…हिन्दू धर्म यानी ‘राष्ट्र धर्म’!

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[highlight] यह एक राष्ट्र का धर्म है। आर्य, शक, हूण आदि जो भी यहां आते गये, बसते गये उन सबके साथ आदान-प्रदान हुआ और इससे जिस विशाल व्यापक समभावी धर्म की रचना हुई, वह हिन्दू धर्म कहलाया। किसी धर्म को नष्ट करके यह रचना नहीं हुई, किन्तु सब धर्मों को रखकर, उनका समन्वय करके यह रचना हुई। [/highlight]

स्वतंत्रता से पहले श्रीस्वामी दरबारीलाल जी ‘सत्यभक्त’ का व्यक्तव्य।

एक बार एक सज्जन ने मुझसे कहा-”हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं है क्योंकि न तो कोई उसका निश्चित देवता है, न उसका कोई निश्चित विचार।” मैंने कहा—”हिन्दूधर्म कोई संकुचित धर्म नहीं है। वह धर्मों का अजायबघर है, अनेक दर्शन, अनेक आचार-विचार, ईश्वर के अनेक रूप, जिसमें समन्वित है और जिसमें हर एक को जगह मिल सकती है।”

बात यह है कि यह एक राष्ट्र का धर्म है। आर्य, शक, हूण आदि जो यहां आते गये और यहां बसते गये उन सबके साथ इसका आदान-प्रदान हुआ और इससे जिस विशाल व्यापक समभावी धर्म की रचना हुई, वह हिन्दू धर्म कहलाया। किसी धर्म को नष्ट करके यह रचना नहीं हुई, किन्तु सब धर्मों को रखकर, उनका समन्वय करके यह रचना हुई।

यही कारण है कि संहारक महादेव, विकराल काली मैया, वैभवशाली विष्णु आदि सभी वृत्ति के सैंकड़ों देव इस धर्म में आ गये। ईश्वर के जितने महत्वपूर्ण कार्य इस दुनिया में होते हैं, उन सबका प्रतिनिधि एक-एक देव बन गया। सभी देव, ऋषि आदि ईश्वर के अंश बन गये। इस प्रकार एक ईश्वर को बड़े विशाल रूप में हिन्दुओं ने देखा और सबका समन्वय करके एक राष्ट्रधर्म बनाया।

यह निश्चित है कि इस देश की एक समन्वयात्मक विशाल संस्कृति ही हिन्दू धर्म रहा है। जैन धर्म और बौद्ध धर्म से भी उसने बहुत कुछ लिया है, उन्हें अपनाया हैं, अब इस्लाम और क्रिश्चियनिटी को भी अपनाने की जरूरत है। वह अपना सकता है। वह सर्वधर्म समभाव के आधार पर ही खड़ा हुआ है। (साभार-अखण्ड ज्योति Mar 1943)

 

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