मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, …कूच से क्यों डरूं !

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atal-bihariji

अटलजी की मौत आज वास्तव में कविता बन गई। जबतक देश में लोकतंत्र रहेगा, उनके चाहने वाले रहेंगे, उनकी कविताओं के स्वर में अपना स्वर देंगे 

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रिपोर्ट4इंडिया ब्यूरो।

नई दिल्ली। अटलजी के व्यक्तित्व और जीवन सफर के बारे में ‘हरिगुन’ लिखने जैसा असाध्य काम है। संसद ही नहीं जब वे किसी सभा में बोलने के लिए होते थे तो बस सबकी निगाहें उनके मुख की ओर, उनके हाव-भाव को पढ़ लेने की ओर होता था। केवल उनके स्वर से उनके शब्दों के अर्थ नहीं समझे जा सकते थे, इसके लिए उनके चेहरे का भाव और हाथों का इशारा समझना जरूरी होता था। इस मर्मज्ञ राजनीतिज्ञ का कवि हृदय राजनीति, धर्म, जीवन दर्शन, लोक-परलोक सब मथता और ऐसा अमृत निकलता कि जो चारों तरफ अमरता बांटता। बार-बार उनकी कविताएं सुनने और गुनने का मन करता है- मौत से ठन गई कविता उन्हीं में से एक है-

ठन गई, मौत से ठन गई।

जूझने का मेरा इरादा न था,

मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,

यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,

ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,

लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,

सामने वार कर फिर मुझे आज़मा

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,

शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,

दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,

न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,

आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,

नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,

देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई

मौत से ठन गई

 

 

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