शौर्य, मनोबल, धर्मबल, विद्या, चातुर्य शक्तियों का सामूहिक नाम ‘दुर्गा’

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ॐ गिरिजायै विद्महे, शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥

व्यक्ति के अन्दर परिवार एवं समाज में असुर प्रवृत्तियों की वृद्धि ही अनर्थ पैदा करती है। जिन कमजोरियों के कारण उन पर काबू पाने में असफलता मिलती है, उन्हें शक्ति साधना द्वारा समाप्त करने के लिए योजना बनाने- संकल्प प्रखर करने तथा तदुनसार क्रम अपनाने की प्रेरणा का पर्व विजयादशमी है।   

रिपोर्ट4इंडिया धर्म-संस्कृति डेस्क।

दशहरा शौर्य का, स्वास्थ्य का पर्व है। इस दिन हम अपनी भौतिक शक्ति, मुख्यतया शस्त्र और स्वास्थ्य बल का लेखा- जोखा करते हैं। अपनी शक्तियों को विकसित एवं सामर्थ्ययुक्त बनाने के लिए दशहरा पर्व प्रेरणा देता है।

वैसे इस पर्व के साथ अनेकों कथाएँ जुड़ी हुई हैं; लेकिन मुख्यतः दुर्गा, जो शक्ति की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसका इतिहास अधिक महत्त्व रखता है। कथा है कि ब्रह्माजी ने असुरों का सामना करने के लिए सभी देवताओं की थोड़ी-थोड़ी शक्ति संगृहीत करके दुर्गा अर्थात् संघशक्ति का निर्माण किया और उसके बल पर शुम्भ-निशुम्भ, मधुकैटभ, महिषासुर आदि राक्षसों का अन्त हुआ। दुर्गा की अष्टभुजा का मतलब आठ प्रकार की शक्तियों से है। शरीर- बल, विद्याबल, चातुर्यबल,धनबल,शस्त्रबल, शौर्यबल, मनोबल और धर्म- बल इन आठ प्रकार की शक्तियों का सामूहिक नाम ही दुर्गा है। दुर्गा ने इन्हीं के सहारे बलवान् राक्षसों पर विजय पायी थी।

समाज को हानि पहुँचाने वाली आसुरी शक्तियों का सामूहिक और दुष्ट व्यक्तियों का प्रतिरोध करने के लिए हमें संगठन शक्ति के साथ-साथ उक्त शक्तियों का अर्जन भी करना चाहिए। उक्त आठ शक्तियों से सम्पन्न समाज ही दुष्टताओं का अन्त कर सकता है, समाज द्रोहियों को विनष्ट कर सकता है, दुराचारी षड्यन्त्रकारियों का मुकाबला कर सकता है।

लंका पर विजय के बाद श्रीरामचंद्र माता सीता और भाई लक्ष्मण श्रीहनुमत, सुग्रीव विभिषण सहित अयोध्या पहुंचे।

दशहरा का पर्व इन शक्तियों का अर्जन करने तथा शक्ति की उपासना करने का पर्व है। स्मरण रहे संसार में कमजोर, अशक्त व्यक्ति ही पाप-बुराई को प्रोत्साहन देते हैं। जहाँ इस तरह के व्यक्ति अधिक होंगे, वह समाज अस्त-व्यस्त एवं नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा। वहाँ असुरता, अशान्ति अन्याय का बोलबाला होगा ही।

दशहरे पर भगवान् राम द्वारा रावण पर विजय की कथा सर्वविदित है। व्यक्ति के अन्दर परिवार एवं समाज में असुर प्रवृत्तियों की वृद्धि ही अनर्थ पैदा करती है। जिन कमजोरियों के कारण उन पर काबू पाने में असफलता मिलती है, उन्हें शक्ति साधना द्वारा समाप्त करने के लिए योजना बनाने- सङ्कल्प प्रखर करने तथा तदुनसार क्रम अपनाने की प्रेरणा लेकर यह पर्व आता है। इसका उपयोग पूरी तत्परता एवं समझदारी से किया जाना चाहिए।

