‘महाराष्ट्र मंथन’ से बीजेपी ने क्या खोया और क्या पाया…

0
164
देवेंद्र फडणवीस-उद्धव ठाकरे (फाइल)

2014 के बनिस्पत बीजेपी ने शिवसेना के साथ कम सीटों पर चुनाव लड़कर 105 सीटें जीत कर शिवसेना के साथ बहुमत प्राप्त किया। महाराष्ट्र में सरकार बनाने की नैतिक जिम्मेदारी बीजेपी की थी। 

डॉ. मनोज कुमार तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया।

नई दिल्ली। समाजवादी आंदोलन के समृद्ध कार्यकर्ता, बिहार आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले लोहिया विचार मंच के संस्थापक सदस्यों में से एक पूर्व सांसद स्व. किशन पटनायक ने एक बार भाजपा के विरोध में वामपंथियों, बुद्धिजीवियों को कांग्रेस के नेतृत्व में एकजुट होने की मुहिम पर सवाल खड़ा कर कहा था कि अंततोगत्वा इससे भाजपा को ही फायदा होगा। क्योंकि, जनता की नजरों में कांग्रेस के विरोध में सिर्फ भाजपा ही मैदान पर टिकती दिखाई देती है। आज भले ही किशन पटनायक जीवित नहीं है परंतु, उनकी बातें आज भी प्रसांगिक है। चुनाव पूर्व भाजपा-शिवसेना गठबंधन को बहुमत के बाद भी महाराष्ट्र में बीजेपी नीत सरकार नहीं बन सकी। कारण कि शिवसेना ने सीएम पद पर सत्ता में ‘फिफ्टी-फिफ्टी’ की हिस्सेदारी का राग अलाप दिया। बीजेपी इसपर सहमत नहीं हुई।

इसी बीच शिवसेना लगातार बीजेपी पर हमलावर रही और साथ ही, वैचारिक रूप से अपने घोर विरोधी कांग्रेस व एऩसीपी से हाथ मिलाकर सरकार बनाने का प्रयास करने लगी। इसी बीच राज्यपाल ने विधानसभा में सबसे बड़े दल के रूप में आई बीजेपी को सरकार बनाने को लेकर जानकारी मांगी। बीजेपी ने राज्यपाल को बहुमत नहींं होने की बात कह इस्तीफा सौंप दिया। इसके बाद राज्यपाल ने क्रमश: शिवसेना और एनसीपी को सरकार बनाने को लेकर जानकारी मांगी। दोनों पार्टियों ने सरकार गठन पर राज्यपाल से और समय देने की माग की। राज्यपाल ने उनकी मागों को ठुकराते हुए राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश केंद्र से की, फलस्वरूप महाराष्ट्र राष्ट्रपति शासन के अधीन चला गया।

राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल बीजेपी पर हमलावर हो गए। उधर, शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस सरकार बनाने को लेकर कदम-दर-कदम आगे बढ़ने लगे परंतु, आश्चर्यजनक रूप से देर होने लगी। उधऱ, बीते शनिवार सुबह आठ बजे एनसीपी विधायक दल के नेता चुने गए अजित पवार के समर्थन से देवेंद्र फडणनवीस के नेतृत्व में सरकार के शपथ ग्रहण होने की जानकारी मिली तो महाराष्ट्र की राजनीति में मानो भूचाल आ गया। हालांकि, मंगलवार को अजित पवार के इस्तीफा के साथ ही सीएम देवेंद्र फडणनवीस सरकार का अंत हो गया। अब सवाल खड़ा हुआ है कि इस सरकार के गठन से बीजेपी को क्या मिला?

दरअसल, शिवसेना का कांग्रेस व एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाने का खुला अवसर देने के आरोप से बीजेपी बचना चाहती थी। जैसे ही उसे अजित पवार का साथ मिला वह सरकार गठन का तत्पर हो गई। जाहिरतौर पर, शिवसेना सरकार के गठन के बाद जनता के बीच कहती कि राज्य को राष्ट्रपति के हवाले नहीं किया जा सकता। बीजेपी अपने वादे से मुकर गई और जनता को राष्ट्रपति शासन के हवाले कर चली गई। महाराष्ट्र की जनता के हक में एक कॉमन-मिनिमम प्रोग्राम के साथ सरकार बनाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। बीजेपी ने सरकार बनाकर महाराष्ट्र की जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की कोशिश की, जिसमें वह सफल नहीं हो सकी।

इसके साथ ही, बीजेपी का अजित पवार के साथ सरकार बनाने से उसकी छवि का भी नुकसान पहुंचा है। जनता के बीच मैसेज गया कि बीजेपी को भ्रष्टाचार के आरोपी के साथ भी सरकार बनाने से कोई गुरेज नहीं है। साथ ही, शिवसेना पर पलटवार का बीजेपी का नैतिक आदर्श का हवाला कमजोर पड़ा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here