Lakhimpur khiri : आदिवासियों की जमीन लूटने वाले ‘माफिया’ देश विरोध की ‘राह’ पर

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लखीमपुर खीरी- समग्र परिदृश्य।

तत्कालीक समस्या नहीं है लखीमपुर खीरी की ‘भयावहता’। तथाकथित ‘किसान’ के नाम पर की ‘क्रूरता’ और ‘लूट’ के पीछे कांग्रेस का हाथ 

मनोज कुमार तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया। 

विभाजन के बाद पाकिस्तान से आये बड़ी संख्या में पंजाबियों को 1950-60 के दशक में उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में जमीन देकर बसाया गया था। परंतु, बाद में इन ‘रिफ्युजी पंजाबियों’ ने स्थानीय आदिवासियों को मारकाट कर उनकी जमीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया। उपजाऊ जमीन को मुफ्त में पाने के लिए पंजाब से बड़े-बड़े जमींदारों-रइसो, नेताओं ने यहां के स्थानीय लोगों में डर का माहौल पैदा किया और औने-पौने दामों पर आदिवासियों की जमीन हड़पकर बड़े पैमाने पर फार्म हाउस बनाये गये। उसके साथ ही, बड़े पैमाने पर सरकारी और वन भूमि पर भी कब्जा किया गया।

1970-1980 दशक में यह समस्या विकराल हुई और सरकार भी इस मसले को लेकर सतर्क हुई। 1981 में आदिवासियों की जमीनें नहीं खरीदने और सीलिंग एक्ट आदि भी पास किया गया परंतु, पंजाब में आतंकवादी गतिविधियों में बढ़ोतरी और खालिस्तान आंदोलन के मद्देनजर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इस कोई कार्रवाई नहीं की। तत्कालीन समय में कांग्रेस की सरकार पूरे देश में थी। वे पंजाब में भी राज करते थे और उत्तर प्रदेश, दिल्ली-बिहार आदि प्रदेशों में भी। इन्हें चढ़ावा चढ़ता रहा है और ये समस्याओं से मुंह मोड़ते गये, जैसा कि कांग्रेस की राजनीति रही है। बाद में कांग्रेस सरकार के समर्थन, सरकारी अधिकारियों और नेताओं के गठजोड़ ने सीलिंग से बचने के लिए बड़े पैमाने पर साढ़े 12 एकड़-साढ़े 12 एकड़ के जमीन के टूकड़ों की अलग-अलग नामों से रजिस्ट्री कराने लगे।

यही नहीं, इस क्षेत्र में पंजाब के अकाली और कांग्रेस से जुड़े नेताओं ने बड़े पैमााने पर जमीनें हड़पी और फार्म हाउस बनाये। बाद में इन नेताओं ने साढ़े 12 एकड़ जमीन के नाम पर ही हजारों करोड़ रुपये की आनाजों की सब्सिडी हजम करने लगे। चुकि, सीलिंग का नियम साढ़े 12 एकड़ से ज्यादा भूमि पर थी इसीलिए ऐसा किया गया। क्षेत्र के गरीबों-आदिवासियों को उनका हक नहीं दिया गया।

पिछले दिनों लखीमपुर खीरी की भयावह वारदात और खालिस्तानियों की मौजूदगी ने क्षेत्र का पूरा माहौल बदल दिया है। देखना है कि आगे इस समस्या पर सरकार का क्या रूख रहता है। वैसे, सबकी नजरें 2022 के विस चुनाव पर है और उसकी को ध्यान में रखकर राजनीति की जा रही है। यदि 2022 में बीजेपी सरकार उप्र में आयी तो क्या वह इस पूरे मसले को नये सीरे से जांच कर वहां पनप रहे पैसा और देश विरोधी गlfविधियों पर रोक लगायेगी? यह बड़ा सवाल है और इसके उत्तर की अपेक्षा भी केवल बीजेपी से ही है।

यह मामला जब से प्रकाश में आया है, उत्तर प्रदेश और पूर्वी राज्यों के लोगों की निगाह इस पर है। पंजाब में पंजाबी क्या करते हैं, उससे ज्यादा मतलब देश के अन्य भागों के लोगों को नहीं होती। परंतु, पंजाब से बाहर किसी राज्य में अलगाव और क्रूरता की सारी हदें तोड़ दी जाय तो इसका असर दूरगामी होता। दिल्ली के सिंधु बॉर्डर पर तथाकथित निहंगों द्वारा एक दलित युवक की तालिबानी तरीके से नृशंस हत्या किये जाने के बाद पंजाबी समाज में पनप रहे आतंकियों व तालिबानियों को लेकर भी शेष समाज में भय, क्षोभ व गुस्सा है। आगे यह कौन-सा रूप लेगा देखना बाकि है।