने का हक है, निर्बल को जीने का अधिकार नहीं। इसी का आधुनिक राजनीति और समाज दर्शन पर प्रभाव रहा। विवेकानंद ने इसे गलत सिद्ध किया। उन्होंने पश्चिम के फैलाए ऐतिहासिकता के आधार को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि भारतीयता भारत में पीढ़ी दर पीढ़ी साथ रहने वालों का स्वभाव है और इस स्वभाव के बनने की लंबी निरंतर प्रक्रिया ही संस्कृति है। आज से 153 साल पहले 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद भारत में अवतरित हुए। पिता विश्वनाथ दत्त कोलकाता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे, पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे वे चाहते थे कि इनके पुत्र नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम) को भी अंग्रेजी में शिक्षा दिलाकर पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रंग दें। लेकिन उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं, शायद विवेकानंदजी पर उन्हीं का प्रभाव पड़ा हो।

स्वामी विवेकानंद ने पूरे विश्व में भारत के आध्यात्म का परचम लहराया था। 122 साल पहले दुनिया के धर्मों पर हुई विश्व संसद में दिए गए स्वामी विवेकानंद के भाषण ने भारत के बारे में अमेरिका ही नहीं समूची दुनिया की सोच को बदल दिया।

वे वेदान्त और योग को पश्चिम संस्कृति में प्रचलित करने के लिए महत्वपूर्ण योगदान देना चाहते थे। विवेकानंद बड़े स्‍वप्नदृष्‍टा थे। उन्‍होंने एक नये समाज की कल्‍पना की थी, ऐसा समाज जिसमें धर्म या जाति के आधार पर मनुष्‍य-मनुष्‍य में कोई भेद नहीं रहे। उन्‍होंने वेदांत के सिद्धांतों को इसी रूप में रखा। अध्‍यात्‍मवाद बनाम भौतिकवाद के विवाद में पड़े बिना भी यह कहा जा सकता है कि समता के सिद्धांत की जो आधार विवेकानन्‍द ने दिया, उससे सबल बौद्धिक आधार शायद ही ढूंढा जा सके।

स्वामी विवेकानंद ने धर्म संसद में भारतीय धर्म की विशेषता को प्रकट करते हुए कहा कि, संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परम्परा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ; धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं; और सभी सम्प्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं। हिन्दू वर्तमानजीवी धर्म है, वह सत्य व ऋत का गठबंधन है। हिन्दू जीवन दृष्टि अनागत सुख की कल्पना में वर्तमान में विस्मृत नहीं करती, वह अनागत के वर्तमान की संतति या फैलाव की दिशा के रूप में ही स्वीकार करती है। वर्तमान केवल अतीत के सनातन शाश्वत मूल्य को भविष्यगत की यात्रा के पाथेय के रूप में सौंपनेवाला एक माध्यम है, किंतु एकमात्र माध्यम होने के कारण दोनों से अधिक महत्वपूर्ण है। यही संदेश परतंत्रता के समय भारत के लोगों को संबल प्रदान करता था। सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृति की शिक्षा ने भारतवासियों में विश्वास पैदा किया। सारी सामाजिक दूरियां को भुलाकर एकजुटता का भाव पैदा किया। विश्व धर्म संसद में उनके गीता के इस कथन को कौन भूल सकता है-

Swami-Vivekanand-Quotes-01रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ।।

‘ जैसे विभिन्न नदियां भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जानेवाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।’

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।।

‘ जो कोई मेरी ओर आता हैं, चाहे किसी प्रकार से हो, मैं उसको प्राप्त होता हूँ। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अन्त में मेरी ही ओर आते हैं।’

शिकागो की धर्म संसद से भारत लौटने पर एक मई 1897 को स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की नींव रखी। राम कृष्ण मिशन नए भारत के निर्माण के लिए अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और साफ-सफाई के काम से जुड़ गया। स्वामी विवेकानंद युवाओं के आदर्श बन गए। वर्ष 1898 में उन्होंने बेलूर मठ की स्थापना की। 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में ही स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया। उनके कहे शब्द आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा हैं, जिसका मूल मंत्र है….उठो जागो और लक्ष्य तक पहुंचने से पहले रुको मत।

जीवन के अंतिम दिन स्वामी विवेकानंद ने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा “एक और विवेकानंद चाहिए, यह समझने के लिए कि इस विवेकानंद ने अब तक क्या किया है।” प्रत्यदर्शियों के अनुसार जीवन के अंतिम दिन भी उन्होंने अपने ‘ध्यान’ करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो-तीन घंटे ध्यान किया। उन्हें दमा और शुगर के अतिरिक्त अन्य शारीरिक व्याधियों ने घेर रखा था। उन्होंने कहा भी था, ‘यह बीमारियां मुझे चालीस वर्ष के आयु भी पार नहीं करने देंगी।’ 4 जुलाई, 1902 को बेलूर में रामकृष्ण मठ में उन्होंने ध्यानमग्न अवस्था में महासमाधि धारण कर प्राण त्याग दिए।

मुझे स्वामी करपात्रीजी का एक कथन याद आता है, जब उनसे पूचा गया कि समाज में बहुत तेजी से बदलाव आ रहा है, आचार-पद्धति बदल रही है, क्या सनातन (हिन्दू) धर्म टिका रहेगा? उन्होंने कहा-जिसे जाना है, वह काल प्रवाह में चला जाएगा, पर जो जीवन को चलाता है, वह कैसे जाएगा? जो चलाता है, और जो स्वयं संचरणशील है, वही मात्र सनातन-धर्म है।

पर, आज दुर्भाग्य यह है कि देश खारिज़, राज्य खारिज़, केवल शासन की सत्ता ही अस्तित्व में है। आज देश में पूछते हैं हिन्दू हैं या सेक्यूलर। हिन्दू हैं तो सेक्यूलर हिन्दू हैं या नॉन सेक्यूलर हिन्दू। विवेकानंद के देश में केवल हिन्दू के बारे में ऐसा प्रश्न…..अर्धनास्तिक की स्थिति में पहुंच गए हैं हम। आज चुनौति है उस स्थिति से बाहर निकलने की….भारत भाग्य विधाता के पदचिन्हों पर चलने की।

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