काश! …अटलजी को डेढ़-दो दशक देश का नेतृत्व कर पाते

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atalji-01अभी-अभी एक शोध के अध्ययन में पढ़ा कि 2013 तक देश में निर्मित कुल सड़कों के 50 फीसद का निर्माण श्रीवाजपेयीजी के कार्य काल में हुआ। पोखरण परमाणु परीक्षण का आधिकारिक वीडियो देख कर गौरवान्वित हुआ कि किस प्रकार हमारे वैज्ञानिक सेना के गणवेष में अमेरिकी सेटेलाइट से बचने के लिए रात्री के अंधेरे मे काम किया। कारगिल युद्ध के उत्तरार्द्ध के वह दिन याद कीजिए जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बिना बुलाए अमेरिका जाकर गिड़गिड़ा रहे थे कि वह भारत को युद्ध बन्द करने के लिये बाध्य करें।” जय जवान, जय किसान,जय विग्यान” महज नारा नहीं अपितु” परम् वैभवम् नेतुमेततस्वराष्ट्रम्” का विज़न है। मैं प्रायः यह सोचता रहा कि ऐसा स्वप्नद्रष्टा, युगपुरुष अपने युवा काल में यदि हमारे देश का डेढ़-दो दशक नेतृत्व कर पाता तो हम नि:संन्देह विश्व के अग्रगण्य राष्ट्र होते। 

प्रस्तुती-संपादन/रिपोर्ट4इंडिया/डॉ. विनोद कुमार तिवारी के फेसबुक वॉल से।

atal-bihariनई दिल्ली। श्रीमन्त अटल बिहारी वाजपेयीजी के स्वर्गारोहण की सूचना पर 16 अगस्त की रात मेरे गांव से एक भाई का सन्देश आया। उन्होंने आग्रहपूर्वक कहा, “इतने कम समय में हमलोग अटलजी के अंतिम संस्कार में भाग लेने दिल्ली नहीं पहुंच सकते, आप वहां हैं, अतः संस्कार में भाग लेकर आप हमारे कुल-गोत्र-ग्राम-शहर का प्रतिनिधित्व करें।” मैं भावविह्वल हो गया। मैंने उन्हें आश्वासन दिया, “मैं ऐसा अवश्य करूँगा” फिर भार्या महोदया ने भी अंतिम दर्शन की इच्छा प्रकट की, मैंने मौन सहमति दी। हमलोग बड़े सवेरे अपने प्रिय अटलजी के घर 6 ए, कृष्ण मेनन मार्ग पहुंचे। भीड़ के वावजूद हमने उनके चरणों में श्रद्धासुमन अर्पित कर अंतिम दर्शन किए।

अभी-अभी एक शोध के अध्ययन में पढ़ा कि 2013 तक देश में निर्मित कुल सड़कों के 50 फीसद का निर्माण श्रीवाजपेयीजी के कार्य काल में हुआ। पोखरण परमाणु परीक्षण का आधिकारिक वीडियो देख कर गौरवान्वित हुआ कि किस प्रकार हमारे वैज्ञानिक सेना के गणवेष में अमेरिकी सेटेलाइट से बचने के लिए रात्री के अंधेरे मे काम किया। कारगिल युद्ध के उत्तरार्द्ध के वह दिन याद कीजिए जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बिना बुलाए अमेरिका जाकर गिड़गिड़ा रहे थे कि वह भारत को युद्ध बन्द करने के लिये बाध्य करें।” जय जवान, जय किसान,जय विग्यान” महज नारा नहीं अपितु” परम् वैभवम् नेतुमेततस्वराष्ट्रम्” का विज़न है। मैं प्रायः यह सोचता रहा कि ऐसा स्वप्नद्रष्टा, युगपुरुष अपने युवा काल में यदि हमारे देश का डेढ़-दो दशक नेतृत्व कर पाता तो हम नि:संन्देह विश्व के अग्रगण्य राष्ट्र होते।

