दुख अन्तर्मुखी साधना, संदेश वाहक है जीवन निर्माण का

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…यही बात तो महात्मा बुद्ध और भारतीय दार्शनिकों ने कही है। वे धर्म दृष्टि को, जीवन मूल्यों को एक बेहतर कसौटी पर कस रहे होते हैं। हिन्दू धर्म-दर्शन में स्वयं में ‘भक्ति और शक्ति’ का संयोजन होता रहा है। संसार दुखों से भरा हुआ है लेकिन यह जीवन साधना में सीढ़ी की तरह है जिसपर चढ़कर वैतरणी को पार करने की शक्ति प्राप्त होती है। इसीलिए, हिन्दू मत व दर्शन में दुख की याचना कुछ इस तरह है कि वह अनिवार्य है, बेहतर की खोज के लिए है।

कामनाओं की पूर्ति न होना, दुःख का कारण है और इससे विकल होना ही दुःख का प्रभाव। दीन-हीन की तरह दुख को केवल भोगते रहना यह अभिशाप है, किंतु उसके प्रभाव से प्रभावित होकर सचेत होना निश्चय ही जीवन का वरदान है।

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प्रस्तुती- रिपोर्ट4इंडिया

शरीर में किसी प्रकार की विकृति बीमारी के रूप में सामने आती है और उसका निदान उस विजातीय पदार्थ को शरीर से बाहर कर प्राप्त होता है। माना जाता है कि रोग शरीर की एक आवश्यकता है, जिससे अपनी जीवनी शक्ति का आभास होता है। यह ज्ञान मनुष्य को न मिले और विजातीय तत्व भीतर ही बढ़ते रहें तो अकाल मृत्यु सुनिश्चित हो जाती है। मनुष्य जीवन का ऐसा ही संकेत है, जो मनुष्य को इस बात के लिए सचेत करता रहता है कि उसका लक्ष्य कुछ और है। मनुष्य शरीर रूप में एक आत्मा है, इस आत्मतत्व की ओर संकेत के भाव मात्र है दुःख। इसलिए वह ग्रहणीय है। दुःख के बिना इस जीवन का महत्व भी कुछ नहीं रह जाता है।
महाभारत में कहा गया है- “विपत्तियां हमारे जीवन में पग-पग पर आती रहें क्योंकि, परमसत्ता के दर्शन विपदाओं में ही होते हैं। आपके दर्शन मिल जाते हैं तो मनुष्य जन्म-मरण के बंधनों से विमुक्त हो जाता है।” कामनाओं की पूर्ति न होना, दुःख का कारण है और इससे विकल होना ही दुःख का प्रभाव है। दीन-हीन की तरह दुख को केवल भोगते रहना यह अभिशाप है, किंतु उसके प्रभाव से प्रभावित होकर सचेत होना निश्चय ही जीवन का वरदान है।
यदि विपदाएं मनुष्य के जीवन में न आयें तो उसकी अन्तर्मुखी चेष्टाएं कभी भी जाग्रत न हों और जिस लक्ष्य को लेकर उसे यह मानव देह मिली है, वह साध्य सदैव अधूरा ही बना रहे। धन पाकर उसका उपयोग न करें तो उस धन और मिट्टी के ठीकरे में कोई अंतर नहीं होता। मनुष्य का जीवन पाकर भी आत्म-ज्ञान से विमुख होना मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। दुःख जीवन निर्माण का संदेश वाहक है, उसका सत्कार होना ही चाहिए। सुख और दुःख दोनों समान रूप से इसलिए परमात्मा की ओर से मिले हैं कि इससे मनुष्य का जीवन एकाँगी न हो।
प्राकृतिक नियमानुसार आंशिक सुख और दुःख सबके जीवन में है, पर जो मनुष्य कामनाओं की पूर्ति से आसक्त अर्थात् सुख को ही साध्य मान लेते हैं, उनके लिए सुख ही दुःख स्वरूप हो जाता है क्योंकि, परिस्थितियों की विपरीतता के कारण सदैव कामनाओं की पूर्ति होते रहना निश्चित नहीं है। सभी कामनायें पूरी नहीं होतीं। इसलिए दुःख पैदा होना स्वाभाविक है।
दुःखों से भी केवल प्रभावित होते रहना-इससे भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता जब तक उसके मूल कारण पर आध्यात्मिक दृष्टि से विचार नहीं करते। एक दृष्टिकोण यह है कि हमसे भी दयनीय स्थिति में दूसरे व्यक्ति हैं। इससे संसार और उसकी परिस्थितियों पर विचार करने की शक्ति आती है। भौतिकता से हटकर संसार की सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं की ओर ध्यान जाता है। विचार करते-करते मनुष्य निजत्व पर आ जाता है। एक बार जैसे ही आत्म-ज्ञान के लिए असंतोष पैदा हुआ कि यों समझिए आपके अध्यात्मिक जीवन का सूत्रपात हुआ। यह परिस्थिति बन जाये तो जीवन लक्ष्य की ओर उन्मुख होना निश्चय ही समझिये। दुःख के समय सुख की भावी सम्भावना मात्र से दुःख सहते रहते