जीवन में सफलता को रावण की तीन स्मरणीय बातें

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mythology-picहम जब तक सामाजिक रूप से प्रमाणित अच्छे कार्य करते जाते हैं, तब तक समाज भी हमारी प्रशंसा करता है। परंतु, जैसे ही समाज के विरुद्ध एक बुरा काम किया, सदा के लिए बुराई का पात्र बन जाते हैं। लंकापति रावण के साथ भी ऐसा ही हुआ… सीताजी का अपहरण करना रावण की ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी। यदि वह ऐसा न करता तो कभी श्रीराम लंका न जाते और न ही रावण का अंत होता। रावण के जीवन में सीता हरण का प्रसंग न होता तो … शायद वह भी देवता के समान पूजा जाता। भारत में तो धर्म के विपरित मार्ग पर चलने वाले भी ऋषि माने गए हैं।  

प्रस्तुती-  रिपोर्ट4इंडिया धर्म डेस्क।

रावण, जिसे विश्व राक्षस राजा के नाम से जानता है, एक महापंडित था। उसके तप में जो कठोरता थी, जो अग्नि थी वह शायद ही उस काल के किसी अन्य ऋषि-मुनियों एवं पंडितों में थी। कठोर तपस्या से ही रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव जानते थे, रावण राक्षस है और अपने स्वार्थ के वशीभूत हो तप कर रहा है, परंतु, रावण की भक्तिपूर्ण तपस्या को वे दरकिनार नहीं कर सके और उन्हें उसे वरदान देना पड़ा…. जिसके बाद रावण अत्यंत शक्तिशाली हो गया था।

रावण के पिता ऋषि और माता असुर कन्या थी। इसलिए माता के गुणों के कारण रावण में असुरों के गुण आ गए… परंतु,  पिता से मिला तपस्या का गुण रावण के लिए सर्वश्रेष्ठ साबित हुआ।

दुनिया पर राज करने को रावण ने तपस्या का मार्ग चुना, दिन-रात शिवजी का जाप किया। वर्षों की तापस्या पूर्ण कर रावण ने शिवजी का वरदान प्राप्त किया। परंतु कहते हैं, भगवान विवश होकर बुराई को भी वरदान देते हैं तो उसके अंत का मार्ग भी चुन लेते हैं।

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जैसे ही भगवान शिव ने रावण को वरदान दिया, उसी समय भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्रीराम के जन्म का फैसला कर लिया गया था। महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण के अनुसार माता कैकेयी की इच्छा के मुताबिक श्रीराम, उनकी पत्नी सीता एवं अनुज लक्ष्मण को 14 वर्षों के वनवास के लिए अयोध्या छोड़कर जाना पड़ा।

मृत्यु की अवस्था में पड़े रावण ने पहली बात लक्ष्मण को बताई वह यह थी, शुभ कार्य जितनी जल्दी हो, कर डालना। और अशुभ को जितना टाल सकते हो, टाल देना। यानी ‘शुभस्य शीघ्रम्’। रावण ने लक्ष्मण को बताया, ‘मैं श्रीराम को पहचान नहीं सका और उनकी शरण में आने में देर कर दी, इसी कारण मेरी यह हालत हुई’।

रावण ने लक्ष्मण को दूसरी बात बताई, वह कि, “अपने प्रतिद्वंद्वी, अपने शत्रु को कभी अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए, वह आपसे भी अधिक बलशाली हो सकता है। मैंने श्रीराम को तुच्छ मनुष्य समझा और सोचा, उन्हें हराना मेरे लिए आसान होगा, लेकिन यही मेरी बड़ी भूल थी।“

रावण ने आगे कहा, “मैंने जिन्हें साधारण वानर और भालू समझा, उन्होंने मेरी पूरी सेना को नष्ट कर दिया। मैंने जब ब्रह्माजी से अमरता का वरदान मांगा था, तब मनुष्य और वानर के अतिरिक्त कोई मेरा वध न कर सके ऐसा कहा था। क्योंकि, मैं मनुष्य और वानर को तुच्छ समझता था, यह मेरी गलती थी।”

रावण ने लक्ष्मण को तीसरी और अंतिम बात यह बताई कि,  “अपने जीवन का राज किसी को भी नहीं बताना चाहिए। यहां भी मैं चूक गया। क्योंकि, विभीषण मेरी मृत्यु का राज जानता था। यदि, उसे मैं यह नहीं बताता तो शायद आज मेरी यह हालत न होती।”

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