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अटलजी सामाजिक संस्कारों के उच्च प्रतिमान थे। अपने बाबुजी से प्राप्त दो संस्मरणों का उल्लेख मैं प्रासंगिक समझता हूं। घटना सन् 1969-70 की है। उनकी एक आमसभा मेदिनीनगर (पूर्व नाम डालटनगंज, झारखंड) में आयोजित थी। वह विमान से रांची आए। सड़क मार्ग से आगे की यात्रा करनी थी। भारतीय जनसंघ, रांची जिलाध्यक्ष के रूप में मेरे ताऊजी उन्हें स्कार्ट कर रहे थे। निर्णय हुआ कि लंबी यात्रा में कहीं अल्प विश्राम हो। ताऊजी ने कहा, “लताहार में आपकी बिटिया का घर है न!” अटलजी ने अविलंब उत्तर दिया, ” बिटिया के घर तो डालियाँ लेकर जाना होगा।” तुरंत उन्होंने सूखे मेवे से भरी पांच सुसज्जित डालियाँ मंगवाई। ये उपहार बेटी, दामाद, समधी, समधन को उनकी ओर से भेंट किए गए।

दूसरा संस्मरण भी इसी यात्रा से जुड़ा है। उनका भोजन लगभग पचास भद्रजनों, कार्यकर्ताओं के साथ मेदिनीनगर के एक सज्जन के यहां नियत था। पातिए पर पंगत, और पत्तलों पर भोजन का परवेशन हो चुका था। बाबुजी उनके सन्निकट बैठाए गए थे। मंत्रोच्चार से पूर्व एक कटोरे मे उनके लिए दूध लाकर रखा गया। उन्होंने बड़े नाटकीय अंदाज में पूछा, ” यह क्या है? क्या यह सबको दिया जा चुका है?” परवेशक ने सहमते हुए कहा कि सबके लिए इसकी व्यवस्था नहीं हो पायी है।” तो फिर इसे तुरंत वापस ले जाइए, मैं वही भोजन करुंगा, जो सभी कार्यकर्ता करेंगे।” उन्होंने बड़ी सौम्यता से कहा।

मुझे रामायण का वह सन्दर्भ याद आता है, जब भगवान राम के राज्याभिषेक की सारी तैयारी हो चुकी है, तो वह बड़ी सहजता से कहते हैं:
जनमे एक संग सब भाई, भोजन, शयन ,केलि, लरिकाई।
करणवेध, उपवित, विआहा , संग-संग सब भए उछाहा।
विमलवंश यहअवगुण एकु,वन्धुविहाई,बड़ेहीअभिशेकू।”

मुल्क राज आनन्द के एक उपन्यास “अनटचेबल” का केंद्रीय पात्र बक्खा महात्मा गांधी के जादुई व्यक्तित्व पर मुग्ध है। ज्यों ही उसे जानकारी होती है कि वह उसके शहर पधार रहे हैं, वह सारा काम छोड़कर, अपना सुध-बुध खोकर उस मैदान और फिर मंच की ओर भागता है, जहाँ से वह सभा को संबोधित करने वाले थे। अटलजी के सन्दर्भ में यह बात सम्पूर्णत: सत्य है। ज्यों ही यह उद्घोषणा होती कि अटल बिहारीजी वाजपेयी अमूक शहर, तिथि, दिन, समय पर एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे, डेढ़-दो सौ किलोमीटर की परिधि में बसे जनसमुदाय में यह चर्चा का विषय बनता। दूर-दराज के लोग शहर पहुंचने की योजना बनाते। सभा के दिन बड़े सवेरे से ही शहर आनेवाले सभी सड़कों पर दौड़ रहे सैकड़ों वाहनों का एक ही गन्तव्य होता, अटलजी का सभास्थल। शहर के बाल-वृद्ध-नर-नारी, बाजारों के मजदूर-व्यापारी, कालेजों के छात्र-अध्यापक, कार्यालयों के कर्मचारी-अधिकारी घंटों पूर्व चलकर मैदान में अपना स्थान सुनिश्चित कर लेते। हम युवा लोग उनके सुरक्षा चक्र का दस्ता बनते। हमारी ड्यूटी यह सुनिश्चित करना होता कि कोई सन्देहास्पद मानुस उनके निकट न फटकने पाए।

