संसार का मुख्य तत्व पदार्थ नहीं, ‘चेतन सत्ता’

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प्रस्तुती-रिपोर्ट4इंडिया।
जड़ प्रकृति के भीतर एक ज्ञानवान चेतना काम कर रही, चेतना ने ही पदार्थ बनाया
विज्ञान जगत अब पदार्थ सत्ता नियंत्रण करने वाली चेतन सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा है। यह खोजने में लगा है कि हर पदार्थ को गुण धर्म की रीति-नीति से नियन्त्रित रखने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है? पदार्थ को स्वसंचालित, अचेतन, सत्ता समझने की प्रचलित मान्यता अब इतनी अपूर्ण है कि उस आधार पर प्राणियों की चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता। “मिस्टीरिअल यूनीवर्स” ग्रन्थ के रचयिता सरजेम्स जीन्स ने लिखा है- चेतना पदार्थ  निर्माण प्रक्रिया में बहुत आगे बढ़ी है। वैज्ञानिक निष्कर्ष आणविक हलचलों के ऊपर शासन करने वाली एक अज्ञात चेतन सत्ता को समझने का प्रयास गम्भीरतापूर्वक कर रहे हैं।
‘‘पहले यह मान्यता थी कि जड़ जगत की चेतना ही उत्पत्ति का आधार है। भौतिक तत्वों के समन्वय से ही मन की उत्पत्ति होती है। लेकिन यह यथार्थवादी मान्यता अब बदल गई है। अब यह माना जाने लगा है कि चेतन सत्ता ही जड़ पदार्थों की उत्पत्ति करती है। इस जड़ जगत के पीछे एक विराट चेतना काम कर रही है।’’
फिजिओलॉजीकल साइकोलॉजी के लेखक मेक डूगन ने लिखा है- मस्तिष्कीय संरचना को कितनी ही बारीकी से देखा समझा जाय यह उत्तर नहीं मिलता कि पाशविक स्तर से ऊँचे उठकर मानव प्राणी अपने में उच्चस्तरीय ज्ञान-विज्ञान की धारायें कैसे बहाता रहता है और भावनापूर्ण सम्वेदनाओं से कैसे ओत-प्रोत रहता है? भाव सम्वेदनाओं की गरिमा समझते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य के भीतर कोई अमूर्तिक सत्ता भी विद्यमान है जिसे आत्मा अथवा भाव चेतना जैसा कोई नाम दिया जा सकता है।
अणु विज्ञान के आचार्य अलबर्ट आइन्स्टीन ने परमाणु प्रक्रिया का विशद् विवेचन करने के उपरान्त अपने निष्कर्ष को घोषित करते हुए कहा है- मुझे विश्वास हो गया है कि जड़ प्रकृति के भीतर एक ज्ञानवान चेतना भी काम कर रही है। सर ए. एस. एडिंग्टन का कथन है- भौतिक पदार्थों के भीतर एक चेतन शक्ति काम कर रही है जिसे अणु प्रक्रिया का प्राण कहा जा सकता है। हम उसका सही स्वरूप और क्रिया-कलाप अभी नहीं जानते पर यह अनुभव करते हैं कि संसार में जो कुछ हो रहा है वह अनायास, आकस्मिक या अविचारपूर्ण नहीं है। पी. गेईउर्स अपने ग्रन्थ ‘इवोल्यूशन’ में अपने निष्कर्ष व्यक्त करते हुए कहते हैं- सृष्टि का आरंभ जड़ परमाणुओं से हुआ और ज्ञान पीछे उपजा यह मान्यता सही नहीं है। लगता है सृष्टि से भी पूर्व कोई चेतना मौजूद थी और उसी ने क्रमबद्ध एवं सोद्देश्य रीति-नीति के साथ इस विश्व ब्रह्मांड का सृजन किया।
