बनारसी ‘यथार्थ गप्पाज़ी ज्ञान’ : Corona …‘तेरी मौसियों’…जिन्दाबाद!

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“कोरोना …आइसोलेशन कालखंड वास्तव में ‘बनारसी समाज जीवन’ में सबसे बड़ा संकटकाल है। ‘अड्डेबाज़ नियंत्रित गप्पेबाज़ी’ से अलग किया जाना दुरुह सज़ा है जिसे …बनारसिया रंग में रंगा मन-मष्तिष्क सहज़ समझता है। बनारस जैसे सांस्कृतिक-सामाजिक परंपरा में रगड़कर ‘चिकना’ बना 20वीं शताब्दी के 9वें दशक का मध्यमवर्गीय किशोर स्कूल काल में ‘परिवार-समाज नियंत्रण’ के दर्द को बखूबी महसूस किया है…”   

पंकज रघुवंशी के फेसबुक वॉल से/ प्रस्तुती- रिपोर्ट4इंडिया फीचर डेस्क।  

1990 के दशक का क्लास 9th का बच्चा अपने आप खोया रहने वाला लता मंगेश्कर, मोहम्मद रफी और मुकेश के गाने सुन प्रेम रस में डूबे भावी जीवन की कल्पना करते हुए घर की चारदीवारी को अपना सम्पूर्ण संसार मानता था। हास्य और व्यंग भी सिर्फ अपने पारिवारिक सदस्यों से उछल कर घर के आंगन में गिर-बिखर जाता था, जिनसे पूरा घर खिलखिला जाता था।

समय बदला, क्लास 10th में आया कुछ ‘अफलातून ब्राण्ड’ के दोस्त बने। कम अंतर्मुखी होने के कारण अड्डेबाजी शुरू हुई। बनारसी कौन जो लंका, बीएचयू व गंगा के किनारे रहे और ससुरा बैठकी न लगाएं। शुरू में पिताजी काफी नाराज होते थे। उनकी नजर में चौराहे पे खड़े होकर चाय पीना ‘कत्ल’ करने जैसा गुनाह था। लेकिन प्रभु ने हमको भी अलग मिट्टी से गढ़ दिया था …हम थेथर हो गये थे। मतलब …कुत्ते की दुम। पिताजी समझ गए कि अब ये (बच्चा) हाथ से निकल गया …इसे बोलना व्यर्थ है। और …अब जब कभी हम किसी कारणवश अड्डे पे न जाएं तो वो खुद ही कहते थे …आज जाना नही है क्या?

अस्सी घाट : मौजूदा वक्त के तूफानों व उलट-फेर को बेअसर कर ‘शान व इत्मीनान’ बनाए ऱखने वाले पंकज रघुवंशी (बाएं) ‘अफलातून ब्राण्ड’ दोस्तों के साथ। 

यह सुनके थोड़ा संकोच होता …लेकिन ऊपर हमने लिखा की कुछ अफलातूनी ब्रांड के दोस्त बन गए थे जो जीवन को समाजिकता के तालाब में डूबो-डूबो के निचोड़ रहे थे, उसका मजा हम भी ले रहे थे और इस टाइप (अफलातून ब्राण्ड) के दोस्तो की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी।

समय बदला …बीएचयू से ही पोस्ट ग्रेजुएशन किया। उस समय मित्रों की संख्या उंगली पे गिनी जा सकने लायक नही थी। समाजिकता इतनी थी कि चाय पीने रात में भी दशाश्वमेघ घाट पे, अस्सी में पप्पू चाय के यहां चले जाएं या हनी, लेमन, जिंजर पीने दरभंगा घाट में पकालू (दुकानदार) के यहां। बाद के दिनों में कुछ चुने हुए मित्र ही बचे …ऐसा नहीं कि बाकियों से मित्रता खत्म हो गई …बस सब अपने खाने-पकाने और जीवन की चक्की चलाने में व्यस्त हो गए …बात उनसे आज भी होती है। उपरोक्त फ़ोटो में दिखने वाले अधिकतर मित्र उस समय से साथ है जब हम सब निकर के नीचे अंडरवियर भी नहीं पहनते थे। नीचे अभी तीन चार दिन पहले तक अड्डा जिस तरह से गुलजार होता था, उसी की एक झलक है।

बनारस : स्वाद भी, प्रस्तुती भी।

करोना ने सबको घरों में कैद करके क्लास 9th की तरफ धकेल दिया है। अंतर सिर्फ इतना है कि क्लास 9th के उस बच्चे के बच्चे अब क्लास 9th में आ चुके हैं और पारिवारिक हास्य और व्यंग की जगह जिओ के नेट और वेब सीरीज ने ले ली है। समाजिकता के साथ बच्चे एक जिम्मेदार नागरिक बने यश और सफलतापूर्ण जीवन जिये …प्रभु से यही कामना है।

इस उम्मीद के साथ कि, करोना तो खत्म हो ही जायेगा …और अड्डे की रौनक पुनः लौटेगी …सभी फिर से एक-दूसरे की टांग खीचेंगे …कोरोना-तेरी-मौसियों…जिंदाबाद।

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