श्रीमन्त वाजपेयी के प्रखर व्यक्तित्व के प्रति मेरा आकर्षण तब हुआ जब चार दशक पूर्व मैं उच्च विद्यालयीय छात्र था। वह हमारे पिताजी तथा काकाजनों के प्रियवन्धु व सखा “श्री अटलजी” थे। वे सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ तथा पुनश्च भारतीय जनता पार्टी के शैशव काल में श्रीगुरुजी, श्री दीनदयाल जी, नाना जी देशमुख, श्री अटलजी प्रभृति मनीषियों से आत्मीय रुप से जुड़े थे। उनलोगों के मुखारविंद से हर अवसर पर अटलजी की यश:चर्चा सुनता था। फिर पिताजी ने रांची से एक पुस्तक “जागृति के स्वर” लाकर मुझे दिया। लोकहित प्रकाशन, लखनऊ की इस कृति के प्रस्तावना में लिखा था” इसमें श्री अटल बिहारी वाजपेयीजी की अधिकतर कविताओं का संकलन किया गया है। “यह वह दौर था जब “मेरी इक्यावन कविताएं” सहित श्री अटलजी की किसी ग्रंथ का औपचारिक प्रकाशन नहीं हो पाया था।

किशोरवय से ही अटलजी की कविताओं के उद्याम पाठ करने की दिवानगी रही है…
“आज सिन्धु में ज्वार उठा है,नगपति फिर ललकार उठा है,
कुरुक्षेत्र के कण-कण से, फिर पाँचजण्य फूंकार उठा है,
अगणित आघातों को सहकर, जीवित हिन्दुस्थान हमारा,
जग के मस्तक पर रोली सा, शोभित हिन्दुस्थान हमारा।”

“जग को कलश अमृत का देकर,हमने विष का पान किया था, मानवता के लिये हर्ष से अस्थि- वज्र का दान दिया था। ” जब पश्चिम ने वनफल खाकर, छाल पहनकर लाज बचायी, तब भारत से सामगान का, स्वर्णिम स्वर था दिया सुनाई,”

लगभग एक दशक पूर्व रांची में माननीय बलवीर दत्तजी ने अटलजी की जयंती के उपलक्ष्य मे राँची एक्सप्रेस के एक विशेष आयोजन में मुझसे उनकी कविताओं का पाठ कराया था:
“अगणित बलिदानों से अर्जित यह स्वतंत्रता,
अश्रु , श्वेद , शोणित से सिंचित यह स्वतंत्रता,
त्याग , तेज, तपबल से रक्षित यह स्वतंत्रता,
दुखी मनुजता, के हित अर्पित यह स्वतंत्रता।
इसे मिटाने की साजिश करनेवालों से,
कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है,
औरों के घर आग लगाने का जो सपना,
वह अपने ही घर में, सदा खरा होता है।
जबतक गंगा में धार , सिन्धु में ज्वार,
अग्नि में जलन , सूर्य में तपन शेष,
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित,
होंगे अगणित जीवन , यौवन अशेष”

“जागृति के स्वर” में श्रीवाजपेयी के राष्ट्र जागरण के स्वर पढकर मैं अभिभूत हो गया। ये कविताएं बहुत शीघ्र श्रीहनुमान चालिसा की भांति मुझे मुखस्थ हो गई। रामायण की चौपाइयों, गीता के श्लोकों, राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त और रामधारी सिंह की कविताओं के अतिरिक्त श्रीमन्त वाजपेयी की पंक्तियों को प्राय: मैं अपने व्याख्यानो के उचित सन्दर्भ मे उद्धृत करता हूं। श्रोताओं की तालियां मेरा हौसलाफजाई करतीं हैं।