‘इन्ट्रोडेक्शन टू साइन्स’ पुस्तक में विज्ञान जे. ए. थामसन ने कहा है- विश्व में जीवन कब और कैसे उत्पन्न हुआ उसका विज्ञान के पास कोई उत्तर नहीं है। ख्याति प्राप्त विज्ञान वेत्ता टेण्डल ने अपने ग्रन्थ ‘‘फ्रेगमन्ट्स आफ साइन्स” में स्वीकार किया है- हाइड्रोजन, आक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस प्रभृति तत्वों के ज्ञान शून्य परमाणुओं से मस्तिष्क की संरचना हुई है। जे. वी. एस हेल्टेन का कथन है पदार्थ या शक्ति ही इस संसार का समग्र स्वरूप नहीं है। हम दिन-दिन इसी निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि एक समष्टिगत मनःतत्व समस्त विश्व पर नियन्त्रण स्थापित किये हुए है। आर्थर एच. क्रांपटन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि संसार के पदार्थों को जलते हुए ईंधन जैसा समझा जा सकता है। जड़ चेतन की ज्वलन्त गतिविधियाँ ऐसे अग्नि तत्व के साथ सम्बद्ध हैं जिसे व्यापक चेतना या आत्मा आदि किसी नाम से संबोधित किया जा सकता है।
हर्वट स्पेन्सर ने अपनी पुस्तक ‘फर्स्ट प्रिन्सीपल’ में कहा- एक ऐसे विश्वव्यापी चेतन तत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता जो साधारणतया सभी प्राणियों में विशेषतया मानव प्राणियों में जीवन की एक सुरम्य प्रक्रिया का निर्धारण करती है। प्राचीन काल के धर्माचार्य या दार्शनिक जिस प्रकार उसका विवेचन करते रहे हैं भले ही वह संदिग्ध हो, भले ही उसका सही स्वरूप अभी समझा न जा सका हो, पर उसका अस्तित्व असंदिग्ध रूप से है और वह ऐसा है जिसका गम्भीर अन्वेषण रूप से है और वह ऐसा है जिसका गम्भीर अन्वेषण होना चाहिए।
डा. गार्ल कहते हैं- संसार का मुख्य तत्व पदार्थ नहीं वरन् वह चेतन सत्ता है जो समझती, अनुभव करती, सोचती, याद रखती और प्रेम करती है। मृत्यु के उपरान्त जीवन की पुनरावृत्ति का सनातन क्रम उसी के द्वारा गतिशील रहता चला आ रहा है।
संसार के प्रमुख विज्ञान वेत्ताओं के सम्मिलित निष्कर्ष व्यक्त करने वाले ग्रन्थ “दी ग्रेट डिजाइन” में प्रतिपादन किया गया है कि यह संसार निर्जीव यन्त्र नहीं है। यह सब अनायास अकस्मात ही नहीं बन गया है। चेतन और अचेतन हर पदार्थ में एक ज्ञान शक्ति काम कर रही है। उसका नाम भले ही कुछ भी दिया जाय।
‘‘साइन्स एण्ड सोल’’ के लेखक आर. डबलिन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि प्राणि जगत के अस्तित्व को जड़ परमाणुओं की हलचल मात्र-मान बैठने से काम नहीं चलेगा। भावना, विचारणा, कल्पना और सम्वेदना जैसी तरंगें उत्पन्न करने वाली ज्ञान सत्ता को यदि अस्वीकार किया जाय तो जीवधारियों की सत्ता की सही व्याख्या ही नहीं हो सकती। प्रसिद्ध वैज्ञानिक आलिवरलाज कहते थे- ‘‘मुझे विश्वास है अब वह समय निकट आ गया है जबकि विज्ञान को नये क्षेत्र में प्रवेश करना होगा। विज्ञान अब भौतिक जगत तक ही सीमित नहीं रहेगा। चेतन जगत भी अब वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण का महत्वपूर्ण विषय बन गया है।’’
इंग्लैंड की रॉयल सोसायटी के सेक्रेटरी सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ‘सर जेम्स जीन्स’ ने लिखा है- ‘‘पहले यह मान्यता थी कि जड़ जगत की चेतना ही उत्पत्ति का आधार है। भौतिक तत्वों के समन्वय से ही मन की उत्पत्ति होती है। लेकिन यह यथार्थवादी मान्यता अब बदल गई है। अब यह माना जाने लगा है कि चेतन सत्ता ही जड़ पदार्थों की उत्पत्ति करती है। इस जड़ जगत के पीछे एक विराट चेतना काम कर रही है।’’
