…जीवन भर नहीं, पीढ़ियों तक जिन्दा रहें

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प्रस्तुती-रिपोर्ट4इंडिया।
विद्वतजन विष में से अमृत ढूंढ़ निकालते हैं। रसायनें इसी प्रकार बनती है। पारा, गंधक जैसे अखाद्य व विषाक्त पदार्थ मकरध्वज जैसी रसायन में परिणत होकर काया-कल्प की भूमिका बनाते हैं। जीवन के अनगढ़ स्वरूप को यदि सुगढ़ बनाने का पुरुषार्थ बन पड़े तो उस भारभूत कुरूपता में से कीचड़ में से, कमल उगने जैसा चमत्कार हस्तगत हो सकता है।
जीवन का उथला स्वरूप मल, मूत्र के रक्त, माँस के घिनौने आवरण से आच्छादित है। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों की कमी नहीं। पशु प्रवृत्तियाँ हर घड़ी छाई रहती है। कुत्सित अस्थिर, अनगढ़, कुरूप और घृणित स्तर का जीवन हर किसी पर लदा दीखता है। हमारी कुछ अपनी मौलिकता एवं विशेषता होनी चाहिए। विशालकाय भवन न सही कोई चकित करने वाले घटनाक्रम न सही, इतना तो किया ही जा सकता है कि अपनी सुरुचि को प्रोत्साहित किया जाय, और उसके सहारे एक महकने वाले सुरम्य उद्यान की तरह जीवन को सद्गुणों की पुष्प वाटिका बना दिया जाय। दूसरों को बनाना, ढालना, उठाना कठिन हो सकता है किन्तु शरीर और मन तो अपना ही है उसे इच्छानुरूप बनाने में किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं। अपनी स्वतन्त्र संरचना से-मात्र आत्म नियन्त्रण के सहारे उसे इच्छानुसार मोड़ा मरोड़ा और सुधारा सँजोया जा सकता है।
लम्बे समय तक जीवित रहने की आशा करना अच्छी बात है, पर उससे भी अच्छी बात यह है कि हमारी कृतियाँ चिरकाल तक अक्षुण्ण बनी रहें और उनसे अगली पीढ़ियाँ प्रेरणा लेती रहें। जो निरन्तर अच्छाई सोचेगा और ऊँचा उठने की योजना बनाता रहेगा उसी के लिए यह सम्भव है कि एक दिन अपने सपनों को साकार होते हुए देखे और वरिष्ठों में न सही श्रेष्ठों में अपनी गणना करा सके।
बूढ़े आदमी अपनी काया और सम्पदा से अधिक मोह बढ़ाते और मौत के भय से अधिक भयभीत रहते देखे गये हैं। ऐसा बुढ़ापा हम पर न छाये, यह ध्यान रखने की बात है। आयु के साथ बाल पके, दाँत गिरे और झुर्रियाँ पड़ें, इस प्रकृति नियम में किसी का क्या हस्तक्षेप हो सकता है पर यह अपने हाथ की बात है मानसिक जवानी बनाये रहे। न किसी से चिपकें न किसी से डरें। ऐसा करने पर ही प्रसन्नता और सरसता भरा जीवन जिया जा सकता है।
जीवन एक प्रश्न है जिसका उत्तर है-मृत्यु। मरण में न कुछ भयावह है और न अचरज। डरावनी हमारी रीति-नीति होती है। गलत दिशाधारा अपनाने पर लोग भटकते भटकाते ठोकरें खाते और ठोकरें मारते हुए जाते हैं। इस अनौचित्य से बचकर निकलने का एक ही तरीका है कि दूसरों की नकल न करे। न किसी का अन्धानुकरण करे और न किसी का आसरा तके। आदर्शों की राह पर चल सकना उन्हीं के लिए सम्भव होता है जो अपने संबंध में आप सोचते और भविष्य निर्माण के पथ पर चलने के लिए आत्मा और परमात्मा के अतिरिक्त और किसी का सहारा नहीं तकते। जीवन को मृत्यु के साथ जोड़कर चलने वाले ही इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उपलब्ध सौभाग्य का श्रेष्ठतम उपयोग किया जाना चाहिए।
प्रभृति प्रकृति सौंदर्य एक संयोग है पर आत्मा को सुन्दर और जीवन को सुरभित सुसज्जित बना सकना हर किसी के अपने हाथ की बात है। यही सौंदर्य सराहनीय भी है और चिरस्थायी भी। सर्प की आकृति सुन्दर है किन्तु मधुमक्खी की प्रकृति। हमें प्रकृतितः सुन्दर होने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि जीवन कमल पुष्प की तरह खिले और हर किसी की आँखों में गुदगुदी उत्पन्न करे।
बहुत सी वस्तुओं का महत्व तब प्रतीत होता है जब वे चली जाती हैं। जवानी ही नहीं जिन्दगी भी ऐसी है जिनके चले जाने पर पता चलता है कि समय रहते उनकी उपेक्षा की गई और जो उनके हित किया जा सकता था, उस पर ध्यान न गया। हमें इस तरह जीना चाहिए मानों इन्हीं दिनों महाप्रयाण करना है।

 

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