बोलने को ‘मधुमय’ बनाना सांस्कृतिक

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पुराणों, शास्त्रों, भारतीय दर्शन और साहित्य में संवाद की लंबी परंपरा है। इस परंपरा ने भारतीय समाज को निरंतर गतिशील रखा और इसी निरंतरता में सांस्कृतिक तत्वों का विकास हुआ।

प्रस्तुती- रिपोर्ट4इंडिया/ धर्म-दर्शन डेस्क।

संस्कृति व सभ्यता के विकास में बोले गए वाक्यों की मुख्य भूमिका है। समाज में निरन्तर संवाद चलता है। दुनिया का सबसे प्राचीन लिखित पुस्तक ऋग्वेद से लेकर पुराण-उपनिषद सब अपने पाठकों से बातें करते हैं। कोई प्रश्न पूछता है तो कोई जवाब देता है। विकासवाद की यह भारतीय थ्यूरी है। मनुष्य ही नहीं प्रकृति के सारे तत्व, जीव-जंतू सभी बातें करते हैं। छान्दोग्य उपनिषद के पात्र गायों से बातें करते थे। आकाशचारी हंसों की बातें सुनते थे।

मनुष्य बोलने के साथ लिखते भी हैं। बोलना जीवंत सम्बोधन है। श्रोता सामने होते हैं। वक्ता श्रोता में सीधा संबंध होता है। लिखने में श्रोता सामने नही होते। लेखक-पाठक सम्बन्ध अप्रत्यक्ष होते हैं। लेखन में संशोधन की गुंजाइश रहती है। बोलने में संशोधन के अवसर नहीं होते। भाषण तात्कालिक स्मृति और अनुभूति की अभिव्यक्ति होते हैं।

ऋग्वेद से लेकर सम्पूर्ण वैदिक वांग्डमय ऋषि कथन है। तब लिपि का आविष्कार नहीं हुआ था। आश्चर्य है कि वेद और प्राचीन उपनिषद् भी सम्पादित संशोधित से ज्यादा व्यवस्थित जान पड़ते हैं। ऋग्वेद के तमाम सूक्तों में अनेक विषय मिले हुए हैं। इन्हें शिष्यों ने आचार्यो से सुना। उन्होंने इसी परम्परा को आगे बढ़ाया। वैदिक ज्ञान ‘‘श्रुति’’ कहा गया है। पुराणों में भी श्रुति परंपरा का दर्शन है। पुराण ‘‘सूतोवाच’’-सूत ने कहा’’ से शुरू होते हैं। गीता में भी ‘‘धृतराष्ट्र ने पूछा, संजय ने कहा। अर्जुन ने पूछा – श्रीकृष्ण बोले’’ आदि वाक्य है।

यूनानी दर्शन में प्लेटो का ‘‘डायलाग’’ विख्यात है। सुकरात बोलते थे, उनके पहले थेल्स भी। भारतीय प्राचीन साहित्य में संवाद की परंपरा है। महाभारत के तमाम प्रसंगों में ऊॅट, पक्षी, सांप आदि भी संवादरत हैं। नारद तो ऋग्वेद से लेकर तुलसीदास की रामचरितमानस में भी उपस्थित हैं। वे दिलचस्प संवादी हैं। महाभारत में वे युधिष्ठिर से बातें करते हैं। युधिष्ठिर यक्ष प्रश्नों के उत्तर देते हैं। कोई कह सकता है कि महाभारत लिखी गई है। ऐसा सही हो सकता है लेकिन महाभारतकार भी संवादप्रिय है। उन्हें बोले गये प्रसंगों में रूचि है।

समाज का निरंतर विकास हुआ है। इसी निरंतरता में सांस्कृतिक तत्वों का भी विकास हुआ है। संस्कृति व सभ्यता के विकास में बोले गए वाक्यों की मुख्य भूमिका है। समाज में निरन्तर संवाद चलता है। यह संवाद जारी है।

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