‘मी लॉर्ड’ …काश! समय रहते निभाई होती थोड़ी-सी ‘जिम्मेदारी’

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“आज दंगे में 27 लोगों की मौत और ढाई सौ लोगों के घायल होने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी कि ‘दिल्ली में 1984 दोबारा दुहराने नहीं देंगे’ विचार के केंद्र में है। विरोध के नाम पर सड़क जाम से परेशान लोग न्याय की उम्मीद लेकर दो बार दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के चौखट पर पहुंचे पर, जजों ने बातें तो कानूनी की, पर सीधी कार्रवाई आदेश से परहेज़ किया। इससे लोगों में मायूसी बढ़ी। …अफसोस …समय रहते न्याय मिल जाता, तो संभवत: दिल्ली को ये दिन देखने नहीं पड़ते।”

डॉ. मनोज कुमार तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया/ नई दिल्ली।

अपने समय और युग से आगे की सीख देने वाले गोस्वामी तुलसीदास श्रीरामचरितमानस में लिखते हैं, …‘का बरसा जब कृषि सुखाने …समय चुक पुनि क्या पछताने।’ अफसोसनाक यह की, आज दिल्ली की चिंता जताने वाली कोर्ट यदि समय पर कोई ठोस निर्णय ले पाती तो शायद ही आज यह दिन देखने पड़ते। दिल्ली के अमन पसंद लोग न्याय की उम्मीद लेकर दिल्ली हाईकोर्ट के चौखट पर गए थे। धरना-प्रदर्शन के नाम पर तीन राज्यों को जोड़ने वाली एक अति महत्वपूर्ण सड़क को बंद कर लाखों लोगों के जीवन को नरक बनाने से रोकने की अपील की थी। परंतु, 14 जनवरी को सुनवाई के बाद कोर्ट ने न तो सड़क से प्रदर्शन खत्म करने का आदेश दिया और न ही पुलिस को सड़क खोलने का। पुलिस के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं किए जाने को आधार बनाकर ही तो परेशान लोग कोर्ट गए थे।

23 फरवरी की रात साजिशन जब शाहीन बाग की तर्ज पर मुस्तफाबाद में प्रधान सड़क को बंद कर दिया गया तो आसपास रहने वाले लोगों के हाथ-पाव फूल गए। उन्हें यब यह लगा कि अनिश्चितकाल तक सड़क बंद होने से उनका भविष्य बर्बाद हो जाएगा तो उन्होंने इसका विरोध का फैसला लिया। कपिल मिश्रा के नेतृत्व में सीएए के समर्थन में धरना शुरू हुआ तो धरना-प्रदर्शन कर रही मुसलिम महिलाओं के पीछे छुपे दंगाइयों ने पत्थरबाजी और गोलीबारी शुरू कर दिल्ली की फिजा में दंगे का दंश घोल दिया। आज जब सबकुछ जल गया तो दिल्ली हाईकोर्ट का दर्द बढ़ गया।

दिल्ली की चिंता पर सक्रिय हुए माननीय जज साहब ‘भड़काऊ भाषण’ पर रूक गए। कपिल मिश्रा का वीडियो कोर्ट में चलाया जाता है और फिर माननीय जज साहब बदल-बदले नज़र आते हैं। जो शाहीन बाग को विरोध-प्रदर्शन का हक करार देते हैं, वे  कपिल मिश्रा के विरोध के विरोध में खड़े होने के आह्वान को भड़काऊ बता देते हैं।

कोर्ट ‘देश के गद्दारों को गोली मारने’ के नारे को कटघरे में खड़ा कर रहा है। ऐसे में तो, ‘दंगाइयों को देखते ही गोली मारने’ का फरमान भी गलत होना चाहिए? क्या कोर्ट यह बताने का प्रयास प्रयास कर रहा है कि …‘दंगा’ करने वालों और ‘देश के गद्दारों’ में अंतर है। आज के बुद्धिमान…विद्वान…काबिल न्याय देवता की बुद्धि पर तरस है। शांति की चिंता करने वाले ‘न्याय देव’ आपसे तो शहर के शांति प्रिय लोगों ने बस इतनी-सी गुजारिश की थी कि चलती सड़क को स्थायी प्रदर्शन का अड्डा बनाने वालों से मुक्ति दिलाइए पर, आपने सुनी नहीं। अब जब सबकुछ खाक में मिल गया तो आप सक्रिय हुए हैं।

उधर, सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग की सुनवाई को टालते हुए कहा कि …क्या करें, माहौल अभी ठीक नहीं। सवाल है क्या सुप्रीम कोर्ट को भी शाहीन बाग से डर लगता है? क्या सुप्रीम कोर्ट भी माहौल देखकर फैसला करेगा? …तो फिर, दिल्ली पुलिस का ‘औरतों-बच्चों वाला माहौल’ देख शाहीन बाग पर कोई एक्शन नहीं लिया तो वह गलत कैसे?  सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि आज भी सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि सार्वजनिक सड़क को बंद कर प्रदर्शन ठीक नहीं पर आदेश नहीं दिया। ऐसा ही दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि सड़क पर प्रदर्शन ठीक नहीं। परंतु, जब आदेश देना हुआ तो सड़क खाली करने का कोई जिक्र नहीं। दिल्ली दंगे को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की है कि दिल्ली को 1984 नहीं दुहराने देंगे। देखना होगा कि इसे मात्र टिप्पणी के तौर पर लिया जाएगा या फिर आदेश में भी परिणीत होगा।

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