सर जेम्स जीन्स ने “दि न्यू बैकग्राउण्ड ऑफ साइन्स” नामक पुस्तक में यह उल्लेख किया है “उन्नीसवीं सदी में विज्ञान का मूल विषय भौतिक जगत था लेकिन अब प्रतीत हो रहा है कि विज्ञान जड़ पदार्थों से अधिकाधिक दूर होती जा रहा है।”
‘दि मिस्टीरियस यूनिवर्स” में उन्होंने लिखा है- वैज्ञानिक विषय के संदर्भ में हमने जो पूर्व मान्यता बना ली है अब उसकी पुनः परीक्षण की आवश्यकता है। जड़ जगत को जो प्रधानता दे बैठे थे- अब प्रतीत हो रहा है कि वह गौण है। जड़ जगत के पीछे एक नियामक सत्ता काम कर रही है।
प्रो. ए.एस. एडिंगटन ने कहा है- ‘‘अब विज्ञान इस निर्णय पर पहुँचा है कि समस्त सृष्टि को एक अज्ञात शक्ति गतिमान कर रही है।’’
अब विज्ञान का जड़ पदार्थों से लगाव समाप्त हो गया। चेतना, मन, आत्मा का अस्तित्व माना जाने लगा है। चेतन सत्ता ही जड़ जगत की उत्पत्ति का मूल कारण है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक हर्बर्ट स्पेन्सर ने कहा- ‘‘जिस शक्ति को मैं बुद्धि की पहुंच से परे मानता हूँ वह धर्म का खण्डन नहीं करती अपितु उसे और अधिक बल पहुँचाती है।’’
प्रसिद्ध वैज्ञानिक एलफ्रेड रसल वैलेस ने अपनी पुस्तक ‘‘सोशल इनवाइरनमेण्ट एण्ड माँरल प्रोग्रेस’’ में स्पष्ट लिखा है- “मुझे विश्वास है कि चेतना ही जड़ पदार्थों को गति प्रदान करती है।’’
सन् 1934 में “दि ग्रेट डिजाइन” नामक पुस्तक में चौदह वैज्ञानिकों ने अपना मत इस प्रकार प्रकट किया- ‘‘यह संसार चेतना रहित कोई मशीन नहीं है। इसका निर्माण अकस्मात ऐसे ही नहीं हो गया। ब्रह्मांड के सभी क्रिया-कलापों को एक चेतन शक्ति नियन्त्रित कर रही है चाहे हम उसे कुछ भी नाम दे दें।”
अलबर्ट आइन्स्टीन ने कहा है- ‘‘मैं ईश्वर को मानता हूँ। इस अविज्ञात सृष्टि के अद्भुत रहस्यों में वह ईश्वरीय शक्ति ही परिलक्षित होती है। अब विज्ञान भी इस बात का समर्थन कर रहा है कि सम्पूर्ण सृष्टि का नियमन एक अदृश्य चेतन सत्ता कर रही है।’’
जे. बी. एस. हैलडेन ने लिखा है- ‘‘अविज्ञात सृष्टि के कुछ ही रहस्यों को हम जान पाये हैं। सृष्टि को हम एक निर्जीव मशीन मात्र समझ रहे थे। यह हमारी भूल थी। वास्तव में यह सृष्टि चेतन शक्ति से सम्बद्ध है। जड़ पदार्थों का संचालन यह चेतन शक्ति ही कर रही है।
आर्थर एस. एडिंगटन ने लिखा है- ‘‘ईश्वर का अस्तित्व नहीं है यह मान्यता टूट चुकी है। चूँकि धर्म आत्म और परमात्म शक्ति से जुड़ा हुआ है। अतः धर्म का खण्डन नहीं किया जा सकता।’’
आर्थर एच. क्राम्प्टन ने कहा है- ‘‘हमारे चिंतन मनन को न केवल मस्तिष्क ही प्रभावित करता है। वरन् इससे भी अलग एक शक्ति है जो विचारणाओं को प्रेरित करती है। उस चेतन शक्ति की सम्पूर्ण जानकारी तो नहीं मिल पायी है यह लेकिन यह निश्चित है कि मृत्यु के बाद भी उस चेतना का अस्तित्व बना रहता है। (साभार-अखंड ज्योति)।

 

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