हैं। सुख के समय भी ऐसी ही चेतना जाग्रत हो कि सुख और दुःख दोनों धूप-छाँह की तरह आने-जाने वाले हैं, ऐसी जागृति आने पर आपका जीवन सुख और दुःख दोनों से अतीत हो जायगा और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की निर्द्वन्दता आ जायगी। विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने आती है। इससे हृदय में जो पीड़ा, आकुलता और छटपटाहट उत्पन्न होती है इससे चाहें तो अपना सद्ज्ञान जाग्रत कर सकते हैं। भगवान को प्राप्त करने के लिए जिस साहस और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, दुःख उसकी कसौटी मात्र है। विपत्तियों की तुला पर जो अपनी सहन शक्तियों को तौलते रहते हैं, वही अंत में विजयश्री को प्राप्त करते हैं।
दुःख एक प्रभाव सच्चे सुख की अनुभूति कराता है। एक बार जब सुख के सही स्वरूप का बोध हो जाता है तो सुख लोलुपता मिट जाती है। दुःख को अनिवार्य और आवश्यक बताने का यह अर्थ नहीं कि सुख प्राप्ति के उपाय त्याग दें। जीवन को ऊँचा उठाने का प्रयत्न तो हो ही किंतु निष्काम कर्म से गिरा देने वाली जो सुख की तृष्णा होती है, उससे बचना मानव-जीवन की शुद्धता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। इसका आभास दुःख के क्षणों में सरलता से प्राप्त कर लेते हैं इसलिए दुःख सापेक्ष है किंतु सुख उचित होते हुए भी साध्य नहीं है।
मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता कामनाओं की पूर्ति का सुख नहीं है क्योंकि सुखी अवस्था में भी भय का अंत नहीं होता और नहीं तो मृत्यु के भय से तो कोई भी बच नहीं सकता। इससे यह प्रतीत होता है कि निर्भयता सुख प्राप्ति से बढ़कर है। दुःख निवृत्ति, चिर, विश्राम, पूर्ण स्वाधीनता और प्रेम स्वरूप की प्राप्ति-ये चार वस्तुयें जीवन की चतुर्मुखी आवश्यकतायें है। इन चारों की उपलब्धि उसे होती है जो परमात्मा की प्राप्ति के लिए, उसके आदेशों का पालन करने के लिए स्वेच्छा-पूर्वक, प्रसन्नता-पूर्वक तत्पर होते हैं। तपश्चर्या इसी स्थिति का नाम है। परमपिता को हमारी किसी वस्तु की आकाँक्षा नहीं है वे हमसे प्यार चाहते हैं, हमारी आकुल प्रार्थना पर ही वे रीझते हैं। विषयों में आसक्त जीवात्मा से वैसी प्रार्थना के जादूगर बन नहीं पाते, इसलिए तप का महत्व है। तप का एक ही अर्थ दुःख पैदा करना है। दुःख इसलिए अभीष्ट है कि इससे अन्तःकरण का सत्य परिभाषित होता है। मनुष्य जीवन का विराम इसी सत्य को पाता है। अपने आँतरिक उद्गारों को सतत् प्रार्थनाशील रखने के लिए दुःख चाहिए, कष्ट चाहिए। निरंतर हृदय में उमड़ने वाली वेदना चाहिए। यह दुःख जिसे मिले उसे ही यह समझना चाहिए कि उस परमात्मा का असीम अनुग्रह है। जिससे वे मिलना चाहते हैं उसे पहले दुःख का दूत भेजकर मिलने की स्वीकृति माँगते हैं। धन्य है वे लोग जो दुःख को परमात्मा का प्रसाद समझकर उसे अपने शीश पर धारण कर लेते है।
दुःख हमारे पुरुषार्थ को जगाने आता है। सुखी मनुष्य विलासी और व्यसनी, आलसी और प्रमादी बन जाता है, अहंकार उसे घेर लेता है और तृष्णाओं के पर्वत सामने आकर खड़े हो जाते हैं, किंतु जब दुःख सामने आते हैं तो मनुष्य को इसका प्रतिरोध करने के लिए अपनी प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करना पड़ता है। पौरुष का निखार इन्हीं परिस्थितियों में होता है। सोने को अग्नि में तपाकर उसके मल विकार जलाये जाते हैं। इसी प्रकार दुःखों की अग्नि में तपा हुआ मनुष्य अपने अनेक दोष-दुर्गुणों से सहज ही छुटकारा पा जाता है। सुखों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहना मनुष्य का स्वभाव है, वह अंतःप्रकृति की प्रेरणा से हर एक को करना ही होता है। करना भी चाहिए। पर जब दुःख के अवतार आयें तब घबराना तनिक भी नहीं चाहिए वरन् अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का एक सुअवसर आया जानकर उसे भी शिरोधार्य करना चाहिए।

 

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