नदी बीच पतीले में तैरती ‘जिंदगी और जानकारी’! (वीडियो)

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Students in Assam cross the river using aluminium pots to reach their school.

यह एक ऐसा नज़ारा है जिसे आप देख राजनीति व विचारों के विभिन्न ताने-बाने बुन सकते हैं। आजादी के बाद करीब सात दशक से पूर्वोत्तर की जिंदगी ऐसे ही तैरती रही है, जैसे बच्चे तैर रहे हैं, शिक्षा व ज्ञान के लिए। शर्मनाक यह कि, जिंदगी के जोजख़ से पार निकलने को पहले जिंदगी दाव पर लगाने का दर्द सरकारी सिस्टम से मासूम तक को दिया जा रहा।         

असम के बिश्वनाथ जिले में नाद्वार में एल्युमिनियम के टब में बैठ कर नदी पार कर स्कूल जाने को विवश बच्चे।Students  in Assam cross the river using aluminium pots to reach their school.

मनोज कुमार तिवारी/रिपोर्ट4इंडिया।

नई दिल्ली। इसमें शक नहीं कि सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्वोत्तर के विकास के लिए बड़ी रेखा खींची है। यह भी सच है कि आजादी के बाद पिछले सात दशक में जितना पैसा पूर्वोत्तर के संरचनात्मक विकास पर खर्च किया गया, उसका करीब 40 फीसद (करीब ढाई लाख करोड़ रुपए की विभिन्न परियोजनाएं) मात्र बीते चार साल में लगाए गए। इन सबके बावजूद कभी-कभी ऐसा दृश्य भी सामने आता है जिससे ये सारी उपलब्धियां बेमानी लगने लगती है।

विडंबना यह है कि योजनाओं की घोषणा और सरकारी सिस्टम की लूट-खसोट रेलवे ट्रैक की तरह साथ-साथ आज भी द्रूत गति से चल रही है। सरकारी योजनाएं मंत्री, अधिकारी-कर्मचारियों के लूट के बड़ा जरिया हैं। राजीव गांधी (एक रुपए में 15 पैसा) से लेकर शिवपाल यादव (घूस कमाओ लेकिन काम करो) की नसीहत पर गौर करें तो स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार और लूट-खसोट इस देश का व्यवहारिक घरातल है। बजट ऐसा बने की 100 का काम 1000 में, जिसमें 900 की लूट की पूरी छूट, फिर भी सौ का काम मात्र 50 रुपए वाला ही दिखे।

हकीकत में देश में जितने भी आईएएस-आईपीएस अधिकारी हैं, उनके बेटे-बेटी विदेशों में पढ़ते हैं, सारे अधिकारी कई-कई बार विदेशों का दौरा करते हैं। देश व दुनिया के कई शहरों में तमाम जमीन-जायदाद के साथ जीवन के ऐशो-आराम का आनंद उठाते हैं। फिर भ्रष्टाचार पर रोक को लेकर पर्देदारी का काम सीवीसी, विजिलेंस आदि सारी नौटंकियों के जिम्मे है जो अपने से नहीं शिकायत पर अंतत: मामला रफा-दफा करते हैं। काश, शहरी वाम-चरमपंथ नक्सलवाद पर सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायधीश की चिंता का ‘सेफ्टी वॉल्व’ इस सड़े सिस्टम की तरफ भी होता?

अब लौटते हैं उस ‘रागदेस’ की ओर, जिसके उपरोक्त लंबी पृष्ठभूमि के मार्फत सिस्टम की सड़ांघ को सूंघते रहे थे। देश में करीब एक दशक से लागू हुए शिक्षा का अधिकार से लेकर प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना तक की कहानी कमोवेश बहुत ज्यादा बदली नहीं दिखती है। अब तो शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की बात भी जाने लगी है। परंतु, सरकारी स्कूलों और बच्चों की जो हालत है उससे स्पष्ट है कि योजनाएं सबसे पहले खाने-कमाने का ही दर्पण है …इस खाने-कमाने के प्रयास में कुछ बदल गया तो उसकी बला से। आखिर, हर साल नागरिकों की जेब से उगाहे जा रहे लाखों हजार करोड़ रुपए इन्हीं योजनाओं के बल पर ही तो ठिकाने लगेंगे।

वीडियो और तस्वीर पर गौर करें जो पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम की है। यह चलचित्र कहां और किस पर सवाल उठाते हैं, बताने की जरूरत नहीं। असम के बिश्वनाथ जिले में नाद्वार में प्राथमिक स्कूल में पढ़ने जाने वाले बच्चे जान हथेली पर रखकर शिक्षा प्राप्त करने की कोशिश करने को मजबूर हैं। बच्चों को यहां सरकारी स्कूल जाने के लिए एल्यूमिनियम के पतीले में बैठकर नदी पार करनी पड़ती है। सरकारी स्कूल ड्रेस में घर से तैयार होकर बच्चे नदी के तट तक आते हैं और पतीले में बैठकर नदी के दूसरी तरफ स्कूल पहुंचते हैं। यहां जीवन और मौत के बीच का फासला बस पतीले के लुढकने तक का है।

इस वीडियो के सामने आने पर स्कूल के शिक्षक जे. दास को डर लगता है बच्चों को इस तरह नदी पार करते देख, लेकिन नाव उपलब्ध कराने को लेकर उन्होंने  वैसा प्छरयास नहीं किया जैसा कि कभी-कभार सेलरी नहीं मिलने पर वे सेलरी पाने का प्रयास करते हैं।

बच्चों का वीडियो सामने आने के बाद इलाके के बीजेपी विधायक प्रमोज बोर्थकुर कहते हैं कि वे इसे देखकर शर्मिदा हैं। इलाके में लोक निर्माण विभाग की एक भी सड़क नहीं है, लेकिन टापू पर स्कूल बन गया, यह भी उन्हें पता नहीं। अब नाव उपलब्ध कराने की और स्कूल शिफ्ट करने की बात कह रहे हैं।

कुछ समय पहले टीवी पर हम एक विज्ञापन अक्सर देखते रहे हैं कि “अपनी बीटिया छुटकी को नाव में बैठाकर पिता स्कूल के लिए नाव से नदी पार करा रहा होता है। नदी में नाव खेने के दौरान वह छुटकी से कहता है, तुम पढ़लिख कर जब अफसर बनो तो नदी पर पुल बनाना नहीं भूलना। तब छुटकी कहती है, नहीं पापा मैं पुल नहीं, स्कूल को ही गांव में ले जाऊंगी…।” वह विज्ञापन था और यह हकीकत। विधायकजी स्कूल शिफ्ट कराने की बात कह रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल उस सरकारी अमले को लेकर है जिसमें डीएम, एसडीएम, बीडीओ, डीईओ (जिला शिक्षा अधिकारी) आदि अधिकारी …क्या अबतक झख मार रहे थे। अफसोस कि 70 साल बाद भी यह सिस्टम अपने से विलाप के अलावा नागरिकों को कुछ भी देने की औकात नहीं रखता है।

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