वैश्विक मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका से बदलती विश्व राजनीति

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भारत वैश्विक मंचों पर सदैव सक्रिय भागीदार रहा है. ऐसे में, गतिशील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 2016 में की गई संवाद की साहसिक पहल- से रायसीना संवाद भी कहा जाता है, ने भारतीय कूटनीति को वैश्विक राजनीति पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में मदद की है. यह डॉयलाग भारत की उस महान भूमिका की ओर भी इशारा करता है जो वह वैश्विक मामलों में निभाना चाहता है, ताकि खुद को उन सम-सामयिक राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, सुरक्षा और तकनीकी व्यवधानों का सामना करने के लिए तैयार कर सके, जो रोज़मर्रा के जीवन को खतरे में डालते हैं. एक अरब से अधिक लोगों के देश के रूप में, भारत वैश्विक मंचों पर केवल निष्क्रिय पर्यवेक्षक नहीं रह सकता.

केवी प्रिया/ रिपोर्ट4इंडिया प्रस्तुती।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 अप्रैल को नई दिल्ली में प्रतिष्ठित रायसीना डायलॉग के सातवें संस्करण का उद्घाटन विशिष्ट विदेशी गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थित में किया.वैश्विक समुदाय के सामने सबसे चुनौतीपूर्ण मुद्दों पर विचार करने के प्रति संकल्पबद्ध, भू-राजनीति और भूअर्थव्यवस्था से संबद्ध भारत के प्रमुख सम्मेलन में,  दुनियाभर से 200 से अधिक वक्ताओं ने भाग लिया.इस अवसर पर मुख्य अतिथि यूरोपियन यूनियन (ईयू) कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने अपने संबोधन से  सम्मेलन की शोभा बढ़ाई.विदेश नीति संबंधी इस वार्षिक सम्मेलन के लिए भारत का दौरा करने वाले विश्व के प्रमुख नेताओं में स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री कार्ल बिल्ट, कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर, मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री एंथनी एबॉट शामिल थे.

इसके अलावा, अर्जेंटीना, आर्मेनिया, ऑस्ट्रेलिया, गुयाना, नाइजीरिया, नॉर्वे, लिथुआनिया, लक्जमबर्ग, मेडागास्कर, नीदरलैंड, फिलीपींस, पोलैंड, पुर्तगाल और स्लोवेनिया के विदेश मंत्रियों ने भी सम्मेलन में भाग लिया.सम्मेलन विदेश मंत्रालय और स्वतंत्र थिंक टैंक अर्थात्, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) का एक संयुक्त प्रयास है.रायसीना डायलॉग 2016 से हर वर्ष नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है. इसी शृंखला में रायसीना डायलॉग 2022 का आयोजन, कोरोना वायरस महामारी के कारण दो साल के अंतराल के बाद नई दिल्ली में किया गया. 2021 में, इसका आयोजन दुनियाभर के प्रतिनिधियों के साथ वर्चुअल रूप में किया गया था. 2022 के लिए डायलॉग का विषय था ‘टेरानोवा: इम्पैशन्ड, इम्पेशंट और इम्पेरिल्ड’ अर्थात् धरती: जोशीला, उत्सुक और जोखिमग्रस्त’

रायसीना डायलॉग नाम क्यों?

रायसीना डायलॉग सिंगापुर में नियमित अंतराल पर आयोजित शांगरी-ला डायलॉग की तर्ज पर है और इसका नाम रायसीना हिल्स पर रखा गया है, जो नई दिल्ली में स्थित एक पहाड़ीनुमा स्थल है, जहां भारत सरकार की सत्ता का प्रमुख प्रतिष्ठान है, साथ ही राष्ट्रपति भवन, भी है.

