वर्तमान सियासत को अबूझ पहेली है नरेंद्र की ‘राजनीतिक दूरदर्शिता’

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‘पीएम मोदी के लिए उप्र अहम हैं। वे अक्सर इसका जिक्र भी करते रहे हैं कि उप्र से ही उनकी सरकार को स्थायित्व प्राप्त हुआ। वे जानते हैं कि लोकसभा में उप्र की जीत ने जहां मुलायम सिंह यादव व मायावती को जमीन पर ला दिया वहीं, कांग्रेस को भी राज्य से बेदखल कर दिया गया है। लोकसभा चुनाव का ही प्रभाव है कि राहुल गांधी को सपा के नीचे आना पड़ा। साथ ही, यह सबसे अहम है कि पीएम मोदी उप्र को केवल 2014 और 2017 तक ही सीमित कर नहीं देखना चाहते। इससे आगे 2022 तक वे इस राजनीतिक स्थिति को बरकरार रखना चाहते हैं। वाराणसी में प्रचार व रोड शो को लेकर जो विपक्षी आलोचना कर रहे हैं शायद नरेंद्र मोदी के इस दूरदर्शिता को नहीं समझ रहे हैं।’

डॉ. मनोज कुमार तिवारी।

वाराणसी/रिपोर्ट4इंडिया। बनारस का तकिया कलाम है ‘का रज़ा बनारस’। यह बनारसी लोगों की मिज़ाज़ में ‘समर्थन-प्रेम’ का समर्पण तो है ही ‘सौ खून माफ’ का स्वर भी है। इस उक्ति को बस बनारस के लोग समझ सकते हैं। इसमें दो राय नहीं कि जिस प्रकार से ढाई दशक से भी ज्यादा समय से बनारस अपनी पहचान सहेजने तक को मोहताज़ रहा, सत्ता-शक्ति के नज़र-ए-इनायत को तरसता रहा है। इन 25-27 वर्षों में बनारस का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हुआ। नया कुछ हुआ नहीं। लेकिन, मोदी के पीएम बनने और बनारस से सांसद बने रहने के निर्णय के बाद से बनारस के लोगों में परिवर्तन की एक ललक हिलोरें मारती रही है। पिछले 30 माह में कई बार पीएम ने वाराणसी का दौरा किया। डीजल रेल कारखाना के आधुनिकीकरण से लेकर, वाराणसी रिंग रोड व बाबतपुर हवाई अड्डा से लेकर शहर तक फ्लाई सड़क निर्माण, बिजली की पुरानी स्थिति में परिवर्तन और अन्य कई बड़े प्रोजेक्ट हैं। सफाई के साथ पर्यावरण को बनाए रखने के लिए वाराणसी में ई-रिक्शा व ई-स्टीमर के चलन को भी पीएम ने बढ़ाने का प्रयास किया है।
वाराणसी पूर्वांचल का हृदय स्थल है, केंद्र है। यहां की राजनीतिक गतिविधियां पूरे पूर्वांचल में अपना असर रखतीं है। पांचवें चरण में 39 सीटें दाव पर हैं। 2012 के चुनाव परिणाम की चर्चा करें तो बीजेपी को मात्र 4 सीटें ही मिलीं थी। 2014 के बाद वाराणसी को गढ़ बनाने के बाद बीजेपी व पीएम का पूरा प्रयास है कि इस चरण में ज्यादा से ज्यादा सीटें अपनी झोली में डालीं जाए।
प्रो. राकेश पाण्डेय
प्रो. राकेश पाण्डेय
“अखिलेश के पांच साल के शासन काल की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्तर प्रदेश में जो नए जाति समीकरण-एकीकरण व गुटबंदी बनी है वह अखिलेश के पक्ष में जाती नहीं दिख रही। …और यह परिवर्तन मात्र अखिलेश के सत्ता-संचालन के चलते ही पैदा नहीं हुई है बल्कि, बीजेपी ने 2014 के बाद उनके काउंटर को न केवल नए जाति समीकरण गढ़ा बल्कि, खूबसूरती से उसे अपने पक्ष में करने का प्रयास भी किया । ”  
स्थानीय सांसद होने के नाते भी पीएम पूरा प्रयास है कि पूर्वांचल में इस चुनावी चरण के चक्रव्यूह का अंतिम घेरा तोड़ विजयश्री को प्राप्त करें। साथ ही, पीएम मोदी का अथक कार्य करने का एक तरीका है। वे बड़े चुनाव प्रचार और भाग-दौड़ को बड़ी सफलता के साथ बिना किसी थकावट के पूरा करते हैं। पीएम के लिए चुनाव के इस आखिरी ‘चक्रव्‍यूह’ को भेदने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार दूसरे दिन वाराणसी के सड़कों पर हैं।
पीएम मोदी के लिए उप्र सबसे अहम हैं और वे अक्सर इसका जिक्र भी करते रहे हैं कि उप्र से ही उनकी सरकार को स्थायित्व प्राप्त हुआ। और ये जानते हैं कि लोकसभा में उप्र की जीत ने जहां मुलायम सिंह यादव व मायावती को जमीन पर ला दिया वहीं, कांग्रेस को बेदखल कर दिया। लोकसभा चुनाव का ही प्रभाव है कि राहुल गांधी को सपा के नीचे आना पड़ा। इसके साथ ही, यह सबसे अहम है कि पीएम मोदी उप्र को केवल 2014 और 2017 तक ही सीमित कर नहीं देखना चाहते। इससे आगे 2022 तक वे इस राजनीतिक स्थिति को बरकरार रखना चाहते हैं।
बीएचयू के सामाजिक विज्ञान संकाय के प्रो. राकेश पाण्डेय इस तथ्य को स्वीकार कर कहते हैं कि अखिलेश के पांच साल के शासन काल में प्रतिक्रियास्वरूप उत्तर प्रदेश में जो नए जाति समीकरण-एकीकरण व गुटबंदी तैयार हुई है, वह अखिलेश के पक्ष में जाती नहीं दिख रही है। …और यह परिवर्तन केवल अखिलेश के सत्ता-संचालन के चलते ही पैदा नहीं हुई है। बल्कि, बीजेपी ने 2014 के बाद अखिलेश के काउंटर में न केवल नए जाति समीकरण को गढ़ा है, बल्कि खूबसूरती से उसे अपने पक्ष में करने का प्रयास भी किया है।
बीजेपी की बदलती रणनीति के तहत देखा जा सकता है कि जहां कांग्रेस ने उप्र विस चुनाव में अपनी योजना में ब्राह्मण मत को अपने पक्ष में करने को शीला दीक्षित को प्रस्तुत किया वहीं, बीजेपी ने ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी की जगह पिछड़ी जाति के केशव प्रसाद मौर्य को खड़ा कर दिया। जब ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस-सपा साथ आए तो प्रधानमंत्री ने चुनाव कमान खुद संभाल ली। पीएम मोदी के वाराणसी में रोड शो और तीन दिवसीय कार्यक्रम की आलोचना करने वाले इसे सीमित संदर्भ में, वर्तमान चुनाव के पहलू से देख रहे हैं …दूर को जाती संदेश को  महसूस नहीं कर रहे।

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