भौतिक रचनाएं क्षणभंगुर, साक्षी भाव ही स्थायी और चिर निरंतर   

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प्रकृति का ...स्थायी नाद

“साक्षी भाव भौतिक नहीं होता, इसलिए यह समय का हिस्सा भी नहीं होता। साक्षी, सिनेमा की उस स्क्रीन की तरह है, जिस पर हर रचना हाजिर होती है और फिर गायब हो जाती है। इस बदलाव का जैसे उस स्क्रीन पर कोई असर नहीं पड़ता, वैसे ही साक्षी भी हर प्रकार से प्रभाव से मुक्त रहती है, वह स्थायी है।”

रिपोर्ट4इंडिया आध्यात्म डेस्क।

इस संसार में दो ही परिवर्तन होते हैं –एक वह जिसे में भौतिक निर्माण अथव रचना के रूप में देखते हैं और दूसरा है- जिस अंतर्गत यह निर्माण हो रहा है।

जो होना है… अच्छा-बुरा, छोटा-बड़ा… कैसा भी हो… वह अपने समय से जरूर होगा। भौतिक रचनाएं या परिस्थितियां समय पर निर्भर करती हैं और ये सभी अस्थायी होती हैं। अस्थायी रचनाओं का उत्त्थान और पतन का क्रम है। बनना और बिगड़ना या नष्ट हो जाना।

महत्वपूर्ण तथ्य वह समय है, जिसके अंतर्गत अस्थायी भौतिक घटनाएं घटित हुईं है। यौगिक विद्या में इसे वास्तविकता, चेतना और सत्यता कहा गया है। सामान्यत: इसे साक्षी भाव कहते हैं जिसने स्वयं हर चीज का अनुभव किया हो, उसे प्रमाणित किया हो।

यह साक्षी भाव भौतिक नहीं होता, इसलिए यह समय का हिस्सा भी नहीं होता। साक्षी, सिनेमा की उस स्क्रीन की तरह है, जिस पर हर रचना हाजिर होती है और फिर गायब हो जाती है। इस बदलाव का जैसे उस स्क्रीन पर कोई असर नहीं पड़ता, वैसे ही साक्षी भी हर प्रकार से प्रभाव से मुक्त रहती है, वह स्थायी है।

आध्यात्मिकता का अर्थ भौतिकता के पार है, क्योंकि अगर आप भौतिक दुनिया में खो गए तो आप इस दुनियावी जंजाल में फंसकर गोल-गोल घूमते रहेंगे, किसी स्थान पर पहुंच नहीं पाएंगे।

जबकि साक्षी होने का अर्थ… उस स्क्रीन जैसा होना है जिस पर सब कुछ हो तो रहा है, लेकिन उन घटनाओं का उस पर कोई प्रभाव नहीं है… वह पूरी तरह से उन सभी से मुक्त है। आध्यात्मिक रूप से जागृत व्यक्ति इस वास्तविकता को समझता है और हमेशा साक्षी भाव के साथ जुड़ा रहता है।