श्री वाजपेयी की कविताओं की समीक्षा करते हैं तो हम पाते हैं कि कथ्य और कलात्मकता (thematic and stylistic pattern) की दृष्टि से वह रामधारी सिंह दिनकर के सन्निकट हैं। दोनों ही मनीषियों के काव्य मे मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता, शौर्य व वीरता के स्वर तथा राष्ट्र जागरण का आह्वान है। “हिमालय” शीर्षक अपनी प्रख्यात कविता में दिनकर राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं तथा हिमालय के माध्यम से भारतवर्ष में पुनर्जागरण का आह्वान करते हैं :
” तू पूछ अवध से राम कहाँ ?
वृन्दा बोलो घनश्याम कहाँ ?
ओ अरि उदास गंडकी बता,
विद्यापति कवि के गान कहाँ ?”
रे! रोक युधिष्ठिर को न यहां ?
जाने दे उनको,उनकोस्वर्गधीर,
पर फिरा हमें गांडीव – गदा ,
लौटा दे अर्जुन भीम वीर ।
कह दे शंकर से आज करें,
वह प्रलय नृत्य फिरएकबार,
सारे भारत मे गूंज उठे ,
हर-हर, बम-बम का महोच्चार ।
तू मौन त्याग, कर सिंहनाद,
रे तपी, आज तप का न काल,
नवयुग शंख ध्वनि जगा रही,
तू जाग, जाग मेरे विशाल ।”

अब श्रीमन्त वाजपेयी की सुसुप्त राष्ट्र मे नवजागरण के आह्वान करती “महोदधि की छाती से” शीर्षक कविता की सुन्दर काव्य पंक्तियाँ देखिए:
शुन्य तटों से सर टकराकर ,
पूछ रही गंगा की धारा,
सगर सुतों से भी बढ़कर मृत ,
आज हुआ क्या.भारत सारा ।
यमुना रोती कहाँ कृष्ण हैं ?
सरयु कहती राम कहाँ है ?
व्यथित गंडकी खोज रही है ,
चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ है ?
अर्जुन का गाँडीव किधर है ?
कहाँ भीम की गदा खो गई ?
किस कोने मे पांचजन्य है ?
कहाँ कृष्ण की शक्ति सो गई ?
अलक्षेन्द्र को धूल चटाने ,
वाले पौरुष फिर से जागो ,
क्षत्रियत्व विक्रम के जागो ,
चनकपुत्र के निश्चय जागो।
पृथ्वी की संतान भीक्षु बन
परदेशी का दान न लेगी,
गोरी की संतति से पूछो ,
क्या हमको पहचान न लेगी?
हम अपने को ही पहचाने,
आत्मशक्ति का निश्चय ठाने,
पड़ी हुई जुठी शिकार को,
सिंह नहीं जाते हैं खाने ।”

