जातीय गणना न्यायोचित्त नहीं, हर जाति में अगड़े और हर जाति में पिछड़े 

0
602

जनगणना के दौरान आर्थिक-सामाजिक स्थिति की गणना में विसंगतियों की भरमार। गणना के दौरान सभी अपने को पिछड़ा बताते हैं और वे जो कह दे, वही सही है।

इन्हीं कारणों से 2011 जनगणना के दौरान आंकड़ों को आजतक सार्वजनिक नहीं किया गया

रिपोर्ट4इंडिया/ नई दिल्ली।

देश में होने वाली जनगणना में जाति जनगणना को लेकर मोदी सरकार ने अपना रूख स्पष्ट किया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मांगे गये जवाब में सरकार ने कहा कि है जनगणना के दौरान पिछड़ी जातियों की जनगणना नहीं होगी। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायोचित्त। महाराष्ट्र सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गई थी और केंद्र सरकार को आदेश देने को कहा था कि वह जनगणना में पिछड़ी जातियों की गणना करे।

महाराष्ट्र में शिवसेना-कांग्रेस गठबंधन सरकार ने कोर्ट को बताया था कि 2011 की जनगणना में जातियों के सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर आंकड़े एकत्रित किये थे। हालांकि, तमाम विसंगतियों के चलते यह आंकड़ा आजतक जारी नहीं किया गया।

इस मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि जनगणना करते समय अन्य पिछड़ी जातियों की जनगणना नहीं की जाएगी और ऐसा करना तर्कसंगत है। ।

2011 जनगणना में जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की गणना के आंकड़े इतने अजीबोगरीब थे कि उन्हें कभी सरकार ने जाहिर नहीं किया। अब तक जनगणना में केवल अनुसूचित जातियों और कबीलों की ही गणना हुई है। पिछड़ों की गणना के दौरान हर जाति के लोग अपने आप को पिछड़ा बताने लगते है। क्योंकि उन्हें लगता है कि भविष्य में सरकारी योजनाओं के लाभ में वे अपने को शामिल कर सकें।

साथ ही, पूरे देश में पिछड़ी जातियों का सर्वमान्य स्थिति नहीं है। प्रदेश के एक जिले में जो जाति सवर्ण है, वही दूसरे प्रदेश के अन्य जिले में पिछड़ी है। केवल महाराष्ट्र के आंकड़े को देखें तो एक करोड़ 17 लाख लोगों ने बताया कि उनकी कोई जाति नहीं है। बाकि लोगों ने अपनी-अपनी जातियां लिखवाई, जिनकी संख्या 4 लाख 28 हजार थी। इनमें अनुसूचित और पिछडी जातियों की संख्या सिर्फ 494 थी। इनमें भी ज्यादतर जातियों में बमुश्किल सौ लोग थे।

किसी व्यक्ति की जाति को निर्धारित करने का कोई निश्चित वैज्ञानिक पैमाना नहीं है। गणना के दौरान वह जो कह दे, वही सही है। सच्चाई यह है कि पिछड़ा, पिछड़ा होता है। उसकी कोई जाति नहीं होती। हर जाति में पिछड़े हैं और हर जाति में अगड़े हैं। जनगणना के दौरान मुश्किल यह होता है कि गांवों के जमींदार, जिनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं, वह जात के आधार पर अपने को पिछड़ों में शामिल करवा लेते हैं।