…निरंकुश संगठित बाज़ार में अतिरिक्त दाल आयात का असर नहीं

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सरकार के स्टेबिलाइजेशन फंड में 30 हजार टन अतिरिक्त दाल खरीदारी को कोई मोल नहीं

नई दिल्ली/रिपोर्ट4इंडिया। खाद्य मंत्रालय ने बाजार में दाल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 30,000 टन अतिरिक्त दाल का आयात करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के सचिव हेम पांडे की अघ्यक्षता में स्टेबिलाइजेशन फंड का एक महत्वपूर्ण बैठक में यह फैसला लिया है। हालांकि, दालों की बढ़ती कीमत और घरेलू जरूरतों को देखते हुए दो लाख टन का बफर स्टॉक भी कम है। ऐसे में 30 हजार टन दाल का आयात ‘ऊंट के मुंह’ में जारी ही है। सबसे बड़ी बात यह है कि देश में निरंकुश बाज़ार का साम्राज्य व संबंधित सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार इतना अधिक है कि 30 हज़ार टन की खरीदारी और इसकी सूचना का कोई मतलब नहीं है। चुकि, व्यवहारिकता यह है कि बाज़ार में दालों की कमी नहीं है, बावजूद दालों की कीमत बढ़ रही हैं। यह एक प्रकार से बाजार के नियम के खिलाफ है। यह एक प्रकार से संगठित बाज़ार का ट्रेंड बन गया है कि भारी मात्रा में बाजार में दाल उपलब्ध होने के बाद भी कीमतें कम नहीं हो रहीं हैं।

सरकार की कोशिशों के बावजूद बाजार में अरहर दाल, उड़द दाल और चना दाल काफी ऊंची दरों पर बिक रही हैं। इसी के मद्देनजर सरकार ने दाल का अतिरिक्त आयात करने का फैसला किया है। फिलहाल यह तय किया गया है कि अरहर दाल 20,000 टन और उड़द दाल 10,000 टन आयात किया जाएगा।

खाद्य मंत्रालय के आकड़ों के मुताबिक सरकार अबतक 56,000 टन दाल आयात करने के लिए करार कर चुकी है। एसके अलावा सरकारी एजेंसियों ने अबतक के स्थानीय बाजार से 1,19,572 टन दाल खरीदी है। इसके बजाय बफर स्टॉक में अबतक 1,75,572 टन दाल जमा हो चुकी है।

फिर भी, इन दालों की वितरण व्यवस्था इतनी लचर और त्रृटिपूर्ण है कि बाजार में प्रभाव नहीं पड़ रहा है। एक प्रकार से देश में जैसे चावल और गेहूं रिकॉर्ड मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद खुदरा बाज़ार की कीमतों पर अपना असर नहीं डाल रहा है तो फिर दालों के इस मात्रा का बाज़ार में मूल्य नियंत्रण पर असर को कोई मतलब नहीं है।

उल्लेखनीय है कि, केंद्र ने अबतक राज्य सरकारों को 29,000 टन से ज्यादा दाल सस्ती दरों पर तय कराई है। 29 राज्यों के लिए यह भी अति सीमित मात्रा है और यह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।

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