जब मेरे प्रग्या चक्षु खुले तो मैंने श्री मन्त बाजपेयी का निकट सान्निध्य प्राप्त करने का प्रण किया। घटना लगभग
एक दशक पूर्व की है। यह मेरे ग्रंथ के आधान का काल था । पुस्तक “The Essence of Gandhian Philosophy” (It’s Impact on our Literature) पूर्ण हो चुकी थी और प्रकाशन से पूर्व इसपर विद्वानों की सम्मति, प्रशस्ति प्राप्त करने के निमित्त मैं देश के विभिन्न नगरों, विश्वविद्यालयों के प्रवास पर था। विद्वानों की मेरी सूची में श्रीअटल विहारी वाजपेयी का नाम शीर्ष पर था। मैंने उनके कार्यालय से सम्पर्क किया। दूसरे ही दिन मुझे उनके निजी सचिव श्री जिंजटा जी का फोन आया। मुझे बताया गया कि अटलजी ने मेरी पुस्तक पर मुझसे चर्चा करने की सहमति प्रदान की है। अगले दिन मैं उचित समय पर 6ए, कृष्ण मेनन मार्ग उपस्थित हुआ। सुरक्षा जांच तथा उचित आवभगत के पश्चात मुझे उनके बैठक कक्ष मे ले जाया गया। अपने संस्कारों के अनुरूप मैंने उनका अभिवादन किया तथा गले लगाकर उन्होंने मुझे अभिसिक्त किया। मैंने अपने पुस्तक के प्रथम अध्याय ” Gandhi : the Literary and Spiritual Mentor” में उद्धृत उनकी पंक्तियों को उन्हें दिखलाया। वह पहले आश्चर्य और फिर आनन्दित हुए। पुस्तक की विषय सामग्री देखकर उन्होंने कहा, ” महात्मा गांधी के दर्शन में हिन्दुत्व के तत्व दिखलाकर आपने श्रेष्ठ कार्य किया है। पुस्तक छपते ही मुझे मेरी प्रति मिल जानी चाहिए।” उन्होंने हंसते हुए कहा। “यह मेरा सौभाग्य होगा” मैंने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया। मैंने उन्हें कहा कि किशोर वय से ही मंचों से मैं आपकी कविताओं का पाठ करता रहा हूँ। उनके आग्रह पर मैंने “एक नहीं, दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतंत्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा” तथा ” न यह समझो कि हिन्दुस्थान की तलवार सोयी है” इत्यादि कविताएं सुनाई। वह बड़े प्रफूल्लित हुए। मुझे बीस मिनट का समय मिला था। लगभग पचास मिनट कैसे ब्यतीत हो गए पता नहीं लगा। उन्होंने आगमन के लिए धन्यवाद किया तथा पुनः मिलने की इच्छा बताकर मुझे विदा किया। जब मैं देहलवी बना, तो प्रायः वह अस्वस्थ रहने लगे।

उनसे मिलने वाले लोगों की संख्या में कटौती की जाने लगी। फिर यह उनके जन्मोत्सव वाले तिथियों 24,25, 26 दिसम्बर को सीमित कर दी गईं। 25 दिसम्बर को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रीमंडल के वरिष्ठ सदस्य प्रभृति विशिष्टजन ही मिल पाते थे। 24 दिसम्बर को मिलने वालों की सूची में प्राय: मेरा नाम होता। पिछली बार जब मुझे उनका दर्शन हुआ उनका कक्ष व विस्तर किसी विशिष्ट अस्पताल के आइसीयू में बदल चुका था। मेरे साथ उनके परिवार के सदस्य, सम्बन्धी तथा उनके मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य थे। मै उनका हाथ अपने हाथों में लिए लगभग 10 मिनट तक उनके साथ रहा। जिंजटाजी उनके कान में हम सबका परिचय कराने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन वह देख व सुन पाने की स्थिति में नहीं थे। सबकी आखें आप्लावित थीं। सबने मन ही मन प्रणाम किया तथा विदा हुए।

श्री अटल विहारी वाजपेयी के युगांतरकारी व्यक्तित्व का फलक इतना व्यापक है कि कुछ सौ शव्दों मे उनके वृत का वर्णन असंभव है। उनके जैसी विभूतियां सदियों बाद धरा धाम पर प्रकट होतीं हैं। मैं उनकी ही कुछ पंक्तियों को मात्र एक शव्द ‘वर्ष’ की जगह ‘दिवस’ सम्पादित कर, उद्धृत कर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ :
“दिवस हुए ही कितने, पथ पर राही एक चला था,
अन्धकार का वक्ष चीरकर, दीपक एक जला था।
दैन्य दास्य का पंक दबाकर शतदल कमल खिला था,
काल रात्रि को भेद, ज्योति का प्रवर पूंज निकला था,
कैसा था वह भग्त स्वयं भगवान बन गया?
कुम्भकार की कृति , स्वयं निर्माण बन गया ?
आज नहीं वह किंतु पंथ पर चरण चिन्ह अंकित है।
मनु के वंशज प्रलय काल से क्यों शंकित है।
आओ युग के सपनों को साकार करें हम
मृतकों में नवजीवन का हूंकार भरें हम”

 

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