‘इन्द्रप्रस्थ’ और ‘दिल्ली सल्तनत’ के बीच ‘चुनाव’ का चुनाव

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जीवन संघर्ष में हिन्दू।

शाहीन बाग- ओखला व अन्य मुसलिम बाहुल्य इलाकों में कई सौ मीटर तक वोटरों की लगी लंबी लाइन, हिन्दू बाहुल्य क्षेत्रों में वोटर सुस्त

Report4India Bureau/ Manoj Kumar Tiwary/ New Delhi.

भारत में भले ही नई दिल्ली के तौर पर आज राष्ट्रीय राजधानी में जाना जाता है परंतु इतिहास में यह शहर सात पर बसी व उजड़ी। महाभारत काल में भारत की सबसे शक्तिशाली राज हस्तिनापुर से हटाए गए पाण्डवों के लिए अलग राजधानी इन्द्रप्रस्थ बनाई गई जिसमें भगवान श्रीकृष्ण का योगदान रहा। कहा जाता है कि हिन्दू सनातन धर्म में निर्माण के देवता विश्वकर्मा ने इन्द्रप्रस्थ के लिए अद्भुत व प्रभावशाली संरचना बनाया। कालान्तर में यही इन्द्रप्रस्थ 10वीं से 12वीं शताब्दी में ‘दिल्ली’ या ‘दिल्लिका’ के रूप में सामने दिखता है। 13वीं शताब्दी के शुरुआत में ही मोहम्मद गोरी ने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को सत्ता सौंप गुलाम वेश के रूप में ‘दिल्ली सल्तन’ की नींव रखी। 1911 में ब्रिटिशों ने कलकत्ता से राजधानी हटाकर दिल्ली लायी और उसके बाद नई दिल्ली का निर्माण शुरू हुआ जो 1947 में आजादी के बाद औपचारिक रूप से देश की राजधानी बनाया गया।

नये नागरिकता कानून (सीएए) के बाद नई दिल्ली में मुसलमानों ने अपनी नागरिकता के खात्मे का आरोप लगाते हुए पाकिस्तान-बांग्लादेश  से आए वहां के अल्पसंख्यकों को नागरिक बनाए जाने का विरोध के साथ ही इस देश के मुसमानों को भी भारतीय नागरिक बनाने की मांग को लेकर शुरू किया। कांग्रेस व आम आदमी पार्टी ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया। इस प्रदर्शन और हिंसा के केंद्र में केजरीवाल के विवादित विधायक अमानतुल्ला खान रहे। जिस प्रकार विरोध को पीछे रख हिंसा-आगजनी का तांडव दिल्ली की सड़कों पर किया गया, उसने 1984 के सिख दंगे की याद दिला दी। जामिया-इस्लामिया के रास्ते शाहीन बाग में दिल्ली से नोएडा जाने वाली सड़क को पुरी तरह से बंद कर स्थायी धरना-प्रदर्शन और इस मंच से मुसलमानों की ताकत और भारत विरोध में लगाए गए ‘आजादी’ के नारों ने दिल्ली की राजनीति की फिंजा को ही बदल कर रख दिया। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव में इसे कट्टरता की पराकाष्ठा करार दिया और केजरीवाल व कांग्रेस पर निशाना साध कहा कि लोकतांत्रिक देश में यह मात्र संविधान का ही नहीं, बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय का सीधा विरोध है। इन विरोध-प्रदर्शनों में लहराए जा रहे तिरंगे और संविधान की कॉपी मात्र पर्दा है। धर्म के नाम पर मुसलमानों के लिए अगल देश के तौर पर साढ़े 9 लाख वर्गमीटर जमीन ले लेने के बाद भी पाकिस्तान जैसे कट्टर मुसलिम देश में प्रताड़ित हिन्दू समुदाय का विरोध स्पष्ट निशानदेही है कि इस देश में एकबार फिर वहीं ताकतें उभर गईं हैं जिन्होंने हिन्दुओं के साथ नहीं रहने के नाम पर एक चौथाई जमीन ले लिया और वहां हिन्दुओं का कत्लेआम किया, हिन्दू महिलाएं-बच्चियों के साथ बर्बरता से रेप के बाद हत्या की।

प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में इसे इंगित कर कहा कि कैसे एक व्यक्ति (जवाहर लाल नेहरू) ने प्रधानमंत्री बनने के लिए देश का बंटवारा स्वीकार किया और आगे सत्ता में बने रहने के लिए मुसलमानों को  वोट बैंक बनाकर ऐसी कट्टरता का समर्थन किया।

दिल्ली में आज का चुनाव लोकतंत्र में राजनीति के पर्दे के पीछे कट्टरवादी ताकतों को परास्त करने का दिन है। यदि, ऐसा नहीं हुआ तो इसका खामियाजा देश को, देश की समरसता को, देश की विविधता और उसकी समृद्ध परंपरा, सभ्यता-संस्कृति को एकबार फिर पददलित होना पड़ेगा।

 

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