BHU : ‘महामना मार्ग’ के उलट SVDS में नियुक्ति, …विरोध का ‘आंदोलन’ जायज

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काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) की स्थापना महामना पंडित मदन मोहन मालवीयजी ने सन् 1916 में की थी जबकि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (एसवीडीएस) की शुरुआत 1918 में हुई थी जिसके नियम मालवीयजी ने ही तय कर दिए थे। इस संकाय में सनातन धर्म के सिद्धांत को मानने वाले व उसका अनुसरण करने वालों की ही नियुक्त हो सकती है। यह विश्वविद्यालय के वेवसाइट पर भी उल्लेखित है।   

मुसलिम प्रोफेसर की नियुक्ति हिन्दू धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षार्थ देश में एकमात्र बचे संकाय को भी समाप्त करने की कोशिश है और यह कोशिश देश में अपने हिन्दुओं नीति-नियति की व्यवस्था के संरक्षण का हवाला देने वाली पार्टी बीजेपी के सरकार में हो रही है। 

यह समझना होगा कि बीएचयू में संस्कृत भाषा का अलग डिपार्टमेंट है जो कला संकाय के अंतर्गत आता है। इस संस्कृत विभाग में हर किसी के प्रवेश की और पढ़ाने की अनुमति है। 

डॉ. मनोज कुमार तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया।  

नई दिल्ली (वाराणसी से इनपुट सहित)। प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में देश-विदेश में ख्याति प्राप्त दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों में शूमार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बनारास हिन्दू विवि) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में मुसलिम प्रोफेसर की नियुक्ति पर घमासान मचा है। संकाय के छात्र सहित वाराणसी का विद्वत परिषद के लोग उसका विरोध कर रहे हैं। अति-प्रतिष्ठित विश्वविद्याल काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने आजादी के आंदलोन काल में सन् 1916 में की थी। एशिया के एकमात्र सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय एक स्वायत्तशासी उत्कृष्ठ संस्था है। Banaras Hindu University

दुनिया की पवित्र व पुरातन धार्मिक नगर वाराणसी में पतितपावनी गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित यह विश्वविद्यालय भारत की धार्मिक राजधानी प्राच्य विद्या ज्ञान केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध है। इस विश्वविद्यालय में सभी प्रकार के स्नातक, स्नातकोत्तर व शोध स्तर के शैक्षणिक कार्यक्रम आमंत्रित किया जाता है, जिसमें प्राचीन भारतीय विषयों जैसे वेद, ज्योतिष, धर्मागम, आयुर्वेद इत्यादि से लेकर आधुनिक विषयों जैसे औषधि, शल्य, जैव-प्रौद्योगिकी, बॉयोइन्फार्मेटिक्स, जैव-चिकित्सा, जैव-रसायन, संगणक विज्ञान एवं अन्य विज्ञान विषयों कृषि, अभियांत्रिकी, प्रबन्धन, कानून, शिक्षा इत्यादि के विभिन्न विभाग सम्मिलित हैं।

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विश्वविद्यालय परिसर में ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ है जिसकी स्थापना वर्ष से लेकर उसके उद्देश्य तक के बारे में स्पष्ट उल्लेखित है। इस विभाग की स्थापना 1918 में की गई। महाविद्यालय का यह संकाय सनातन हिन्दू धर्म और कर्मकाण्ड के साथ-साथ इन सबसे जुड़े साहित्य के निरंतर उन्नयन और संवर्धन पठन-पाठन के लिए जाना जाता है। इस विभाग का पुराना नाम वैदिक महाविद्यालय था, बाद में इसी का नामान्तर प्राच्यविद्या धर्मविज्ञान संकाय हुआ। इसके बाद यह संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के नाम से सुविख्यात हुआ।

इस विभाग के लिए नियम महामना मदन मोहन मालवीयजी ने खुद एक शिलालेख पर अंकित करवा दिया था ताकि इससे यहां प्रवेश करने वाला हर इंसान परिचित हो। वर्तमान में इस संकाय में कुल आठ विभाग हैं। जिसमें वेद विभाग, व्याकरण विभाग, साहित्य विभाग, ज्योतिष विभाग, वैदिक दर्शन विभाग, जैन-बौद्ध दर्शन विभाग, धर्मशास्त्र मीमांसा विभाग एवं धर्मागम विभाग है। इन विभागों में लगभग 23 विषयों का शिक्षण होता है।

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संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग की स्थापना प्राचीन भारतीय शास्त्रों, संस्कृत भाषा और साहित्य के अध्ययन को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए की गई, इस संकाय का प्रमुख उद्देश्य समाज में धर्म, अध्यात्म, ज्योतिष और तंत्र के बारे में व्याप्त भ्रान्तियों को दूर करना और विशेष रूप से समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए नैतिकता और धर्म के सर्वोपरि मूल्यों को बहाल करना है। यहां परंपरागत तरीकों के साथ-साथ मौखिक-सह-लिखित परंपरा को ध्यान में रखते हुए शास्त्रीय ग्रंथों की ‘स्ट्रिक्टली’पढ़ाई होती है।

Sanskrit-BHU

इस संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध वहां के छात्र कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि इस संकाय में किसी अन्य धर्म के लोगों के प्रवेश को निषेध माना गया है। हालांकि लोग छात्रों के इस विरोध को संस्कृत भाषा के साथ जोड़कर देख रहे हैं जबकि यह समझना होगा कि बीएचयू में संस्कृत भाषा का अलग विभाग है, जहां किसी को भी प्रवेश की अनुमति है। चुंकि यह विभाग पुर्णतः सनातन धर्म की व्यवस्थाओं को समझने जानने और पठन-पाठन का केंद्र है। ऐसे में इस विभाग को इस तरह की पाबंदी के साथ रखा गया है।

