प्रेम नित्य है, अंत नहीं…

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” संसार में कोई जीवधारी पूर्ण नहीं है परंतु पूर्णता प्राप्त करने के लिए शरीर धारण करने या जन्म लेने की जरुरत नहीं है। देह के बिना सूक्ष्म शरीर के द्वारा सूक्ष्मजगत में हलचल उत्पन्न कर वह काम हो सकते हैं जो देहधारी नहीं कर सकते। “

रिपोर्ट4इंडिया आध्यात्म एवं संस्कृति डेस्क। 

प्रेम नित्य व अनंत है जबकि वासना, लिप्सा, तृष्णा और मोह का अंत है। सत् और तम से मिलकर इस संसार का निर्माण हुआ है। रज (जिसमें वासना, लिप्सा, तृष्मा, मोह आदि सम्मिलित है) सत् और तम दोनों का मिश्रण है परंतु रज की कोई अलग से सत्ता नहीं है। सुर-असुर, शुभ-अशुभ, भगवान-शैतान की मौजूदगी में सत्-तम और रज सम्मिश्रण स्वरूप है। इसीलिए मनुष्य को अपूर्ण माना गया है।

इस संसार में कोई जीवधारी पूर्ण नहीं है परंतु पूर्णता प्राप्त करने के लिए शरीर धारण करने या जन्म लेने की जरुरत नहीं है। देह के बिना सूक्ष्म शरीर के द्वारा सूक्ष्मजगत में हलचल उत्पन्न कर वह काम हो सकते हैं जो देहधारी नहीं कर सकते।

लिप्सा, तृष्णा और वासना जो आमतौर पर प्रेम का आवरण ओढ़कर हमारे सामने मौजूद होतीं है, समस्या का कारण हैं। यह व्यवहारिक है कि जिस वस्तु को हम पाने की जितनी ज्यादा लालसा रखते हैं, प्राप्त कर लेने के बाद धीरे-धीरे उससे हम दूर होने लगते हैं। इसीलिए लंबे समय तक एक ही भोज्य पदार्थ हमें अरुचिकर लगने लगता है। यही बात इंद्रियों के संदर्भ में है। काम-वासना में संलिप्त लोग भोग्य में लगे रहते हैं। भोग प्रेम नहीं है बल्कि वह लोभ और मोह का भावुकता से भरा मिश्रण ही है।

व्यक्ति प्रेम के संबंध में यह बात जुड़ती है। मनुष्य के भीतर रहने वाली आत्मा जब स्नेह भाव से जुड़ती है तो उसकी श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा रखने और उसे अभिसिंचित करने की भावना रहती है। दोष प्रत्येक व्यक्ति में संभव है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जो त्रुटियां हैं, उन्हें सुधारने पर उम्मीद के साथ ही यह भी प्रयास किया जाना चाहिए कि जबतक अपने अनुकूल स्थितियां उत्पन्न न हो तबतक प्रतिकूलता को सहने और उसे निबाहने का प्रयास होना चाहिए। इस संतुलित दृष्टि के साथ जो प्रेम उत्पन्न होता है, उससे न तो निराशा उत्पन्न होती है और न ही रंग-रूप-लाभ का आकर्षण घटने या कम होने पर कोई व्यथा उत्पन्न होती है।

प्रेम वस्तुत: एक आन्तरिक अनुभूति है जो पदार्थ या व्यक्ति के माध्यम से विकसित भर होता है लेकिन अपने आदर्शों और श्रेष्ठता से वह हर जगह फैल जाता है। प्रेम एकांगी होता है इसीलिए उसका अंत नहीं होता। कलम टूट जाने से मष्तिष्क में भरी बुद्धि का अंत नहीं होता।

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