ईर्ष्या-विद्वेष और क्रोध पर नियंत्रण को ‘चिंतन’ प्रक्रिया कारगर

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Effective 'chintan' process of jealousy and anger control

मस्तिष्क का अनावश्यक रूप से उत्तेजित रहना, काम की अधिकता, प्रस्तुत योजनाओं की पूर्ति का ताना-बाना बुनना-उलझनों और समस्याओं को सुलझाने के लिए व्यग्रता, साथियों से असंतोष आदि कारणों से तनाव पैदा होता है। फलतः उसका परिणाम सारे शरीर की अव्यवस्था के रूप में सामने आता है। असामयिक मृत्यु का यह एक बड़ा कारण है। सुविकसित समझे जाने वाले सुसम्पन्न एवं मूर्धन्य लोग अपेक्षाकृत प्रायः कम जीवन जी पाते हैं।

Effective 'chintan' process of jealousy and anger control

प्रस्तुती- रिपोर्ट4इंडिया

मानसिक रूप से शांति प्राप्ति के लिए चिन्तन का अभ्यास जरूरी है। असफलता और निराशा के वातावरण में भी विवेक संतुलन बनाए रहना मानसिक स्वस्थता का लक्षण है। इसके लिए जरूरी है कि मन और बुद्धि को चिंतन के जरिए रगड़ते रहे। मन में किसी के प्रति लंबे समय तक ईर्ष्या-द्वेष न रखें। हमेशा अपनी परेशानियों को हल करने योग्य मानें। भविष्य की उज्ज्वल सम्भावनाओं पर विश्वास रखें, जीवन में आगे की परेशानियों का, भविष्य की आशंकाओं के चिन्तन करते रहने की बुरी आदत से बचें।

विपत्ति की स्थिति में धैर्य, शूरवीरों जैसी निर्भयता, पुरुषार्थ में अभिरुचि, मनोयोगपूर्वक परिश्रम, कठिनाइयों से जूझने का साहस, प्रसन्नता और निश्चिंतता, अपनी क्षमताएं बढ़ाने को तथा त्रुटियों को ठीक करने को प्रयत्नशील रहना आदि यह बताने के लिए काफी है कि व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ है। दूसरों से बड़ी-बड़ी आशाएं न बांधना और उनके संबंध में बहुत ऊँची कल्पनाएं न गढ़ना भी इस बात का प्रतीक है कि मस्तिष्क यथार्थवादी है। बहुत ऊंची उड़ानें उड़ने और किसी को बहुत ऊंची स्थिति का मान बैठने से बाद में निराशा ही होती है। ऐसा इसलिए कि वस्तुत: सभी मनुष्य किसी न किसी दोषों से युक्त ही होते हैं। मन पर छाए रहने वाले उद्वेग, असंतोष एवं आक्रोश मस्तिष्कीय कणिकाओं को इतना उत्तेजित कर देते हैं कि उनका प्रभाव समस्त शरीर पर अशांति एवं बेचैनी के रूप में दिखाई पड़ता है।

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घर का कलह, पैसे की तंगी, व्यावसायिक हानि, मुकदमा, शत्रुता, बीमारी, शोक−वियोग, क्रोध, भय, ईर्ष्या−द्वेष आदि अनेक कारण ऐसे हो सकते हैं, जिनके कारण मस्तिष्क पर असाधारण दबाव पड़े। कहना न होगा कि समस्त शरीर मस्तिष्क के ही नियन्त्रण में चलता है। मस्तिष्क उत्तेजित होगा तो उस उत्तेजना का प्रभाव नस−नाड़ियों, माँस−पेशियों, कोशिकाओं सहित प्रत्येक अंग- अवयव पर दिखाई पड़ेगा। उनकी गति बढ़ जायगी और बेचैनी अनुभव होगी। इस स्थिति में जीवनी शक्ति का बेतरह क्षरण होने लगता है। ऐसा लंबे समय जारी रहे तो शरीर के अंग-प्रत्यंग न केवल शिथिल होते जाते हैं वरन् उनमें तरह−तरह की विकृतियाँ भी उत्पन्न होती हैं। ऐसे उत्तेजनाग्रस्त व्यक्ति कई तरह के रोग से ग्रसित होते चले जाते हैं।

संसार के मूर्धन्य व्यक्तियों में से अधिकांश को अल्पायु में ही अपना शरीर छोड़ना पड़ा। इसका प्रधान कारण उनके मस्तिष्क का अनावश्यक रूप से उत्तेजित रहना पाया गया। काम की अधिकता, प्रस्तुत योजनाओं की पूर्ति का ताना-बाना बुनना-उलझनों और समस्याओं को सुलझाने के लिए व्यग्रता, साथियों से असंतोष आदि कितने ही कारण मस्तिष्कीय क्षमता से अधिक दबाव उन पर डालते रहे, फलतः उस तनाव का परिणाम सारे शरीर की अव्यवस्था के रूप में सामने आता रहा। असामयिक मृत्यु का वह एक बड़ा कारण है, जिसके कारण सुविकसित समझे जाने वाले सुसम्पन्न एवं मूर्धन्य लोग प्रायः जीवन काल की थोड़ी−सी मंजिल पूरी करके ही पैर पसार देते हैं।

मानसिक तनाव की स्थिति में शरीर का रासायनिक संतुलन बिगड़ता है। कई तरह के उपयोगी हारमोन उत्पन्न करने वाली मस्तिष्क स्थित पिच्युएटरी गुर्दे में स्थित एड्रीनल ग्रन्थियाँ अपरिपक्व और विकृत स्तर के हारमोन फेंकने लगती हैं फलतः शरीर का सारा ढांचा ही चरमराने लगता है।

इसीलिए स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि जीवन से तनाव को निकाल फेंके। हमेशा सकारात्मक चिंतन में रत रहें। निरसता व थकान भरा जीवन जीने से बचें। सरस संतोष को अपनाकर पुष्प की तरह खिलते रहें। ऐसा होना या करना मनुष्य के अपने दृष्टिकोण पर निर्भर होता है, परिस्थितियों के आधार पर नहीं।

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