स्वयं के पाले ‘संस्कार-संघर्ष’ से जीवन भर उलझते रहे नामवर

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namvar singh

“वाराणसी (काशी) जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक सभ्यताई समाज में जन्मे व पले-बढ़े नामवर सिंह को स्वयं के पाले संस्कार और साहित्यिक विधान के वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ कशमकश रहा। कई मौके पर स्वीकार करते रहे कि पूर्व निधारित संस्कारों से वे निरंतर लड़ते रहे। नामवर सिंह ने जितना लिखा नहीं, उससे अधिक अपने भाषणों, साहित्य संगोष्ठियों, सेमिनारों और घर-बाहर के बैठकों में बोला। हालांकि, यदा-कदा साहित्यिक स्वाभाव के तौर पर उनकी मुश्किलें भी पाठकों के सामने आतीं रहीं है।“

डॉ. मनोज कुमार तिवारी।

प्रख्यात साहित्यकार व आलोचक नामवर सिंह उस अंतिम यात्रा पर निकल गए हैं, जहां से वे दोबारा उसी देह व स्वरूप में नहीं लौटेंगे। वामपंथ विचार सिद्धांत में धर्म मत से स्वयं को अलग रखने, उसे मानने, दिखने-दिखाने की प्रतिबद्धता कई स्तरों पर भले ही नामवर सिंह के समक्ष रही हो, पर वे स्वयं को जन्म और जीवन के उस स्वभाव से कभी अलग नहीं कर सके, जो ग्रामीण संस्कार से मिला। उनकी रचनाओं को पढ़ते-समझते हुए उनके स्वभाव-संस्कार व रचना संसार में मैं कई अंतरद्वदंव पाता हूं।

वाराणसी (काशी) जैसे सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक सभ्यताई समाज में जन्मे व पले-बढ़े नामवर सिंह को स्वयं के पाले संस्कार और साहित्यिक विधान के वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ हमेशा कशमकश रहा। कई मौके पर स्वीकार करते रहे कि पूर्व निधारित संस्कारों से वे निरंतर लड़ते रहे। नामवर सिंह ने जितना लिखा नहीं, उससे अधिक अपने भाषणों, साहित्य संगोष्ठियों, सेमिनारों और घर-बाहर के बैठकों में बोला। हालांकि, यदा-कदा साहित्यिक स्वाभाव के तौर पर उनकी मुश्किलें भी पाठकों के सामने आतीं रहीं है।

जिस दौर में सरकार संरक्षित शैक्षणिक व्यवस्था में नामवर सिंह शामिल होते हैं, वह नेहरू समर्थित वामपंथी विचारों से फलीभूत था। साथ ही, वैचारिक रूप से विभाजन और आजादी के बाद पैदा हुई परिस्थितियों के संदर्भ में नये लेखन की चुनौती भी उनके सामने थी। नामवर सिंह इस चुनौती को स्वीकार करते हैं। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और पठन-पाठन के तरीकों में बदलाव को लेकर काम करते हैं। इस झंझावात में दो नामवर दिखाई देते हैं। एक वह, जो अपने पूर्ववर्ती साहित्यिक और जीवन संस्कारों से जो ‘समझ व मन:स्थिति’ को प्राप्त किया था और दूसरा वह जिसके सामने सरकारी सैद्धांतिक-वैचारिक नीतियों के अनुरूप वामपंथी वसूलों को लागू करने की चुनौती थी।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में जो साहित्यिक संस्कार सामने था, और जिससे तत्कालीन नामवर सिंह की अभिरुचियां निर्मित हुईं, जिन्हें वे पूर्व निर्धारित संस्कार का नाम देते हैं। इसका प्रभाव रहा कि वे स्वयं को गंवई संस्कार व जुबान से बाहर नहीं निकाल पाए। अक्सर वैचारिक स्तर पर, जो कशमकश उनके भीतर झलकता है वह बाहर से कम, उनके अंतरद्वंद्व में ज्यादा दिखता है। साहित्यकार प्रकाश मनु के साथ औपचारिक साक्षात्कार में उन्होंने माना कि उनकी बड़ी मुश्किल अपने आप से, अपनी साहित्यिक अभिरुचियों से गहरे संघर्ष के रूप में रहा है। उनका यह ईशारा वैचारिक प्रतिबद्धता और पूर्ववर्ती साहित्यिक अभिरुचियां के बीच संघर्ष से था, जिसे वे पूर्व निर्धारित संस्कार भी कहते हैं। हालांकि, इन सबके बीच वैचारिक प्रतिबद्धता को सामने रखने का वे साहस भी दिखाते हैं। कहते हैं, शास्त्र का अनुचर हो जाना कोई अच्छी बात नहीं, पर मन में सम्मान का भाव तो है।

यायावरी जीवन के दौरान उन्होंने दिल्ली को स्थायी आशियाना जरूर बनाया, पर बनारस व जीयनपुर (पैतृक गांव) उऩके जीय से ओझल नहीं हो सका। देश के किसी भी कोने में रहे, बनारस जाने का कोई मौका वे नहीं छोड़ पाए, बनारस की बैठकी व बतरस को भी तरसते रहे। बनारसी ‘राग व ठाठ’ को उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता भी उनसे अलग नहीं कर सकी। पहले ही कि तरह, मानस के प्रसंग पारिवारिक व जीवन की तमाम समस्याओं को सुलझाने में सहायक रहे।

उनके प्रिय छोटे भाई और साहित्यकार काशीनाथ सिंह के बारे में वे कहते थे, काशी तो उनकी समस्याओं को ढोने के लिए ही पैदा हुआ है। काशीनाथ सिंह लिखते हैं ‘भले ही उन्होंने (नामवर सिंह) दिल्ली को ठौर-ठिकाना बनाया पर उनके जड़ में जीयनपुर और बनारस था। उस दौर में जब चिट्ठी आने में देर होती तो माई उन्हें ‘कठकरेजी’ (काठ का कलेजेवाला) कहती, पिताजी भर्राए गले से तंज करते कि ‘अब …वे गए तो गए कि। ऐसी स्थिति में स्वयं काशीनाथ सिंह को वे  ‘विदेह’ से लगने लगते।‘

आज नामवर सिंह जिंदगी के अंतरद्वंद्व के साथ सांसारिक ‘लाग’ और ‘मोह’ के बंधन से हमेशा के लिए निकल गए परंतु, जीवन में रहते नहीं निकल पाए। यह पीड़ा उन्होंने अभिव्यक्त भी कि है। वे लिखते हैं, वह दिन गए जब अपने को ‘सुजान भगत’ समझता था। तब ‘लाग’ थी। ‘लाग की आग पर अब काफी राख’ पड़ चुकी है, फिर भी कहीं न कहीं थोड़ा सा-मोह बचा रह गया है। होना भी कहां था जो हम समझे थे, ‘दुख भी यहीं है, मोह भी यहीं है।‘                              (लेखक रिपोर्ट4इंडिया के संपादक हैं)।

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