रक्षाबंधन : राजा बलि से लेकर रवींद्रनाथ टैगोर तक  

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रक्षाबंधन का त्यौहार भारतीय मत में भाई-बहन के पवित्र रिश्तें को हर हाल में निभाने का बंधन है। साथ ही, यह मानवता और प्रेम और निस्वार्थ भाव से एक-दूसरे के प्रति समर्पण का संदेश देता है, ऐसा बल देता है जिससे मित्रता, समर्पण और वफादारी की निरंतरता का भाव व्यक्ति व समाज की जीवनधारा से कभी ओझल नहीं हो पाता।  

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रिपोर्ट4इंडिया फीचर डेस्क।

नई दिल्ली। रक्षाबंधन को लेकर पुराणों में जो वर्णन मिलता है उसके अनुसार, सर्वप्रथम श्रीलक्ष्मीजी ने अपने पति श्रीविष्णु को दानव राजा बलि के सानिध्य से मुक्त कराया था।

भविष्य पुराण के मुताबिक, दानवों के राजा बलि ने सौ यज्ञ पुरे कर स्वर्ग की प्राप्ति की कामना की तो उसके इस मनोइच्छा से देवराज इन्द्र घबराकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। उन्होंने बलि की स्वर्ग पर कब्जे की मंशा बताई और इस समस्या का निदान करने को कहा। इसपर भगवान विष्णु वामन अवतार ले राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच गए। राजा बलि हर हाल में अपने दिए वचन को पूरा करता था।

जब बलि ने वामन श्रीविष्णु से कुछ माँगने को कहा तो उन्होंने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। इसपर बलि ने उन्हें तीन पग भूमि नाप लेने को कहा।

इस पर वामन रूप श्रीभगवान ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे में पूरी पृ्थ्वी नाप ली। अब तीसरे पैर के लिए जमीन की मांग की। आखिरकार बलि ने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहां तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान के पैर रखते ही राजा बलि पाताल लोक पहुंच गए।

बलि के वचन पालन पर भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हुए और आग्रह किया कि वे उनसे कुछ मांग लें। बलि ने रात-दिन श्रीविष्णु को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया। श्रीविष्णु वचन का पालन करते हुए राजा बलि के द्वारपाल बन गए। लक्ष्मीजी को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने नारदजी से इसका समाधान पूछा। नारदजी ने उपाय बताया की आप राजा बलि को राखी बाँध उन्हें अपना भाई बना लें और उपहार में अपने पति भगवन विष्णु को मांग लें। लक्ष्मीजी ने ऐसा ही किया। राजा बलि को राखी बाँध कर अपना भाई बनाया और जब बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहा तो उन्होंने अपने पति विष्णु को मांग लिया। जिस दिन लक्ष्मीजी ने राजा बलि को राखी बाँधी थी, उस दिन श्रावण पूर्णिमा थी।  कहा जाता है कि उस दिन से ही राखी का त्यौहार मनाया जाने लगा।

महाभारत में देखें तो, श्रीकृष्ण ने जब शिशुपाल का वध किया तो सुदर्शन चक्र वापस आया तो उस समय कृष्ण की उंगली कट गई और रक्त बहने लगा। यह देख द्रौपदी ने अपनी साडी़ का किनारा फाड़ श्रीकृष्ण की उंगली में बांधा था, जिसको लेकर कृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया था। इसी ऋण को चुकाने के लिए दु:शासन के चीरहरण के दौरान कृष्ण ने द्रौपदी की लाज रखी। तब से ‘रक्षाबंधन’ का पर्व मनाने का चलन है।

आज भी यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम को समर्पित है इस त्यौहार को लेकर हिन्दू धर्म दर्शन, परंपरा में कई तरह की कथाएं और मिथक शामिल हैं।

इस त्यौहार को लेकर कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का भी जिक्र है।

यूनान का शासक सिकंदर पूरे विश्व को फतह करने निकला और भारत पहुंच गया। सिंकदर का सामना भारतीय राजा पोरस से हुआ। राजा पोरस ने युद्ध में सिकंदर को धूल चटा दी।

इसी दौरान सिकंदर की पत्नी को त्यौहार रक्षाबंधन के बारे में पता चला। तब उसने अपने पति सिकंदर की जान बख्शने के लिए राजा पोरस को राखी भेजी और उन्हें अपना मुंहबोला भाई बनाकर युद्ध में सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पोरस ने राखी का और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया।

मध्यकाल में मुगलों के शासनकाल के दौरान मेवाड़ की महारानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं की कहानी भी शामिल है। हुमायूं राखी का संदेश पाकर अपनी मुंहबोली बहन कर्णावती की रक्षा करने के लिए बहादुरशाह से युद्ध किया।

हुमायूं अपनी विशाल सेना के साथ जब चित्तौड़ पहुंचा और उसे पता चला कि कर्मावती ने जौहर कर लिया तो वह बहुत दुखी हुआ। बाद में हुमायूं ने युद्ध में बहादुर शाह को पराजित कर राज्य का पूरा शासन रानी कर्णवती के बेटे विक्रमजीत सिंह को सौंप दी और दिल्ली लौट गया।

आज भी उस क्षेत्र में हुमायूं और कर्णवती के भाई-बहन का अमर रिश्ता वहां की लोक कथाओं-कविताओं में गूंजती रहती है।

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया तो महान कवि और नोबल विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर ने राखी के इस त्यौहार को एक नया संकल्प दिया। उन्होंने कहा कि राखी केवल भाई-बहन के रिश्तों का ही त्यौहार नहीं है, बल्कि इंसानियत का भी त्यौहार है। टैगोर ने बंगाल के विभाजन के दौरान हिंदू-मुस्लिम के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ाने के लिए हिन्दू-मुसलिम के बीच रक्षाबंधन को मनवाया था।

इस त्यौहार पर बंग-भंग के विरोध में जनजागरण के रूप में प्रयोग किया और उसे एकता और भाईचारे का प्रतीक बना दिया।

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