‘जीने’ का अर्थ स्वार्थ में नहीं, …संघर्ष में जीना

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जीवन एक संघर्ष।

कुछ जो स्वार्थ के चलते दुनिया भर की परेशानी की बात करते हैं वह सर्वसम्मत नहीं है….दुनिया की परेशानी स्वार्थ के चलते नहीं बल्कि परोपकार की अस्वाभाविक और अवैज्ञानिक शिक्षाओं के कारण है। व्यक्ति स्वयं ही जन्म से मृत्यु के बीच अपना ही सुख खोज ले तो यही दुनिया पर परोपकार करना है…यही बुद्ध बन जाना है…जहां स्वार्थ नहीं है, दुख नहीं है।    

डॉ. मनोज कुमार तिवारी।

बुद्ध मीलों चलकर एक गांव में पहुंचे। ग्रामीण बुद्ध के स्वागत में उमड़ पड़े। इस पर बुद्ध ने कहा, मेरी नहीं आपकी कृपा है…मैं बोलने आया हूं और आप सुनने को उमड़ पड़े। मैं भर गया हूं और बरसना चाहता हूं…इसीलिए आपको खोजता-फिरता यहां आया हूं…जैसे बादल बरसने को सूखी जमीन खोजते भटकते हैं…नदी सागर खोजती है जहां ढलक जाएं…फूल सूरज की ओर निहार रहे हैं…कि आखिर खिल कर बिखर जाएं…।

बहुत से दार्शनिक मानते हैं कि सेवा-भाव भी स्वार्थ भाव से संपन्न होता है। आज हम जिस दुनिया में गुज़र रहे हैं ….वह स्वार्थ की नैसर्गिक व्यवस्था वाली दुनिया है…जहां हर एक अपने लिए जीने की कोशिश और…जीने की खोज़ में रत हैं। हालांकि यह कोशिश दूसरे के लिए भी जीने का भी एक सहज़ जरिया है…आखिर व्यक्ति इस दुनिया में अकेला कैसे जी सकता है? अकेला जीना वास्तव में…घुट-घुट कर मरने की तरफ जाना है। अपने लिए जीना सिर्फ स्वयं के लिए जीना नहीं है… जीने का अर्थ बहुव्यक्तिवादी है तभी सुख-संपन्नता की अनुभूति की प्राप्ति होती है और इसीलिए इस जीवन में संघर्ष ही सुख के स्त्रोत हैं।

कुछ जो स्वार्थ के चलते दुनिया भर की परेशानी की बात करते हैं वह सर्वसम्मत नहीं है….दुनिया की परेशानी स्वार्थ के चलते नहीं बल्कि परोपकार की अस्वाभाविक और अवैज्ञानिक शिक्षाओं के कारण है। व्यक्ति स्वयं ही जन्म से मृत्यु के बीच अपना ही सुख खोज ले तो यही दुनिया पर परोपकार करना है…यही बुद्ध बन जाना है…जहां स्वार्थ नहीं है, दुख नहीं है।

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