एक नई शुरुआत:  भारत वैश्विक मंचों पर सदैव सक्रिय भागीदार रहा है. ऐसे में, गतिशील प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 2016 में की गई संवाद की साहसिक पहल- से रायसीना संवाद भी कहा जाता है, ने भारतीय कूटनीति को वैश्विक राजनीति पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में मदद की है. यह डॉयलाग भारत की उस महान भूमिका की ओर भी इशारा करता है जो वह वैश्विक मामलों में निभाना चाहता है, ताकि खुद को उन सम-सामयिक राजनीतिक, आर्थिक, पर्यावरणीय, सुरक्षा और तकनीकी व्यवधानों का सामना करने के लिए तैयार कर सके, जो रोज़मर्रा के जीवन को खतरे में डालते हैं. एक अरब से अधिक लोगों के देश के रूप में, भारत वैश्विक मंचों पर केवल निष्क्रिय पर्यवेक्षक नहीं रह सकता. इसके बजाय, रायसीना डायलॉग उन उपायों में से एक है जिसके साथ देश का लक्ष्य विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक गतिशीलता की उभरती जटिलताओं पर अपने प्रभाव का विस्तार करना है.रायसीना डायलॉग सत्ता के पारंपरिक केंद्रों से हटकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की ओर एक आदर्श बदलाव का सूचक है.  विकासशील अर्थव्यवस्था के रूप में, भारत न केवल वैश्विक वार्तालाप का हिस्सा बनना चाहता है, बल्कि अपने आकार और योगदान को देखते हुए दुनिया की अर्थव्यवस्था में नेतृत्व  करना चाहता है.रायसीना संवाद, प्रधानमंत्री मोदी के नए सिद्धांत के आंतरिक हिस्से के रूप में कई उपायों में से एक है, जिनका लक्ष्य भारतीयों की सुरक्षा और समृद्धि के लिए ‘भारत प्रथम’-अभियान के तहत सुधार और परिवर्तन लाना है.

नया मोदी सिद्धांत

उभरती चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करके, आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करके और समाधान प्रदान करके, प्रधानमंत्री मोदी का नया सिद्धांत भारत की सहस्राब्दी पुरानी मूलभूत वैश्विकता और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ (पूरी दुनिया हमारा परिवार है) की परम्परा को भी शामिल करता है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण यह कि कैसे भारत ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कोविड-19 वैक्सीन की आपूर्ति करने का बीड़ा उठाया.पिछले साल रायसीना संवाद के छठे संस्करण को वर्चुअल रूप से संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पिछले सात दशकों की गलतियों और कुकृत्यों को भविष्य में हमारी सोच को बाधित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. विश्व एक परिवार, विषय पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने  कहा, ‘हमें पूरी मानवता के बारे में सोचना चाहिए, न कि केवल उन लोगों के बारे में जो हमारी सीमाओं के भीतर हैं. मानवता को हमारी सोच और कार्रवाई के केंद्र में होना चाहिए’.यह इस बात का एक ठोस उदाहरण है कि कैसे गतिशील प्रधान मंत्री द्वारा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और व्यापक मानवता के हित के विभिन्न मुद्दों पर नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए भारत को तैयार किया जा रहा है. दूसरे शब्दों में, भारत अपने दृष्टिकोण को ‘नियम अनुपालन कर्ता से ‘नियम निर्माता’ में स्थानांतरित कर रहा है.भारत के महत्वाकांक्षी वैश्विक लक्ष्यों को दर्शाते हुए और एक वैश्विक नियंता के रूप में अपना दावा पेश करते हुए, रायसीना डायलॉग पारंपरिक उत्तर-दक्षिण आर्थिक और राजनीतिक विभाजन को फिर से उजागर कर रहा है.

सफलता: वैश्विक बहु-हितधारक नीति मंच की सफलता में कई घटकों का योगदान है. पहला, भारत जनसंख्या के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है; दूसरा, नई सहस्राब्दी में भारतीय अर्थव्यवस्था का तीव्र विकास; तीसरा, पिछली सरकारों द्वारा किए जा रहे सुधार और मोदी युग में उनमें और तेजी आना; और चौथा, भारतीय अर्थव्यवस्था का तेजी से बढ़ता वैश्वीकरण (व्यापार क्षेत्र का अब भारत के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 40 प्रतिशत योगदान है). इन सब कारणों से भारत बाहरी घटनाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकता, क्योंकि इन घटनाओं से अब उस पर पहले से कहीं अधिक दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका है.सरकारी और निजी वैचारिक संगठनों (थिंक टैंकों) के बीच सहयोग से हर साल वैश्विक संबंधों की संभावनाएं प्रबल होती जा रही हैं, जिससे सरकार द्वारा प्रायोजित सम्मेलनों की उबाऊ कठोरता समाप्त हो रही है!यह इस तथ्य से अच्छी तरह प्रमाणित है कि रायसीना डायलॉग मोदी सरकार द्वारा उस कवायद को फिर से जांचने और पारंपरिक नौकरशाही दिखावे को त्यागने की एक रणनीति है जिसे सरकार सबसे अच्छी तरह से जानती है. यह तब स्पष्ट होता है जब हम उन व्यापक मुद्दों को देखते हैं जिन पर विचार-मंथन किया गया है और जो प्रश्न नेताओं द्वारा उठाए गए हैं.

