बदलाव से ‘बयार’ बदलने की जुगत!

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पश्चिम बंगाल में बदलती ममता राजनीति के संदर्भ में ब्राह्मण सम्मेलन के बाद दही-चुरा उत्सव काफी कुछ बयां कर रहा। ऐसे में, ममता बनर्जी की वर्तमान राजनीतिक बदलाव को उनकी हिन्दू विरोध की छवि से उत्पन्न हो रहे विपरित वातावरण को रोकने और उसे पार्टी के पक्ष में करने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। 

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मनोज कुमार तिवारी/रिपोर्ट4इंडिया ब्यूरो।

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की राजनीति पूरी तरह से मुसलिम तुष्टिकरण पर आधारित रही है। पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी अपने वोट बैंक को पाले में रखने के लिए हमेशा से भरपूर तुष्टिकरण का प्रदर्शन करती रहती हैं। यहां तक की अपनी वेश-भूषा से स्वयं ममता बनर्जी इस संदेश को देतीं रहीं हैं। सांप्रदायिक दंगे, नौकरियों में मुसलिम आरक्षण, ईमामों के लिए पेंशन, दुर्गापूजा और मूर्ति विसर्जन पर ममता का स्टैंड आदि कई ऐसे लक्ष्ण हैं, जो ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की नीति को पुष्ट करता है। परंतु, राज्य में औरएसएस और बीजेपी के बढ़ते प्रभाव से ममता बनर्जी परेशान हैं। ममता बनर्जी के सिपहसालार रहे मुकुल रॉय के बीजेपी में शामिल होना भी ममता बनर्जी के लिए और संकट बढ़ाने वाला है।
राजनीतिक तौर पर देखें तो अब, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति के प्रभावस्वरूप वहां हिन्दुओं में प्रतिक्रिया देखी जा रही है। इस प्रतिक्रिया को राज्य में मजबूत होती बीजेपी और आरएसएस से भी हवा मिल रही है। दूसरी बात यह कि, राज्य में मोदी फैक्टर भी बड़ा काम कर रहा है। बड़ी संख्या में जनता को लगता है कि मोदी विजनरी हैं और उनके रस्ते राज्य की आर्थिक स्थिति में बदलाव संभव है। मोदी की लोकप्रियता का प्रभाव यह है कि स्वयं ममता बनर्जी प्रधानमंत्री मोदी पर सीधे तौर पर हमला से बचती रहीं हैं। इसका प्रभाव भी ममता बनर्जी समझ रही हैं। ममता बनर्जी समझ रहीं हैं कि 2019 का लोकसभा चुनाव में पाने के लिए उनके पास बहुत कुछ नहीं है लेकिन, खोने के लिए बहुत कुछ है।
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ऐसे में संभवत: ममता बनर्जी बीजेपी को रोकने के लिए अपनी पारंपरिक राजनीति में बदलाव का फैसला लिया है। ममता बनर्जी के बदलाव में अब एक समन्वय की राजनीतिक रणनीति साफतौर पर दिख रही है। ब्राह्मण-पुरोहित सम्मेलन को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। सार्वजनिक रूप से हिन्दू पर्व-त्यौहार को मनाने और उसका प्रसार करने का एक राजनीतिक कदम तृणमूल कांग्रेस में बदलाव के रूप में देखा जा सकता है। चर्चा यह भी है कि ईमामों की तरह राज्य में पंडितों को भी पेंशन देने की तैयारी में ममता सरकार है।
दरअसल, ममता के लिए राज्य में राजनीतिक परिस्थितियां भिन्न होतीं जा रहीं हैं। तृणमूल कांग्रेस ने सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) को जब सत्ता से हटाया तो अपने लंबे समय के शासनकाल के बाद सीपीआई कमजोर हो गई थी। बुद्धदेव भट्टाचार्य ज्योति बसू का विकल्प नहीं बन सके थे। लेकिन, आज ममता बनर्जी का सामना एक ऐसी पार्टी से हो रहा है, जिसकी केंद्र में व देश में एक मजबूत शासन है। कई मौकों पर भले ही ममता ने मोदी सरकार के नीतियों के खिलाफ हूंकार भरी लेकिन उसका लाभ उन्हें उस प्रकार से नहीं मिला, जैसा कि मिलना चाहिए था। दूसरी तरफ, एक-एक कर के ममता के राजनीतिक दोस्त भी कमजोर होते जा रहे हैं। कांग्रेस में सोनिया गांधी के अवसान के बाद, केजरीवाल, मुलायम (अखिलेश) और लालू की भी पतली हालत भी ममता के सामने हैं। ममता के सामने एक बड़ी राजनीतिक समस्या यह भी है कि उसके पड़ोसी राज्यों पूर्वोत्तर में उतरोत्तर बीजेपी मजबूत हो रही है।
तीन तलाक का मामला भी ममता बनर्जी को कम परेशान नहीं कर रहा है। एक महिला होते हुए भी ममता स्वयं इस मुद्दे पर राजनीतिक रूप से घिरती दिख रहीं हैं। कारण यह कि, मुसलिम महिलाओं में ममता बनर्जी की छवि कट्टरपंथी मुसलिम समर्थन की है। दूसरी तरफ, यह मुद्दा साफतौर पर बीजेपी के पक्ष में ही जाता दिख रहा है।
ऐसे में, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की वर्तमान राजनीतिक बदलाव उनकी हिन्दू विरोध की छवि से उत्पन्न हो रहे विपरित वातावरण को रोकने और उसे पार्टी के पक्ष में करने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है।

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