आयुर्वेद में शरीर शोधन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण

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जिस प्रकार वास्तविक तौर पर ज्ञान का निर्माण होता नहीं, प्रत्युत्तर ज्ञान का सात्विक एवं विमल बुद्धि में प्रादुर्भाव होता है। ठीक उसी प्रकार आयुर्वेद कहता है कि स्वस्थ रहने के लिए स्वास्थ्य या शरीर का संवर्द्धन करना जरूरी है।

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रिपोर्ट4इंडिया संपादकीय डेस्क।

आयुर्वेद मात्र प्राचीन चिकित्सा विज्ञान ही नहीं है, बल्कि वह जीवन दर्शन भी है। आयुर्वेद शरीर के स्वास्थ्य संरक्षण के साथ-साथ व्यापक रूप से मानव जीवन के आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक पक्षों को भी संबोधित करता है। आयुर्वेद के विशेषज्ञ ऋषि-मुनियों और उपासकों ने जीवन को मौलिक रूप से प्रतिपादित करने की खोज की।

एक बार आयुर्वेद के मर्मज्ञ विद्वान आचार्य अग्निवेश से उनके शिष्यों ने पूछा- भगवन् आप कहते हैं कि रोग निवारण अकेला ही काफी नहीं, दुर्बलता मिटाने के लिए स्वास्थ्य का संवर्द्धन करना भी जरूरी है। तो, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि केवल स्वास्थ्य को बढ़ाकर रोग का समूल नाश किया जा सके।

इस पर आचार्य अग्निवेश ने बताया कि किसी भी पोषक तत्व की उपयोगिता तभी है, जब विजातीय द्रव्यों को शरीर से हट जाए अथवा  हटा दिया जाए। इसीलिए आयुर्वेद में शरीर शोधन की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी गई है और उसके बाद स्वास्थ्य−निर्माण को। अगर शरीर शोधन न किया गया, तो रोग अपनी जड़ जमाए बैठा रहेगा और शेष उपचार तो मात्र बाह्य उपचार ही मात्र बनकर रह जाएंगे।

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