पिछले शिखर सम्मेलन: इस कहावत को ध्यान में रखते हुए, अब तक के सभी रायसीना संवादों में भू-राजनीति और भू-अर्थव्यवस्था  के मुद्दों पर मंथन किया गया.2016 में जब पहला रायसीना संवाद आयोजित किया गया, तब 35 से अधिक देशों के 100 से अधिक वक्ताओं ने ‘एशिया: क्षेत्रीय और वैश्विक कनेक्टिविटी’ विषय पर भाषण देने के लिए भाग लिया था. 2017 में, 65 देशों के 120 से अधिक वक्ताओं ने ‘द न्यू नॉर्मल: बहुपक्षवाद के साथ बहुध्रुवीयता’ पर चर्चा की.2018 में तीसरे संस्करण के दौरान ‘विघटनकारी घटकों का प्रबंधन: विचार, संस्थान और मुहावरे’ विषय पर चर्चा की गई. 2019 में सम्मेलन का विषय ‘न्यू जियोमेट्रिक्स, फ्लुइड पार्टनरशिप, अनिश्चित परिणाम’ था.2020 का विषय ‘अल्फा सेंचुरी नेविगेट करना’ था. 2021 में, सम्मेलन को एक हाइब्रिड प्रारूप में आयोजित किया गया था. विषय था ‘वायरल वर्ल्ड आउटब्रेक्स, आउटलेयर्स एंड आउट ऑफ कंट्रोल’. महामारी के कारण दो साल के अंतराल के बाद आयोजित, रायसीना डायलॉग का विषय था: ‘टेरानोवा: इम्पैश्न्ड्, इम्पेशंट और इम्पेरिल्ड’ अर्थात् धरती: जोशीला, उत्सुक और जोखिमग्रस्त’. 90 देशों और बहुपक्षीय संगठनों के लगभग 210 वक्ताओं के साथ 100 से अधिक सत्रों में, डॉयलाग एक जोरदार सफलता थी.

रायसीना डायलॉग 2022तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन अनेक वैश्विक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में हुआ. ओआरएफ के अध्यक्ष संजोय जोशी के शब्दों में ‘दुनिया ने कभी किसी सदी में एक बार आने वाली महामारी से हुई जीवन और आजीविका की तबाही से उबरने के लिए लड़ाई लड़ी और विश्व को दो अन्य अप्रत्याशित घटनाओं का सामना करना पड़ा. पहली घटना अफगानिस्तान में हुई, जहां एक बार फिर से संकट के बादल मंडराए; दूसरी घटना यूरोप से संबद्ध है, जहां पूरे महाद्वीप में युद्ध की आशंका व्याप्त हो गई.’उन्होंने कहा कि ‘ये तीन घटनाएं, एक साथ, हमें तेजी से गैर-वैश्वीकृत दुनिया के राजनीतिक आधार की जांच करने के लिए मजबूर करती हैं. द्वितीय विश्व युद्धोत्तर बहुपक्षीय उदारवादी व्यवस्था में दरारें अब धरती की सतह की संरचना की दरारें बन गई हैं. अगर इतिहास ने हमें कुछ सिखाया है, तो यह है कि घटना-शृंखला का ऐसा संगम विश्व सत्ता की गतिशीलता को बदल सकता है और विश्व व्यवस्था को नया रूप दे सकता है.’ रायसीना डायलॉग 2022 के विषय पर टिप्पणी करते हुए, भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ने कहा कि बड़े विचार उभरती वैश्विक वास्तविकताओं को परिभाषित करेंगे. ‘दुनिया के कई हिस्सों में बेहद अशांति स्पष्ट है. रचनात्मक बातचीत और कई मार्गों पर विविध विचारों को प्रोत्साहित करने की आज जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही. इस परिदृश्य  में, हमारा लक्ष्य उभरती हुई भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक प्रवृत्ति-रेखाओं का मानचित्रण करना, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के बारे में प्रचलित हठधर्मिता पर सवाल उठाना और भविष्य-उन्मुख सोच को प्रोत्साहित करना है.’

