बसपा के ‘वोट बैंक’ में सेंध लगाने को सपा तैयार 

0
122

लोकसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने बसपा से गठबंधन कर करीब 28 साल से चल रही दुश्मनी पर जमी वर्फ को पिघला कर नई राजनीति की शुरुआत कर चुके हैं। चुनाव बाद दोनों दलों की राहें एकबार फिर जुदा हो गईं हैं। पर, इस रास्ते से सपा ने दलितों को लुभाने की कोशिश शुरू कर दी है। समाजवादी पार्टी पहली बार बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस बड़े पैमाने पर मनाने जा रही है। 

मनोज कुमार तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया।

नई दिल्ली। मोदी युग में देश में राजनीतिक विमर्श पूरी तरह से बदल गया है। राष्ट्रीय व क्षेत्रीय राजनीति में उत्तर से लेकर दक्षिण तक जातिवादी व परिवारवादी क्षत्रपों के अकेले सत्ता की मलाई खाने के दिन लद गए। मोदी के विरोध में उत्तर प्रदेश के धुर विरोधी रहीं सपा और बसपा जैसी पार्टियों ने अपने गिले-शिकवे दूर कर लोकसभा चुनाव की जोर आजमाइश की। निराशाजनक परिणाम सामने आने के बाद दोनों पार्टियों ने एकबार फिर अलग राह पकड़ ली।

उत्तर प्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं और अभी से ही समाजवादी पार्टी ने जाति से बाहर के वोटों पर नज़रें गड़ानी शुरू कर दी है। सपा ने अब दलितों को लुभाने की कोशिश शुरू की है। इस कड़ी में, समाजवादी पार्टी पहली बार बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का परिनिर्वाण दिवस बड़े पैमाने पर मनाने का कार्यक्रम बनाया है। 6 दिसंबर को प्रदेश के जिलों में सपा की तरफ से कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी में सर्वोच्च स्तर से दलितों को संदेश देने की कवायद की जा रही है।  अखिलेश यादव ने इस संबंध में निर्देश जारी कर कहा है कि जिलों में 6 दिसंबर को संविधान निर्माता व दलितों के मसीहा डॉ. आंबडेकर का परिनिर्वाण दिवस अनिवार्य रूप से मनाया जाए और समाज निर्माण में उनकी भूमिका और आदर्शों पर चर्चा की जाए।

इसी कड़ी में बाबा साहेब आंबेडकर अब सपा के पोस्टर व बैनर पर भी दिखाई देंगे। पार्टी में अभी तक  डॉ. राम मनोहर लोहिया  और जय प्रकाश नारायण ही दिखाई देते थे। समाजवादी पार्टी के अधिकृत होर्डिग्स में भी बदलाव किया है। डॉ. राममनोहर लोहिया के साथ में बाबा साहेब के चित्र सभी होर्डिंग्स व अन्य प्रचार माध्यमों पर लगाने को भी कहा गया है।

समाजवादी पार्टी का मानना है कि मायावती के साथ गठबंधन से सपा को लेकर दलितों में प्राकृतिक रोष कम हो गया है। बसपा भी इस हालात में नहीं है कि वह दलितों से दूरी बनाने का नैतिक कोशिश कर सके। ऐसे में मायावती से नाराज दलित वोटों को सपा अपने पाले में कर सकती है। पार्टी का प्रयास है कि ऱमनीति के तहत दलितों का भरोसा जीतने की कोशिश की जाए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here