पूर्ण मनुष्य बनें, पूर्णता को प्राप्त करें- ऋग्वेद

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दुनिया का प्राचीनतम पुस्तक ऋग्वेद बताते हैं कि मनुष्य शरीर धारण करना ही मनुष्यता नहीं है। शरीर तो मनुष्य बनने के का एक माध्यम है। शरीर साधन के माध्यम से ही जीवनपर्यन्त निरन्तर साधना द्वारा मनुष्य बना जा सकता है। मानव जीवन प्राप्त होना यानी एक अवसर कि पूर्ण मनुष्य बना जाय। इस प्रकार की पूर्णता प्राप्त कर लेना ही जीवन लक्ष्य कहलाता है। इसीलिए वेद आदेश करते हैं “मनुर्भवः” मनुष्य बन। विवेकानंद ने भी कहा, लक्ष्य की प्राप्ति तक आगे बढ़ो।  

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प्रस्तुती- रिपोर्ट4इंडिया।

तन्तुन्तन्वत्रजसो, भानुमन्विहि, ज्योतिष्मतः पथो रक्षधिया कृतान्। अनुल्वणं वयस जोगु वामयो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥ ऋग्वेद 10। 5। 3। 6

“साँसारिक कार्य करता हुआ तू तेजस्विता का, प्रकाश का अनुसरण कर। बुद्धि से निर्णय किये गये प्रकाशयुक्त पथ की रक्षा कर। निरन्तर कर्म और ज्ञान की साधना करता हुआ उलझन रहित कर्म का अवलंबन कर। मनुष्य बन और जनसेवक लोगों को पैदा कर।”
ऋग्वेद के उक्त मन्त्र में हमें पूर्ण मनुष्य बनने का आदेश दिया गया है। केवल मनुष्य शरीर धारण कर लेना ही मनुष्यता नहीं है। शरीर तो मनुष्य बनने के लिए एक माध्यम है, साधन है। शरीर साधन के माध्यम से जीवन पर्यन्त निरन्तर साधना ही मनुष्य बनने की उच्च मंजिल तक पहुँचाती है। मानव जीवन हमें इसीलिए प्राप्त होता कि इस अमूल्य अवसर का लाभ उठाकर पूर्ण मनुष्य बन जाय। इस प्रकार की पूर्णता प्राप्त कर लेना ही जीवन लक्ष्य कहलाता है। इसीलिए वेद भगवान आदेश करते हैं “मनुर्भवः” मनुष्य बन।
”प्रकाश का अनुसरण कर”। प्रकाश ही मनुष्य का पवित्र पथ है। इस प्रकाश एवं दिव्यता प्राप्ति के लिए निरन्तर ज्ञान-विज्ञान की साधना की आवश्यकता है। जीवन में प्रकाश का अवलंबन करने के लिए मुख्यता दो बातों की आवश्यकता है। (1) जीवन में अंधकारमय तत्वों को पहचानना, सूक्ष्म निरीक्षण करना और उन्हें छोड़ना। (2) प्रकाश की ओर अग्रसर होना।
”ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान” अर्थात् अपने पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान की साधना के लिए किये गये कठोर परिश्रम से विद्या प्रकाश, ज्ञान विज्ञान आदि की रक्षा कर, उनके अनुभवों से लाभ उठाकर उस विद्या भण्डार में अपना भी कुछ भाग डालें। मनुष्य अपने पूर्वजों की भाँति विद्या प्रकाश को अपने नवीन अनुसंधान के आधार पर और भी बढ़ावें तथा अन्धकार जन्य तत्वों से रक्षा करें।
मनुष्यता की उच्च मंजिल पर पहुँचने के लिए आवश्यक साधन है उलझन रहित कर्म करना अर्थात् अपनी शक्ति एवं परिश्रम को व्यर्थ के कार्यों में खर्च न करके व्यवस्थित ढंग से सत्कार्यों एवं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में करना चाहिए।

 

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