भू-राजनीतिक दुविधा को समझना

यूरोप में यूक्रेन और रूस से जुड़ा मौजूदा गतिरोध  वैश्विक आपदा के कगार पर है, जिसे विश्लेषक  तीसरे विश्व युद्ध में रूपांतरित होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं.  इस क्षेत्र से कई वस्तुओं की वैश्विक आपूर्ति पहले से ही प्रभावित है. अमरीका के नेतृत्व में पश्चिमी सहयोगी जहां यूक्रेन का समर्थन कर रहे हैं, वहीं चीन ने खुले तौर पर रूस का पक्ष लिया है. जारी गतिरोध में अब दोनों पक्ष भारत के करीब पहुंच रहे हैं.उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में, भारत अपनी पहचान और हित के साथ दुनिया के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहा है. यूरोप में संघर्ष एक ऐसा उदाहरण है.वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर, जयशंकर ने कहा: ‘यह विचार कि अन्य हमारी भूमिका निर्धारित करते हैं, यह भी कि हमें अन्य पक्षों से अनुमोदन की आवश्यकता है, मुझे लगता है कि वह एक ऐसा युग है जिसे हमें पीछे छोड़ने की आवश्यकता है’.यूक्रेन संकट पर उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत ने किसी का नहीं बल्कि अपना पक्ष लिया है. जयशंकर ने कहा, ‘हमें उस युग से निकलने की आवश्यकता है जिसमें अपने फैसलों के लिए मंजूरी लेने का विचार हो.’

1970 के दशक के उत्तरार्ध में तत्कालीन सोवियत संघ के अफगानिस्तान पर आक्रमण के समय भारत के सार्वजनिक समर्थन की तुलना में, वर्तमान में भारत के भौगोलिक और अन्य क्षेत्रों में दांव बहुत ऊंचे हैं. यह एक कारण है कि भारत तटस्थ और यथार्थवादी बना हुआ है, पक्ष लेने को तैयार नहीं है.यही कारण है कि अपने ऐतिहासिक संबंधों और व्यापार साझेदारी को देखते हुए, रूस को अपने नागरिकों को निकालने के लिए मानवीय गलियारे के निर्माण की भारत की मांग को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल लगा. रूस ने भारत की मांगों पर ध्यान दिया और लगभग 22,500 नागरिकों को वापस लाने में मदद की. यहां यह बताना जरूरी है कि यूक्रेन के अंतरराष्ट्रीय छात्रों में करीब एक चौथाई भारतीय हैं.

व्यापक सराहना

संकट के प्रति भारत की कूटनीतिक और तार्किक प्रतिक्रिया में अंतर्निहित इस यथार्थवाद की सभी ने सराहना की.2014 के बाद से, भारत एक तरफ अमरीका के नेतृत्व वाले पश्चिम के वैश्विक आधिपत्य और रूस और चीन को दो अलग-अलग दिशाओं में अपने प्रभाव और रुचि का विस्तार करने की कोशिश करते हुए, भारतीय कूटनीति की कसौटी पर खुद को संतुलित कर रहा है. इस यथार्थ राजनीति का एक और उदाहरण यह है कि  भारत ने द्वीप राष्ट्र ताइवान के साथ मजबूत संबंध रखते हुए, चाइना के साथ भी अपने बढ़ते व्यापार संबंधों को बनाए रखा है. भारत ने इस प्रक्रिया में शानदार संतुलन कायम किया है.

2021 में, चीन के साथ भारत का व्यापार पहली बार 100 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर 125 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों, रसायनों और ऑटो घटकों की मांग से प्रेरित था. भारत के आयात में व्यापार का बड़ा हिस्सा 97.5 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि निर्यात पहली बार 20 अरब डॉलर को पार कर गया. इसके अलावा, यूरोप में मौजूदा गतिरोध में भारत की तटस्थता रूस के लिए भारतीय सीमाओं पर चीन के नापाक विस्तारवादी मंसूबों पर एक मध्यम प्रभाव के रूप में कार्य करने के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करेगी. यूक्रेन-रूस संघर्ष के बीच अमरीका ने रूस पर प्रतिबंध लगा दिए. आशंका है कि इससे भारत को रूस की रक्षा आपूर्ति बाधित होगी. यह उल्लेखनीय है कि भारत का 85 प्रतिशत आयात केवल तीन देशों- रूस (46%), फ्रांस (27%) और अमरीका (12%) होता है. हालांकि अमरीका और नाटों देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं जिनसे भारत के लिए दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है. इस कारण भारत मास्को के खिलाफ मतदान से अनुपस्थित है.

