फिलहाल, नीतीश दो परिस्थितियां चुन रहे….सत्ता और अपमान

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राजनीति में उम्मीद की जाती है कि उम्रदराज व अनुभवी नेता हर परिस्थिति में गंभीरता का व्यवहार करेंगे। नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की राजनीति में हैं परंतु, कुछ समय से बदस्तूर जनता से दूरी बनाए रहे। कभी-कभार जनता के सामने नाराजगी और तुनकमिज़ाज़ के भी दर्शन होते रहे हैं, जो वर्तमान राजनीतिक हालात में उनकी महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व के संदर्भ में देखा जाता है। 

मनोज कुमार तिवारी/ report4india/ New Delhi.

2020 में विधानसभा चुनाव में मात्र 45 सीट जीतने के बाद नीतीश कुमार ने ऐलान किया था कि उनकी पार्टी की कमेटी यह तय करेगी कि वे सीएम की कुर्सी संभालेंगे या नहीं। चुकि, चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ा गया था इसलिए ज्यादा सीटें जीतने के बाद भी बीजेपी पूर्व फैसले के पक्ष का ही समर्थन किया। हालांकि, कमेटी द्वारा निर्णय लेने के ऐलान के तुरंत बाद नीतीश कुमार सीएम पद की शपथ लेने को तैयार हो गये।

बदली राजनीतिक परिस्थितियों में 45 सीट वाले नीतीश कुमार 115 सीटों की गठबंधन का सहयोग लेकर मुख्यमंत्री बनकर बिना परेशानी सरकार चला पाएंगे इसमें भारी शक है। हर हाल. में सीएम बने रहने की जतन करने वाले नीतीश कुमार को सत्ता तो मिल जाएगी पर अपमान की घूंट तो उन्हें पीना ही पड़ेगा।

नीतीश कुमार ऐलान कर चुके हैं कि अगले विस चुनाव में वे सीएम पद के उम्मीदवार नहीं होंगे। फिर, इस माहौल में राजद-कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाने का कुछ मकसद नीतीश कुमार ने निश्चित कर लिया है। सोनिया गांधी ने उन्हें केंद्रीय राजनीति में कुछ भरोसा दिया हो परंतु, क्या कांग्रेस नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बना सकती है? यदि ऐसा नहीं तो फिर ऐसा क्या है जो बीजेपी उन्हें केंद्र में नहीं दे सकती।

माना जा रहा है कि नीतीश कुमार नई राजनीतिक परिस्थिति का निर्माण 2024 को ध्यान में रखकर कर रहे हैं परंतु, समझना यह है कि क्या वे लोकसभा चुनाव में मोदी को टक्कर देने की हैसियत रखते हैं। 2014 में नीतीश राजद-कांग्रेस व लेफ्ट पार्टियों के साथ थे फिर भी बीजेपी 30 सीटों पर चुनाव लड़कर 22 सीटें जीती थी और एनडीए गठबंधन 40 में से 32 सीटें जीतने में सफल रही थी जबकि 38 सीटों पर चुनाव लड़कर जदयू ने मात्र दो सीटें ही जीत पायी थी। कांग्रेस-राजद भी मात्र 6 सीटें ही जीत पायी।

बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि नीतीश का मन बिहार की राजनीति से भर गया है। तभी तो वे राजद को गृह विभाग देने पर तैयार हो गये हैं। वैसे भी, बार-बार पाला बदलने से नीतीश का भरोसा भी खत्म हो गया है। जिस जाति या विचार की राजनीति वे करते हैं, उसे सहेजने के लिए आरसीपी सिंह काफी हैं। नीतीश के अलग होने पर वे बीजेपी के साथ मिल जदयू को समाप्त कर देंगे। ऐसी स्थिति में जब बिहार में ही नीतीश कुमार कमजोर होंगे तो भला राष्ट्रीय राजनीति में वे कौन-सा तीर मार लेंगे। संभव है 2024 में कांग्रेस के लिए नीतीश कुमार डुबते को तिनके का सहारा जैसे हो, परंतु यह तिनका इसका क्या भरोसा ह तिनका  राजद के साथ नीतीश के  कांग्रेस   परंतु, जब नीतीश बिहार की  विपक्षी केंद्रीय राजनीति में नीतीश कुमार को क्भाया मिल जाएगा न होना चाहिए।