GST यानी ‘गुड एंड सिंपल टैक्स’ : मोदी

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नई दिल्ली/रिपोर्ट4इंडिया।
शुक्रवार-शनिवार आधी रात से देश में जीएसटी (गुड्स एंड सर्विस टैक्स) लागू हो गया। वर्ष 2000 से ही देश में जीएसटी लागू करने की बात शुरू हुई और आज 17 साल बाद इसे लागू कर दिया गया। यह ‘एक देश और एक टैक्स’ की ओर कदम है।
पीएम मोदी ने संसद के सेंट्रल हॉल में अपने भाषण में कहा, GST यानी ‘गुड एंड सिंपल टैक्स’ है। हम जो न्यू इंडिया का भाव लेकर चल रहे हैं उसे पूरा करने में जीएसटी का भारी योगदान होगा। पीएम ने कहा, राष्ट्र के निर्माण में कुछ ऐसे पल आते हैं, कुछ देर बाद देश एक नई व्यवस्था की ओर चल पड़ेगा। सवा सौ करोड़ देशवासी, इस ऐतिहासिक घटना के साक्षी हैं। उन्होंने कहा, जीएसटी की प्रक्रिया सिर्फ अर्थव्यवस्था के दायरे तक है ऐसे मैं नहीं मानता।
पिछले कई सालों से अलग-अलग टीमों के द्वारा जो प्रक्रियाएं चली हैं, वो एक प्रकार से भारत के लोकतंत्र की, भारत के संघीय ढांचे की, को-ऑपरेटिव फेडरेलिज्म के मिसाल के तौर पर आया है। इस पवित्र अवसर पर आप सब अपना बहुमूल्य समय निकाल के आए हैं। दिल से आपका स्वागत है। आपका आभार व्यक्त करता हूं।
ये जो दिशा और रास्त हमने चुना है। य़ह किसी एक दल की सिद्धि नहीं है। यह किसी एक सरकार की सिद्धी नहीं है। ये हम सब की सांझी विरासत है। हम सबके साझे प्रयासों का परिणाम है।
उन्होंने कहा, जीएसटी टीम इंडिया का क्या परिणाम हो सकता है, यह उसके सामर्थ का परिचायक है। जीएसटी काउंसिल केंद्र और राज्य ने मिलकर, जिसने गरीबों के लिए पहले उपलब्ध सेवाओं को बरकरार रखा है। दल कोई भी हो, सरकार कोई भी गरीबों के प्रति संवेदनशीलता सबने रखी है।
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि चाणक्य ने कहा था, ‘कोई वस्तु कितनी भी दूर क्यों न हो, उसका मिलना कठिन न क्यों न हो, कठिन तपस्या और परिश्रम से उसे भी पाया जा सकता है। हम कल्पना करें देश आजाद हुआ, 500 रियासतें थीं। अगर सरदार पटेल ने सबको मिलाकर एक न किया होता तो देश का मानचित्र कैसा होता? जिस प्रकार से पटेल ने एकीकरण का काम किया था उसी तरह आज जीएसटी के द्वारा आर्थिक एकीकरण का महत्वपूर्ण काम हो रहा है।’
गंगानगर से लेकर ईटानगर, लेह से लेकर लक्ष्यद्वीप से लेकर वन नेशन, वन टैक्स। ये सपना हमारा सराकर होके रहेगा। 500 टैक्स से मुक्ति। एल्बर्ट आइस्टिन ने कहा था- दुनिया में कोई चीज समझना सबसे ज्यादा मुश्किल है वो है इनकम टैक्स। मैं सोच रहा होता तो वो इतना टैक्स देखकर क्या कहते?
एक ही चीज दिल्ली में एक दाम, गुरुग्राम में दूसरा, नोएडा में गए तो अलग। इन सारे राज्यों के टैक्स के कारण अलग अलग टैक्स। एक प्रकार से हर किसी के लिए कन्फयूजन की स्थिति रहती थी। विदेशी निवेशकों के लिए भी कन्फ्यूजन का माहौल बना रहता था।
जीएसटी के कारण एंट्री, टोल टैक्स खत्म हो जाएंगे। घंटों ट्रक खड़े रहते हैं। फ्यूल का नुकसान होता है। पर्यावरण को नुकसान होता है। अब इन सबसे मुक्ति मिलेगी। कुछ सामान को वक्त पर पहुंचना जरूरी होता है। वो अब समय से पहुंचेगा। जीएसटी के तौर पर देश एक आधुनिक टैक्स सिस्टम की ओर कदम रख रहा है। एक ऐसी व्यवस्था है जो काले धन, करप्शन को रोकने में अवसर प्रदान करती है। ईमानदारी से व्यपार करने के लिए उमंग मिलेगा।
टैक्स टेरेरिज्म और इंस्पेक्टर राज नई नहीं है। हमने देखा है, लोग भोगते आए हैं। अफसरशाही बिल्कुल समाप्त हो रहा है। जो सामान्य व्यापारियों, कारोबारियों को जो परेशानियां होती रही हैं, उससे मुक्ति का मार्ग मिलेगा। कोई ईमानदार कारोबारी परेशान हो, उससे मुक्ति की संभावना जीएसटी के अंदर है। 20 लाख का तक का व्यापार करने वाले को मुक्ति दे दी गई है। 75 लाख तक का कारोबार करने वालों को भी नाममात्र जोड़ा गया है।
सामान्य मानवीय को इस नई व्यवस्था से कोई बोझ नहीं होगा। जीएसटी की व्यवस्था आर्थिक भाषा में ही सीमित नहीं है। सरल भाषा में कहूं तो यह देश के गरीबों के हित में सार्थक होने वाली है। आजादी के 70 साल बाद भी गरीबों को जो पहुंचा नहीं पाए हैं, सब सरकारों ने मेहनत की, पर संसाधनों की कमी रही। कच्चा बिल पक्का बिल का खेल खत्म हो जाएगा। छोटे कारोबारी भी लाभ को आम आदमी को ट्रांसफर करेंगे।
जीएसटी एक ऐसा कैटालिस्ट है, व्यापार में जो अंसंतुलन है उसे खत्म करेगा। जो राज्य विकसित हुए हैं उनके सा साथ बिहार, पूर्वी यूपी, पश्चिम बंगाल, ओडिशा लेकिन उनको एक कानून की व्यवस्था मिलेगा वो पूर्वी हिस्सा विकास का अवसर मिलेगा। हिंदुस्तान के सभी राज्यों को समान अवसर प्राप्त होना, ये अपने आप में विकास के रास्ते में बहुत बड़ा अवसर है।
जैसे रेलवे हैं, केंद्र और राज्य मिलकर चलाते हैं. फिर भी इसे भारतीय रेलवे के रूप में देखते हैं। जीएसटी ऐसी व्यवस्था है, जिसमें केंद्र राज्य के लोग मिलकर निश्चित दिशा में काम करेंगे. एक भारत, श्रेष्ठ भारत के लिए व्यवस्था बनेगी। 2022 में आजादी के 75 साल हो रहे हैं।

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