अज्ञानता उजागर: यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने रायसीना डायलॉग में अपने संबोधन में जोर देकरकहा कि यूरोप ‘कानून के शासन और मौलिक अधिकारों’में विश्वास करता है. उन्होंने कहा कि यूरोप में लोकतंत्र 2000 साल पुराना है जबकि अब भारत इसका सबसे बड़ा घर है. यह अच्छी तरह से प्रलेखित है कि यूरोप में लोकतंत्र की स्थापना, जैसा कि उर्सुला ने दावा किया है, से बहुत पहले, छठी शताब्दी ईसा पूर्व से 400 ईस्वी तक भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य अस्तित्व में थे.उर्सुला के अलावा अन्य यूरोपीय नेताओं जैसे नॉर्वे के विदेश मंत्री, एनिकेन हुइटफेल्ड ने रूसी सेनाओं द्वारा क्रूर हत्याओं और बम विस्फोटों की बात कही. संक्षेप में, उन्होंने मुक्त समुदायों की रक्षा में भारत की भूमिका पर सवाल उठाया.कोई कमजोर अनुकरणकर्ता नहीं: भारत ने स्थिति को अपने अनुकूल बनाने के लिए बेहतर प्रदर्शन किया है. इसने जोर देकर कहा कि कैसे यूक्रेन में रूसी आक्रमण के मद्देनजर नियम-धारित व्यवस्था की रक्षा में वैश्विक एकता का यूरोप का आह्वान सिलेक्टिव यानी पक्षपातपूर्ण है. जयशंकर ने आश्चर्य जताया कि जब अफगानिस्तान में अशांति थी तो कोई आक्रोश और नियम आधारित आदेश क्यों नहीं लागू किया गया? उन्होंने प्रमाण सहित कहा, ‘जब एशिया में नियम-आधारित आदेश चुनौती के अधीन थे, तो हमें यूरोप से सलाह मिली कि अधिक व्यापार करें. कम से कम हम आपको वह सलाह नहीं दे रहे हैं. अफगानिस्तान के संदर्भ में, कृपया मुझे दिखाएं कि दुनिया ने वहां जो कुछ  किया,  उसे नियम-आधारित आदेश के कौन से हिस्से से सही ठहराया जा सकता है.

इसी तरह, जब भारत पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन द्वारा हमला किया गया था या जब पाकिस्तान न केवल भारत में बल्कि अफगानिस्तान में भी आतंकवादियों का समर्थन कर रहा था, तब यूरोपीय शक्तियों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. उनकी ये टिप्पणियां रायसीना डायलॉग के दौरान वैश्विक समकक्षों से सवाल पूछने के दौरान सामने आईं.

रूस के खिलाफ प्रतिबंधों को मंजूरी के मुद्दे पर यूरोप की तर्ज पर समर्थन करने के लिए, भारत पर पश्चिमी देशों के दबाव के बारे में जयशंकर ने विश्व के समक्ष भारत की असली तस्वीर उजागर करते हुए कहा कि हम अन्य देशों के ‘डरपोक अनुकरणकर्ता’ नहीं हैं और अन्य देशों या बलों के अनुमोदन से भी बाध्य नहीं हैं.

वैश्विक धारणा: इन सब बातों से यह साबित होता है कि भारत अपना पक्ष ले सकता है और वह आवश्यक ऐसा करेगा. रायसीना डायलॉग, 2022 में शामिल हुए अनेक प्रतिनिधियों ने भी यही महसूस किया.सम्मेलन में शामिल हुए कनाडा के पूर्व प्रधानमंत्री, स्टीफन हार्पर, ने कहा कि भारत सरकार चीन के सामने देश की खुद की पहचान बना रही है. उन्होंने कहा, ‘भारत खुद को परिभाषित कर रहा है और इसकी परिभाषा अपने आर्थिक परिवर्तन, वैश्विक व्यापार, चिकित्सा मुद्दों में समर्थन और एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक समाज होने की प्रकृति के अनुसार बदल रही है.’ हार्पर ने कहा, ‘चूंकि चीन एक विघटनकारी शक्ति के रूप में उभरता है, भारत खुद को एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता है’रायसीना डायलॉग ने दुनिया में उन पक्षधरों की संख्या  भी उजागर की जो भारत के साथ सहयोग करने के लिए उम्मीद और आत्मविश्वास से भरे हुए हैं.

