आदर्शों-मर्यादाओं का अवतरण ‘रामनवमी’…बंदउँ सीता राम पद जिन्हीं परम प्रिय खिन्न।

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प्रस्तुती-रिपोर्ट4इंडिया संपादकीय डेस्क।
भगवान श्रीराम भारतीय साधना, धर्म की स्थापना, सभ्यता-संस्कृति, सहचरी-समन्वयवादी समाज, लोक मर्यादा आदि के बीज पूंज हैं। शाश्वत सत्य सनातनी भारतीय समाज श्रीराम से नित प्रेरणा लेता है। युगों-युगों तक प्रवाहमान भारतीय धर्म-समाज के मंत्र हैं श्रीराम, जिन्हें करोड़ों-करोड़ों लोग इस धरती पर जपते हुए मोक्ष को प्राप्त करते हैं। श्रीराम का अवतरण दिवस चैत्र रामनवमी मर्यादाओं और आदर्शों का अवतरण दिवस भी है। इसके साथ-साथ शाश्वत, सनातन और चिरंतन सत्य की अभिव्यक्ति आर्ष साहित्य और लोक साहित्य की प्रवाहमान चिंतन धारा में विविध रूपों में वर्णित हुआ है जो सत्य पर अवलंबित है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम एवं आद्यशक्ति सीता आदर्शों की स्थापना के लिए तो अवतरित हुए ही थे, साथ ही सनातन ब्रह्मा एवं शक्ति भी श्रीराम एवं सीता के रूप में लीला करने इस भूतल पर आए थे।
राम और सीता दो होते हुए भी एक थे। गोस्वामी जी कहते हैं-
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बंदउँ सीता राम पद जिन्हीं परम प्रिय खिन्न॥
मूलतः ब्रह्म के रूप में इस सचराचर जगत् में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को भारतीय धर्म-साधना परिव्याप्त समझकर सर्वोच्च सनातन होने में अपनी आस्था को व्यक्त करती है। साथ ही, एक सूक्ष्म धारणा ‘राम तथा ॐ’ की तात्विक एकता का सूक्ष्म संकेत करती है।
वस्तुतः ‘राम’ शब्द जब निराकार एवं सकल ब्रह्म के रूप में व्यवहृत होता है, तो आश्चर्यजनक रूप में राम ही ‘ऊँ’ हो जाता है। व्याकरणविदों एवं भाषाशास्त्रियों के अनुसार राम शब्द में आने वाली ‘आ’ तथा ‘अ’ स्वर ध्वनियाँ इस शब्द में आने वाली ‘र’ तथा ‘म’ व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण की दृष्टि से ही आती हैं।
‘माँडूक्योपनिषद्’ में लिखा एक प्रामाणिक सूत्र कहता है, ‘ओमित्येदक्षरम’ जिससे राम तथा ॐ की तात्विक एकता प्रमाणित होती है। महाकवि तुलसीदास भी रामचरित मानस में इसी तथ्य को पुष्ट करते हुए कहते हैं-
एकु छत्र एकु मुकुटमनिसब वरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के बरन विराजत दोउ॥
यही सत्य आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण के ‘युद्धकांड’ में राम को भगवान विष्णु (ऊँकार स्वरूप) से अभिन्न मानते हुए कहा है-
अक्षरं ब्रह्रा सत्यं च मधेवाँते च राघव, लोकाँनाँ त्वं परोधर्मो विश्वक्सेनश्चतुर्भुजः।
इस प्रकार स्पष्ट होता है कि भारतीय मनीषा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को सच्चिदानंद ब्रह्म मानकर उन्हें सर्वोच्च सनातन सत्ता के रूप में पूजती रही है। इसी तरह वह सीता को आद्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करके सर्वोच्च सम्मान देती रही है। ‘युद्धकाँड’ में ही उल्लेख आता है-
एषः सीता हरेर्माया, सृष्टिस्थित्यंतकारिणी। सीता साक्षात जगदधेतुश्चित्छवितर्जगदात्यिका॥
अर्थात् विश्व की सृष्टि, स्थिति, अंत की सूत्रधारिणी, आद्यशक्ति साक्षात महामाया सीता, जगत् का कारण और चेतना शक्ति और जगत् का रूप हैं। यही सत्य मानस के ‘बालकाँड’ में कवि तुलसी अत्यंत श्रद्धापूर्वक व्यक्त करते है-
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करी सीता नतोऽहं रामबल्लभाम्॥
भाषाशास्त्रियों के अनुसार भी सीता शब्द का अर्थ पृथ्वी से उत्पन्न है। जो निश्चय ही सृष्टि के सृजन, पोषण एवं संहार की सूत्रधार शक्ति के लिए आया है। व्याकरणविदों
एवं दार्शनिकों ने सीता शब्द की विशिष्ट व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि राम की शक्ति बनकर ही सीता अवतरित हुई है। इसी शक्ति की स्वीकृति आदि महाकवि वाल्मीकि ने रामायण में तथा महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत में सीता को ‘महालक्ष्मी’ कहकर दी है।
महाकवि तुलसीदास ने दर्शन के इसी सूक्ष्म तत्व को मनोहारी रूप में व्यक्त करते हुए ब्रह्म एवं शक्ति के सनातन ऐक्य को यूँ व्यक्त किया-
सीयाराम मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
भगवान श्रीराम की पावन जयंती रामनवमी के इस पुण्य पर्व पर युगों से हमारे सनातन विश्वास एवं आस्था के केंद्र ब्रह्म स्वरूप भगवान श्रीराम एवं आद्यशक्तिस्वरूपा भगवती सीता के अभिन्न युगल को श्रद्धापूर्वक स्मरण करें। स्नेह-आत्मीयता की राह अपनाएँ और ‘सीयाराम मय सब जग जानी’ का अमृत बाँटें।

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