मायावती की ‘कसौटी’ पर अखिलेश!

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Akhilesh-Mayawati

गोरखपुर और फूलपुर में बीजेपी की हार के बाद बसपा और सपा के बीच साझेदारी का जो मंत्र उच्चारित हुआ, उसकी ध्वनी अब मंद पड़ने लगी है। राज्यसभा चुनाव में अपनी प्रत्याशी की हार के बाद बसपा ने फैसला लिया है कि 2019 से पहले अब किसी भी चुनाव में सपा के साथ समझौता या समर्तन नहीं होगा।  

Akhilesh-Mayawati

satyendra-singhसत्येंद्र सिंह।

उत्तर प्रदेश में राज्यसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद एक सधे हुए राजनेता की तरह बसपा सुप्रीमो मायावती ने यह ऐलान किया था कि इससे सपा-बसपा गठबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन ज्यादा दिन नहीं गुजरे कि उन्होंने इशारे-इशारे में सपा को जता दिया कि उनकी दोस्ती में कहीं न कहीं कुछ फांक है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अपने जिला और क्षेत्रीय समन्वयकों की बैठक के बाद पार्टी ने यह तय किया है कि उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनावों में वह अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय नहीं करेगी।

गोरखपुर और फूलपुर में लोकसभा उपचुनाव में बसपा के समर्थन से सपा को मिली जीत के बाद जो जमीन तैयार हुई थी, उसके आधार पर ऐसा समझा जा रहा था कि आगे भी इन दोनों दलों का गठबंधन इसी तरह काम करता रहेगा पर ऐसा नहीं हो सका। कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में होने वाले उपचुनाव में सपा या तो अकेले चुनाव लड़ेगी या किसी और दल का समर्थन लेगी, लेकिन एक बात तय है कि बसपा उसे मदद नहीं करेगी और ऐसा 2019 तक होगा। आखिर उसने ऐसा फैसला क्यों किया? अगर उसे ऐसा करना ही था, तो बीच में संपन्न राज्यसभा चुनाव से पहले कर लेती। राज्यसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी की हार के बाद उसने ऐसा फैसला किया। ऐसी स्थिति में यह पूछा जा सकता है कि इस फैसले का संबंध कहीं राज्यसभा चुनाव से तो नहीं है?

जिस तरह लोकसभा उपचुनाव में बसपा ने सपा प्रत्याशी को अपना समर्थन देकर बीजेपी प्रत्याशी की गोरखपुर और फूलपुर में हार सुनिश्चित की थी, उससे दोनों दलों के बीच गठबंधन की जमीन तैयार होती दिख रही थी। लेकिन राज्यसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी की हार ने उसमें किंचित दरार पैदा कर दी है। राज्यसभा चुनाव परिणाम के बाद मायावती ने जिस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी, उसमें सपा के प्रति उनकी नाराजगी छिपी नहीं रह सकी थी। अखिलेश यादव को अनुभवहीन बताते हुए उनका कहना था कि अगर वे अखिलेश की जगह होतीं, तो बसपा प्रत्याशी को पहली प्राथमिकता का प्रत्याशी घोषित करतीं।

गठबंधन धर्म का तकाजा भी था कि बसपा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर को सपा पहली प्राथमिकता का प्रत्याशी स्वीकार करती, क्योंकि लोकसभा उपचुनाव में दोनों सीटों पर बसपा का कोई प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ा था। लेकिन सपा ने अपने प्रत्याशी जया बच्चन को पहली प्राथमिकता का प्रत्याशी घोषित किया। स्वाभाविक है कि सपा उसे जिताने के लिए पूरा जोर लगाती और उसमें किसी तरह का कोई संदेह नहीं छोड़ती। यही हुआ भी। इसे सपा की स्वार्थपरता कहा जाए या अदूरदर्शिता, इसने गठबंधन की ओर एक दूसरे के करीब बढ़ रहे दोनों दलों के बीच में शक-संदेह पैदा करने वाली परिस्थिति निर्मित कर दी। बसपा प्रत्याशी की हार इतना बड़ा मुद्दा नहीं है, जितना बसपा प्रत्याशी को जिताने के लिए सपा का ढीला रवैया। अब तो यह भी कहा जा सकता है कि सपा को अपने प्रत्याशी को जिताने की ज्यादा चिंता थी। यह समझ में नहीं आता कि बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने प्रत्याशी को पहली प्राथमिकता का प्रत्याशी बनाने के लिए सपा पर दबाव क्यों नहीं डाला?

कहा जा सकता है कि बीजेपी विरोधी पार्टियों को आपसी गठबंधन के लिए अभी और कसरत करनी होगी। हालांकि, बसपा ने 2019 के लोक सभा चुनाव के संदर्भ में ऐसे किसी गठबंधन के प्रति गहरी प्रतिबद्धता प्रकट करते हुए सपा के साथ अपनी दोस्ती कायम रहने का संकेत दिया है, लेकिन एक रणनीति के तहत उसने अपने आपको इससे फिलहाल अलग भी कर लिया है। प्रत्यक्ष तौर पर बसपा का यही कहना है कि ऐसा उसने 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी के मद्देनजर किया है, लेकिन इसके पहले अपनी मौजूदा कवायद से उसने यह परख लिया है कि उसके समर्थक अब भी उसके साथ गहराई से जुड़े हुए हैं। इस तरह वह भावी गठबंधन में अपने लिए महत्वपूर्ण स्थान मांग सकती है। वह गठबंधन के नेतृत्व पर दावेदारी कर सकती है।

अभी तक जनता की नजरों में अखिलेश यादव ही इसके अगुआ प्रतीत हो रहे हैं। वह खुलकर सपा का विरोध नहीं कर सकती, क्योंकि मुस्लिम वोट नाराज हो सकता है। अगर आगामी उपचुनावों में सपा की पराजय होती है, तो निश्चित रूप से बसपा की सौदेबाजी की क्षमता में इजाफा होगा। इस लिहाज से कैराना लोकसभा उपचुनाव और नूरपुर विधान सभा उपचुनाव में अखिलेश यादव के राजनीतिक कौशल की एक बार फिर परीक्षा होगी। यहां अकेले बीजेपी को परास्त करना सपा के लिए आसान नहीं होगा। ऐसे में अगर वह कांग्रेस और रालोद के साथ गठबंधन कर लेती है, तो वह बीजेपी को मजबूती से टक्कर दे सकती है। दूसरी ओर बीजेपी को भी अपनी पिछली हार का बदला चुकाने का मौका मिल सकता है। लेकिन इस बार बसपा की निष्क्रियता के कारण यहां गोरखपुर और फूलपुर जैसे समीकरण नहीं रहेंगे। बीजेपी के सामने फिर विपक्ष की रणनीति को भांपने में समस्या आ सकती है। वैसे कैराना की सामाजिक परिस्थिति भी गोरखपुर और फूलपुर से अलग है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)।

 

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