रामलीला में धर्मसभा : जो भी हो…राम मंदिर के बिना बीजेपी की ‘खैर’ नहीं!

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दिल्ली रामलीला मैदान में धर्मसभा सार

राम मंदिर निर्माण पर मोदी सरकार को दो टूक। केंद्र और प्रदेश में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार के बाद भी राम मंदिर निर्माण नहीं होना अफसोसनाक। लोकतंत्र में कोर्ट में भावना की दलील ठीक नहीं बल्कि जनता की भावनाओं को पूरा करने की नैतिक जिम्मेदारी लोकतांत्रिक सरकार की।  

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मनोज कुमार तिवारी/रिपोर्ट4इंडिया। 

नई दिल्ली। दिल्ली का रामलीला मैदान राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर एक बार फिर जनमत का गवाह बना। खचाखच भरा रामलीला मैदान में रविवार को धर्मसभा ने स्पष्ट किया कि धर्म के नाम पर देश के विभाजन के बाद यहां जिस प्रकार की राजनीति और लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्थापित की गई, उसमें बीते 70 साल के बाद अयोध्या  में राम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दू जनमत के पास वर्तमान से बेहतर अवसर नहीं मिल सकता। लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह देशवासियों की भावनाओं के मुताबिक व्यवस्था बनाए व राजकाज चलाए।

हालांकि, इस धर्मसभा में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने राम मंदिर पर अपना वादा पूरा करने की जवाबदेही को लेकर बातें की पर वह सरकार की तरफ भी मुखातिब दिखी। आरएसएस के सरकार्यवाहक भैय्याजी जोशी ने कहा, हम शांति से ही निर्माण चाहते हैं। संघर्ष करना होता तो इतना इंतजार नहीं करते। सभी  कारात्मक पहल करें, हमारा किसी से संघर्ष नहीं। राम राज्य में ही शांति है और सभी चाहते हैं भव्य राम मंदिर बने। उन्होंने कहा, संविधान का रास्ता है और हमारी अकांक्षा है कि कानून बनाकर राम मंदिर की बाधाएं दूर हों। न्यायालय से भी अपेक्षा है कि वह राम जन्मभूमि का सम्मान करें।

परंतु, संत समाज में आक्रोश स्पष्ट दिखा और उन्होंने कहा कि मोदी सरकार को इसी कार्यकाल में मंदिर निर्माण का अपना वादा पूरा करना होगा। स्वामी परमानंद ने सरकार को सीधी चेतावनी भी। उन्होंने कहा, यदि पीएम नरेंद्र मोदी राम मंदिर निर्माण के अपने वादे को पूरा नहीं करते हैं तो उन्हें दोबारा सत्ता में नहीं आने देंगे। हम न तो कठपुतली हैं और न ही आपसे डरते हैं।

राम मंदिर आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लेने वाली साध्वी ऋतम्भरा ने भी कहा कि देश में शांति के लिए राम मंदिर का शीघ्र निर्माण जरूरी है।उन्होंने हिंदुओं से एकजुट होने की अपील करते हुए कहा कि वो एक हों वरना उन्हें उनका हक नहीं मिलेगा। उन्होंने कहा, हिंदुओं में परेशानी यह है कि वह जातियों के नाम विभक्त हैं। केंद्र में मोदी और यूपी में योगी की सरकार है। योगीजी ने अयोध्या को रौशन करने का काम किया, लेकिन वह उन्जाहें पता है कि जब तक रामलला अपना घर नहीं मिलेगा, तबतक किसी को शांति नहीं मिल सकती।

दो दिन बाद ही संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो रहा है। सबकी निगाह संसद के इस सत्र पर होगा। यह भी कि क्या सरकार राम मंदिर को लेकर कोई कानून लाएगी या फिर कोर्ट के रूख का इंतजार करेगी? वैसे, इस मुद्दे पर बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि वे जनवरी तक कोर्ट के रूख को देखेंगे।

परंतु, संत समाज राम मंदिर निर्माण को लेकर चिंतित है। मरहूम हाशिम अंसारी अगर जिंदा होते तो यह मामला सुलझ सकता था। वे अपने जीवन के अंतिम दिनों में रामलला को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर चुके थे। तत्कालीन उप्र के सीएम अखिलेश यादव ने उन्हें उनके बेटे इकबाल अंसारी के बलबूते उन्हें चुप कराया। परंतु, आज इकबाल अंसारी स्व. हाशिम अंसारी के इच्छा को किनारे कर  फिलहाल कुछ कट्टर सुन्नियों के हाथों में खल रहे हैं और मंदिर पर उनका स्वर लगातार अहंकारी व तल्ख दिख रहा है।

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