पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नया नारा …’ढोर से बच लो या फिर चोर से’ 

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उप्र चुनाव में कानून के शासन का राज का मुद्दा सबसे उपर है।

“उप्र विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा वर्तमान में कानून-व्यवस्था की स्थिति और अखिलेश राज में दंगा व लूटमार का राज के बीच है। प्रदेश में सर्वत्र और सबके मुंह पर यही मुद्दा है और भविष्य का डर भी है। परंतु, एक परेशानी आवारा पशुओं का भी है परंतु, इसका निदान भी कानून का राज से ही चुनावी नारे के रूप में ही है।” 

डॉ. मनोज तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया (UP Assembly Election Desk/New Delhi)

उत्तर प्रदेश चुनाव का प्रथम चरण जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है चुनावी गहमा-गहमी और प्रचार का रंग भी घना होता जा रहा है। चुनाव में नये-नये नारे रोजाना उछल रहे हैं। हालांकि, निर्विवाद रूप से पूरे प्रदेश में एक मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण है और वह हा कानून राज की स्थापना और दंगा-लूटमार के आतंक से छुटकारा। इस मुद्दे पर योगी सरकार का टेंपो हाई है, सर्वत्र टाइट है और जैसे सबकी जुबान पर इस उपलब्धि का ही राग है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दंगल प्रथम चरण में है और फिलहाल बीजेपी सहित विपक्ष का जोर भी इसी क्षेत्र में है। किसानी और कृषि प्रधानी के क्षेत्र में कानून-व्यवस्था का राज प्रमुख मुद्दा है। मुजफ्फरनगर का दंगा भला यह क्षेत्र कैसे भूल सकता है? परंतु, कुछ किसानों का मुद्दा अवारा पशुओं को लेकर भी है सरकार से इसका हल चाहते हैं। गांवों में अवारा पशुओं का मुद्दा उठाने की प्रतिक्रियास्वरूप इसके साथ एक नारे का जोर है।

इस क्षेत्र में पशुओं को ‘ढोर’ कहते हैं। ढोर यानी गाय, बैल भैंस आदि चौपाया जानवर आते हैं और हिन्दी पर्याय में ढोर उस पशुवर्ग का सूचक है, जिनके ‘खूर’ होते हैं। योगी सरकार मुसलमानों के अवैध कटान (अवैध बूचड़खाना) पर रोक से कृषि क्षेत्र में ऐसे जानवरों की संख्या बढ़ गई जिन्हें खुले में छोड़ दिया जाता है। यह एक मुद्दा है और अखिलेश सरकार के दौरान अवैध बूचड़खाने धड़ल्ले से चलते थे। इस दौरान पशुओं की चोरो की घटनाएं भी बढ़ गई थी।

अधिकांश जनता का ही मानना है कि, अखिलेश सरकार की परस्ती में रात में कौन कहे, दुधारू पशुओं आदि को दिन-दहाड़े पकड़कर अवैध स्लाटर हाउसों या फिर मुसलिम मुहल्लों में काट दिया जाता था। वाहन चोरी, छिनैती, हत्या, दंगा-बलवा, मारपीट, महिलाओं पर छींटाकशी, रेप आदि की वारदात सरेआम होते थे। इन वारदातों को लेकर सरकार व पुलिस-प्रशासन के ‘कान पर जू तक नहीं रेंगता’ था। सरेआम लोगों का आरोप है कि ऐसे बहुतायत अवैध क्रिया-कलापों में लिप्त मुसलमानों को जैसे अखिलेश सरकार की सरपरस्ती हासिल थी। पुलिस थानों में राहत की उम्मीद को लेकर पहुंचे पीड़ित तब और ज्यादा आशंकित हो जाते थे, जब देखते थे कि पहले से ही पुलिस थाने में बैठा बदमाश ठहाका लगा रहा है। अखिलेश राज में शासन-प्रशासन के इस भयंकर रूप को लोग भूल नहीं सकते और इसे ही याद दिलाते हुए इस चुनाव में योगी राज को दोबारा स्थापित करने को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नारा चल रहा है … या ‘ढोर’ से बच लो या फिर ‘चोर’ से।