नगरी हो अयोध्या-सी, रघुवर सा ‘घराना’ हो…

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” भारत का विगत पांच हजार साल का ‘ढांचा’ कुछ सौ वर्षों के ‘ढांचे’ के उलझन से बाहर निकल गया है। प्रेम, शांति और एकता का सम्मिलित ‘अनुग्रह’ सफल हो गया।”  

मनोज कुमार तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया। 

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कवि-लेखक राजेंद्र अनुरागी लिखते हैं, आदमी का बेटा, युग की परीक्षा में फेल जाता है, और नई पीढ़ी के सौ-पचास वर्षों का खेल हो जाता है। युग की परीक्षा में फेल हो जाना यानी कई पीढ़ियों का नुकसान पहुंचाना है। अयोध्या केस में सुप्रीम कोर्ट के सुप्रीम फैसले के सम्मान में आज ‘आदमी’ पास हो गया है। तीन दिन बाद भी देश में चहूंओर शांति है और ‘आदमियत’ ने अपना ‘घराना’ बहुत बड़ा कर दिखाया है, युग की परीक्षा में पास नज़र आता है। भारत का विगत पांच हजार साल का ‘ढांचा’ कुछ सौ वर्षों के ‘ढांचे’ के उलझन से आगे निकल गया। प्रेम, शांति और एकता के सम्मिलित अनुग्रह सफल हो गया।

अयोध्या ही नहीं हर रामभक्त के घर में एक भजन गूंजता रहता है, ‘नगरी हो अयोध्या-सी, रघुवर से घराना हो’ फैसले के बाद अयोध्या की जैसे त्रेता युग लौट आई हो। हर गली-सड़क, मंदिर, चौक-चौराहे और सरयू मैया का कलकल मानो, नई ऊर्जा से प्रवाहित हो रही है। अयोध्या में ही नहीं बल्कि देश में चारो ओर सकारात्मकता और संतुष्टी का भाव दिख रहा है। मठ-मंदिरों की नगरी अयोध्या में भजन और भाव हिलोरें ले रही हैं। राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ होते ही देश भर से राम भक्त अयोध्या दर्शन करने पहुंच रहे हैं। भक्ति के वातावरण में कामना ऐसी कि अब अवधपुरी मात्र नगरी नहीं बल्कि बैकुंठपुरी बन गई है और पूरी दुनिया में राम से बड़ा ‘घराना’ कोई नहीं है।

शंकराचार्य ने सनातन की धारा को एक केंद्र से प्रवाहित करने के लिए कदम आगे बढ़ाया। ऊर्जा तो केंद्रीकृत प्रवाह से ही निकलती है। महात्मा बुद्ध के भाव वेदांत का ही विस्तार है। महर्षि अरविंद, विनोवा भावे और महात्मा गांधी भी एका के भाव को लेकर ही आगे बढ़े और व्याप्त समस्याओं के निराकरण पर जोर दिया। आज देशवासियों के लिए अयोध्या और राम का ‘घराना’ एकमेव का सूत्र बन गया है।