यह पर्व आश्विन नवरात्र से जुड़ा रहता है। नवरात्र साधना का महत्त्व एवं सामूहिक साधना क्रम का विवरण चैत्र नवरात्र प्रकरण में दिया जा चुका है। नौ दिन का सामूहिक साधना का अनुष्ठान जहाँ जिस स्तर पर भी हो, आयोजित किया जाना चाहिए। नवमी को बहुधा पूर्णाहुति रखकर नवरात्र साधना की पूर्णाहु़ति एवं दशहरा पर्व का संयुक्त रूप भी दिया जा सकता है। यदि साधना पूर्णाहुति नवमी को दशहरे से एक दिन पूर्व कर ली गई, तो स्थानीय सुविधा के अनुसार दशहरा पर्व पूजन दशमी के दिन प्रातःकाल या सायंकाल कभी भी किया जा सकता है।

देवपूजन मंच पर अष्टभुजी माँ दुर्गा का चित्र स्थापित किया जाना चाहिए। शस्त्र पूजन के लिए कोई शस्त्र चौकी पर सजाकर रखना चाहिए। पूजन सामग्री के साथ पुष्प, अक्षत, चन्दन आदि उपस्थिति के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में रखना चाहिए॥

पर्व के अनुरूप प्रेरणा उभारने के लिए उपयुक्त संगीत एवं संक्षिप्त भूमिका के बाद पूजन क्रम प्रारम्भ किया जाता है। षट्कर्म से रक्षाविधान तक सामान्य क्रम यथा- स्थिति चलाएँ। विशेषपूजन नीचे लिखे अनुसार करें।

॥ दुर्गा- आवाह्न-पूजन ॥

दुर्गा देववृत्तियों का नाम है। भावना करें कि यह देवानुकूल विशेषताएँ हममें, जन-जन में जागें। उनका संयुक्त उपयोग करने की क्षमता मिले। इस भावना के साथ सभी हाथ जोड़कर यह मन्त्र बोलें।

ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। देवाभागं यथापूर्वे, संजानाना उपासते॥ -ऋ० १०.१९१.२
इसके बाद माता दुर्गा का विशेष आवाहन करें।
॥ दुर्गा आवाहन॥
ॐ गिरिजायै विद्महे, शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्॥ – दु०गा०
ॐ नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे, नमस्ते जगद्व्यापिके विश्वरूपे।
नमस्ते जगद्वन्द्यपादारविन्दे, नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥
ॐ श्री दुर्गायै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।
तत्पश्चात् पुरुष सूक्त पृष्ठ ९६ से षोडशोपचार पूजन करें।

॥ शस्त्र पूजा॥

प्रेरणा प्रवाह- आसुरी शक्तियों को नियन्त्रित करने के लिए जिन साधनों की आवश्यकता पड़ती है, उन्हें शस्त्र कहते हैं। उनका उपयोग रक्षार्थ करना ही पड़ता है; परन्तु एक बार शस्त्र के उपयोग का अभ्यास होते ही उसका उपयोग स्वार्थ पूर्ति के लिए भी किया जाने लगता है। शस्त्र पूजा के साथ यह प्रेरणा जुड़ी है कि शस्त्र का ऐसा उपयोग हो, जो अभिनन्दनीय हो। शस्त्रों में माँ दुर्गा वह संस्कार पैदा करें, जो उनको सदुद्देश्यों से बहकने न दें।
चौकी पर शस्त्र रखकर मन्त्र सहित उस पर पुष्प चढ़ाएँ। विशेष शस्त्र न हो, तो लाठी, चाकू आदि से काम चला लेना चाहिए।

ॐ शत्रूषाण्नीषाडभिमातिषाहो, गवेषणः सहमान उद्भित्। वाग्वीव मन्त्रं प्र भरस्व वाचं, सांग्रामजित्यायेषमुद्वदेह॥ – अथर्व० ५.२०.११
इसके बाद यज्ञ आदि समापन के उपचार यथास्थिति किये जाएँ।

॥ सङ्कल्प॥

…नामाहं दुर्गापूजनपर्वणि समाजे स्वान्तःकरणे च सद्वृत्तीनां समारोपणे तदभिनन्दन- सहकारयोश्च संकल्पम् अहं करिष्ये॥

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