BIHAR : खुद मरणासन्न है सासाराम जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल

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सदर अस्पताल के ओपीडी और ऑपरेशन रूम को देख कर आप यह नहीं कह सकते यह अस्पताल होने की सामान्य प्रक्रिया को भी पूरा करता हो, आखिर जिले के साढ़े 29 लाख से अधिक लोगों का स्वास्थ्य किसके भरोसे?

सासाराम/रिपोर्ट4इंडिया। सरकार या अधिकारी चाहे कितना ही दावा करे कि जिले के सरकारी अस्पतालों की स्थिती में सुधार हुआ है, सरकार मरीजों को बेहतर ईलाज और सुविधाएं मुहैया करा रही है, ये दावे निहायत खोखले और झूठे हैं। अगर अधिकारियों का यह मानना है कि जिले के साढ़े 29 लाख लोग बीमार ही नहीं पड़ते हों, उन्हें कभी ऑपरेशन की जरूरत ही नहीं पड़ती हो या फिर उनकी बीमारी ऐसी नहीं कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़े, तो फिर  बात ही अलग है।

कबाड़ बना सदर अस्पताल का ऑपरेशन रूम।
कबाड़ बना सदर अस्पताल का ऑपरेशन रूम।

हकीकत यह है कि प्रतिदिन केवल सासाराम के निजी अस्पतालों में करीब 8-10 हजार से ज्यादा लोग अपना इलाज कराते हैं, करीब एक हजार लोग भर्ती होते हैं। और रोजाना करीब सात हजार लोग वाराणसी इलाज कराने के लिए जाते हैं। पूरी तरह से कृषि पर आधारित गरीब लोग सरकारी अस्पताल की नष्ट व्यवस्था के कारण लोग रोजाना लाखों रुपए निजी अस्पतालों और डॉक्टरों को देते हैं। इसके चलते लोग अपने सामान्य खाने-पीने के साधनों में कटौती करते हैं, बच्चों की पढ़ाई व्यवस्था में कटौती करते हैं, अंतत: गरीबी के दलदल में धंसते चले जाते हैं। यहां परेशानी यह है कि व्यवहार में सरकार सामान्य की इलाज की व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं करा पा रही है और लाचार लोगों के पास लूटने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है।

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ओपीडी में डॉक्टर के इंतजार में कुछ मरीज।
आईसीयू में बाइक के साथ आराम फरमाते कर्मचारी।
आईसीयू में बाइक के साथ आराम फरमाते कर्मचारी।

सासाराम जिले का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल है सदर अस्पताल। कागजों पर चाहे सारी व्यवस्था भले ही दुरुस्थ हो लेकिन हकीकत तो पूरी सरकारी व्यनस्था को ही कटघरे में खड़ा करती है। सदर अस्पताल में आप जाइए अस्पताल खुद ही बीमारी का घर बना पड़ा है। सदर अस्पताल के ओपीडी से लेकर आपरेशन रूम तक एक भी ऐसी व्यवस्था नहीं है, जो अस्पताल होने की यह प्रक्रिया को पूरा करता हो, सिवाय जगह-जगह नेम प्लेट और लाचार मरीजों के अस्पताल में आने के। व्यवस्था का हाल देखें तो, अस्पताल और गंदगी एक दूसरे का पूरक है। आपरेशन रूम की हालत कबाड़ की तरह है। सफाई का नामोंनिशान नहीं। परत दर परत धूल की चादरें फैली है।

सदर अस्पताल में बेहतर ईलाज के नाम पर बना आईसीयू हॉल इस गर्मी में ब्यालर को भी फेल कर रहा है। रही सही कसर आपातकालीन वार्ड में बेड की जगह बाइक से पूरा हो रहा है। चूकि, कहने और कागजों पर दिखाने के लिए तो आईसीयू बन गया, उसका नामकरण भी हो गया पर वहां इलाज की कोई व्यवस्था नहीं। वहीं पर अस्पताल के कर्मचारी सोते, मनोरंजन करते मिल जाएंगे वह भी अपनी बाइक के खोने के बेफिक्री के साथ, चूकि उनका बाइक भी तो आईसीयू में ही आराम फरमा रहा है। न डॉक्टर रूम में कोई व्यवस्था, कहीं खिड़की का सीसा गायब है तो कहीं दरवाजे से पर्दा। टॉयलेट का हाल तो और भी बुरा।  शायद सड़क के किनारे भी वैसी बदबु न आए। पर हाल बेहाल मरीज इन सारी कुव्यवस्थाओं को झेलने को मजबूर है। और उनके पास चारा भी नहीं।

 

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