BHU svdv Protest

यहां छात्रों व पर्दे के पीछे संकाय के प्रचार्यों द्वारा किए जा रहे विरोध में भी यही संस्कार देखने को मिल रहा है जब विरोध कर रहे छात्र सभी नैतिक मूल्यों को समाहित किए हुए वैदिक परंपरागत रीति रिवाजों का पालन करते हुए विरोध कर रहे हैं। छात्र यहां कभी बुद्धि-शुद्धि यज्ञ कर रहे हैं तो कभी रुद्राभिषेक तो कभी प्रदर्शन के तौर पर हनुमान चालीसा का पाठ साथ हीं कभी-कभी वह वीसी के विरोध में नारेबाजी भी कर रहे हैं।

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इस संकाय में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर विरोध इसलिए है कि बीएचयू की स्थापना के समय जो उद्देश्य निर्धारित किए गए थे उसमें लिखा गया था कि वैदिक विद्यालय (जो वर्तमान में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) है जहां वेद, वेदांग, स्मृति, इतिहास तथा पुराणों की शिक्षा दी जाएगी। ज्योतिष विभाग में एक ज्योतिष संबंधित तथा अंतरिक्ष विद्या संबंधित वेधशाला भी निर्मित की जाएगी। इस वैदिक कॉलेज का कार्य उन हिंदुओं के अधिकार में होगा जो श्रुति, स्मृति तथा पुराणों द्वारा प्रतिपादित सनातन धर्म के सिद्धांतों को मानने वाले होंगे।

इस विश्वविद्यालय में वर्णाश्रम धर्म के नियमानुसार ही प्रवेश होगा। इस विद्यालय (संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय) के अतिरिक्त अन्य सभी विद्यालयों में सब धर्मावलंबियों तथा सब जातियों का प्रवेश हो सकेगा तथा संस्कृत भाषा के अन्य शाखाओं की शिक्षा जाति और सम्प्रदाय का भेदभाव किए बिना सबको दी जाएगी। ऐसे में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर विरोध जायज है। विरोध कर रहे छात्र स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि उन्हें डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति से कोई आपत्ति नहीं है। वह नियुक्ति अगर संस्कृत विभाग में होती तो विरोध ही नहीं होता। लेकिन बीएचयू की स्थापना के समय से ही जहां एक विशेष विभाग को विशेष व्यवस्था के तहत रखा गया है, उसको भंग करने की यह एक कोशिश है, जिसका वह विरोध कर रहे हैं।

जबकि इस पूरे मामले में दिल्ली की मीडिया के कई धड़े लोगों के सामने गलत तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं। वे ऐसा प्रस्तुत कर रहे हैं जैसे छात्र संस्कृत विभाग में डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं जबकि सच इसके ठीक उलट है। यह बीएचयू प्रशासन का एक अदूरदर्शी कदम है, जिसे नियमों का हवाला देकर सही ठहराया जा रहा है, जो आने वाले समय में हिन्दू धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षार्थ देश में एकमात्र बचे संकाय को भी समाप्त करने की कोशिश है। और यह कोशिश देश में अपने हिन्दुओं नीति-नियति की व्यवस्था के संरक्षण का हवाला देने वाली बीजेपी सरकार के काल में हो रही है।

अपनी कोशिश के रूप में विरोध कर रहे छात्रों ने विश्वविद्यालय के विजिटर राष्ट्रपति महोदय व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी याचिका प्रेषित की है जिसमें बताया गया है कि यह नियुक्ति महामना मालवीयों के आदर्शों व संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के लिखित सिद्धांतों के खिलाफ है। प्रो. फिरोज खान की नियुक्ति का बिल्कुल विरोध नहीं हैं, उनकी नियुक्ति आर्ट्स फैकल्टी के संस्कृत विभाग में हो सकती है, जिसपर किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।

विश्वविद्यालय के सूत्र बताते हैं कि यह नियु्क्ति पूरी तरह से विश्वविद्यालय के वीसी राकेश भटनागर का आदेश है।  बताया जा रहा है कि राकेश भटनागर जेएनयू के पूर्ण वामपंथी मिजाजी व्यक्तित्व हैं, जिसने बीएचयू को जेएनयू में परिवर्तित करने का बीड़ा उठाया हुआ है। डेढ़ साल से अधिक समय तक बीएचयू वीसी के रूप में काम करते हुए राकेश भटनागर ने जेएनयू के 145 वामपंथी मिज़ाजी व्यक्तित्वों को विवि के विभिन्न विभागों में नियुक्त किया है। आरोप है कि इन नियुक्तियों के पीछे बाहरी संस्था के माध्यम से पैसे की वसूली की जाती है और केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के बड़े अधिकारी इससे अनभिज्ञ नहीं है। राकेश भटनागर को लेकर वाराणसी की जनता में भारी रोष है। यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि बीजेपी के शासन में यह सबकुछ हो रहा है। सवाल बीजेपी और आरएसएस का हिन्दू संरक्षण व राष्ट्रवाद पर भी खड़ा हो रहा है। कहा जा रहा है कि पर्दे के पीछे ऐसे वामपंथियों को संरक्षण देने का काम बीजेपी की केंद्रीय सरकार कर रही है। वाराणसी और हिन्दू जनमानस के सामने उपरोक्त प्रकरण सुलगता सवाल है, जिसके जवाब का इंतजार हर किसी को है।

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