राम के साथ चलना भारतीय जीवन के लिए बड़ा आश्वासन

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अवधपुरी से राम का निकलना मात्र अपने पिता के सत्य की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि समाज के भीतर सत्य की जो चिनगारी है, उसे धधकाने के लिए है।

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डॉ. मनोज कुमार तिवारी

धर्म-संस्कृति डेस्क/रिपोर्ट4इंडिया।

सदियों से भगवान श्रीराम और भारतीय मन-जीवन पर्यायवाची तौर पर एक-दूसरे से सने हुए हैं। भारतीय लोकचित्त श्रीराम को सत्य, पराक्रम और कोमलता के रूप में देखता है और इसीलिए संघर्ष भरे समाज-जीवन में हमेशा राम की छवि रहती है, राम गाथा रहती है जो कभी पूरी ही नहीं होती। विद्वान भारतीय मनीषी स्व. विद्या निवास मिश्र कहते हैं, भारतीय महामानव जातीय स्मृति में जो रामकथा है वह आश्वासन और मार्गदर्शन के रूप में है। यह आश्वासन राम की जाग्रत प्रतीति से जुड़ा है। राम के साथ चलना जीवन के लिए बड़ा आश्वासन है। अवधपुरी से राम का निकलना मात्र अपने पिता के सत्य की रक्षा के लिए नहीं है बल्कि समाज के भीतर सत्य की जो चिनगारी है, उसे धधकाने के लिए भी है।

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वनवासी राम धर्मरथ पर सवार होकर विजय यात्रा के लिए निकलते हैं, यही बात भारतीय लोक चेतना में ऐसी बसी कि वे देवताओं से भी बड़े हो गए। शरीर में रक्त-प्रवाह की तरह भारतीय जनमानस से राम कभी अलग नहीं हो सकते। राम पिता के बचन की रक्षा के लिए राजधानी छोड़ते हैं, वन में हरण की गई पत्नी की खोज के लिए निकलते हैं और युद्ध में भाई लक्ष्मण को मूर्छित देख ऐसा भाव विह्वल हो उठते हैं-

जौं जनतेऊ बन बन्धु बिछोहू, पिता बचन मनतेऊं नहिं ओहू।।

राम की यह करूणा तो सर्वसाधारण की करूणा है। राम के भीतर का ‘राजा’ तो हर बार और हमेशा टूटता रहता है।

एकबार फिर विद्या निवास का राम में रमता मन-छवि का दर्शन होता है कि पूरे भारतीय परिवेश में राम विस्मृति के विषय ही नहीं रहे हैं, वे बस मन में बसे रहते हैं। पुतलियों से कभी क्षण भर भी नहीं उतरते। राम किसी सन्-संवत् में नहीं बंधे, किसी राजनीति में नहीं बंधे, किसी देश में नहीं बंधे, हमारे आपके लिए बिहरते रहते हैं। शबरी बन सकें, निषाद बन सकें, कोल-किरात बन सकें। अभिशप्त राम ही तो परम मानवीय हैं।

तभी तो, फारूक अब्दुल्ला  कहते हैं, पता नहीं क्यों उन्हें रामजी से बहुत लगाव है और गाने लगते हैं …‘किस गली गयो मोरे राम, मोरा आंगन सुना-सुना लागे।‘

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