वियना स्थित थिंक टैंक-ऑस्ट्रियन इंस्टीट्यूट फॉर यूरोपियन एंड सिक्योरिटी पॉलिसी की निदेशक वेलिना त्चाकारोवा ने कहा कि भारत के बारे में यूरोप की धारणा पिछले कुछ वर्षों में ‘धीरे-धीरे सकारात्मक’ बदली है. ‘यह समझ बनी है कि हमें द्विपक्षीय और बहुपक्षीय शर्तों पर भारत के साथ और अधिक करने की आवश्यकता है. अमरीका और चीन के बीच नए द्विध्रुवीय संघर्ष के बीच, यूरोप और भारत के लिए भूमिका निभाने का एक तीसरा तरीका यह हो सकता है,  कि वे दोनों स्वयं का व्यापारिक शक्ति केंद्र बना सकते हैं, ‘त्चाकारोवा ने भारत और यूरोप के बीच जल्द से जल्द द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता पर भी बल दिया.’

वैश्विक शिखर सम्मेलन के दौरान तीन दिनों में फैले 100 से अधिक सत्रों ने नेताओं, नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों को विभिन्न क्षेत्रों में उभरती चुनौतियों पर बौद्धिक रूप से उत्तेजक बातचीत में शामिल किया.’द बैटल अगेंस्ट वैक्सीन रंगभेद’ नामक एक सत्र में वैक्सीन अंतराल दूर करने के उपायों पर चर्चा की गई? सुविधाओं से वंचित भौगोलिक क्षेत्रों के टीकाकरण में राष्ट्रों को तत्काल निवेश करने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है? क्या वैश्विक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में निवेश पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है? जी-20 में एक नए वैश्विक स्वास्थ्य एजेंडे की रूपरेखा क्या हो सकती है? महामारी के खिलाफ दो साल की लंबी लड़ाई को देखते हुए, ये सवाल सामयिक हैं और ये आगे की कार्रवाई तय करेंगे.

एक अन्य सत्र सरकारी और गैरसरकारी कार्यकर्ताओं द्वारा युद्ध के हथियार के रूप में सूचना के दुरुपयोग पर आधारित था. तथ्य और कल्पना के बीच की रेखा धुंधली होने के कारण, सूचना युद्ध 21वीं सदी का सबसे विनाशकारी और निर्णायक  डिजिटल युद्ध का मैदान बनता जा रहा है. सरकार और कंपनी जगत ऑनलाइन दुष्प्रचार युद्धों के नुकसान को कैसे सीमित कर सकते हैं? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को खतरे में डाले बिना, वे हेरफेर की गई सामग्री द्वारा उत्पन्न सामाजिक अंतराल और तोड़फोड़ से कैसे निपट सकते हैं?भू-राजनीति में दो अन्य दिलचस्प सत्र बहुपक्षवाद पर हमले और संयुक्त राष्ट्र कैसे कई संकटों का समाधान करने में विफल रहा है, से संबंधित थे, जबकि अन्य  सत्र यूक्रेन के बाद चीन से संबंधित था.अंतिम दिन, दो अन्य सत्रों में जेंडर गवर्नेंस पर ध्यान केंद्रित किया गया था कि कैसे महिलाएं सत्ता, राजनीति और शांति पर हमारी सोच को नया आकार दे रही हैं. इसने नारीवादी विदेश नीति पर भी चर्चा की. महिला नेतृत्व और सतत् विकास लक्ष्य शीर्षक वाला एक अन्य सत्र इस बात पर केंद्रित था कि राजनीतिक क्षेत्र, बोर्डरूम और वित्तीय प्रणालियों में महिला नेतृत्व को कैसे बढ़ाया जाए?रायसीना डायलॉग सिर्फ इस बात की शुरुआत है कि कैसेभारत एक नया विचारक नेता बन सकता है और न केवल भारत के लिए बल्कि पूरी मानवता के कल्याण के लिए वर्तमान और भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकता है.

(लेखक नई दिल्ली स्थित स्वतंत्र पत्रकार हैं और समसामयिक विषयों पर लिखते हैं) ई-मेल: indiadescribe@gmail.com व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं. (साभार-रोजगार समाचार)