भारत के मन-प्राण में रचा बसा प्रकाश पुंज दीप

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” दीपपर्व सांस्कृतिक सृजन है भारतीय जनगणमन का। तमस् आच्छादित लोकमन के भीतर और बाहर मधुर प्रकाश भरने का उत्सव। दीप उगते हैं। एक ही घर में अनेक। सबके सब निःस्वार्थी । वे तमस् से टकराते हैं। तिलतिल जलते हैं, अपनी काया जलाते हैं। प्रकाश दीप्ति फैलाते हैं। दूर-दूर तक लेकिन अपने नीचे के अंधकार की चिन्ता नहीं करते। दीप पर्व हमारी प्रकाश प्रीति का अनुष्ठान है। दीप भारत के मन प्राण में रचा बसा प्रकाश पुंज है। “

“न तत्र सूर्यो भाति न चंद्रतारकं/नेमा विद्युतो भान्ति कुतोअयम् अग्निः”

हृदय नारायण दीक्षित।

हृदय नारायण दीक्षित।

हम सब प्रकाश अभीप्सु हैं। संभवतः अनेक जन्मों से ही। दो जीवन प्रत्यक्ष हैं। मां के गर्भ का जीवन पहला है। गर्भ गहन अंधकारपूर्ण होता है। हमारे प्राणों में अंधकार से प्रकाश पाने की बेचैनी गर्भावस्था से ही है। दूसरा जीवन संसार में जन्म लेने के बाद है। संसार में अंधकार और प्रकाश साथ साथ हैं। एक आता है दूसरा जाता है। सृष्टि का विकास भी अंधकार से हुआ। ब्रह्माण्ड विज्ञानियों ने इसके मूल को ब्लैकहोल कहा है। ऋग्वेद के एक ऋषि परमेष्टिन ने नासदीय सूक्त में सृष्टि की पूर्व स्थिति का आश्चर्यजनक वर्णन किया है। उन्होंने आगे कहा, “तब सर्वत्र अंधकार पूर्ण जल – अप्रकेतं सलिलं था। 1⁄4वही 10.129.31⁄2 सही बात है, जल सृष्टि का उद्भव केन्द्र है।

अंधकार आपूरित जल ध्यान देने योग्य है। चीन के एक दार्शनिक लाउत्सु 1⁄4ई0पूर्व 400 वर्ष लगभग1⁄2 सृष्टि रचना पर था।
उनकी पुस्तक ‘ताओ तेहचिंग’ काफी महत्वपूर्ण है। लाउत्सु के विचार में प्रकृति के भीतर सुंदर अंतर्भूत व्यवस्था है। उसने इस व्यवस्था का नाम रखा है – ताओ। यहां प्रकृति संचालन के नियम ‘ताओ’ हैं। लाउत्सु ने लिखा है “अंधकार से प्रकाश उत्पन्न हुआ। अरूप से व्यवस्था का जन्म होता है। ताओ जीवन ऊर्जा को जन्म देता है।” लाउत्सु के निष्कर्ष में अंधकार से सृष्टि की उत्पत्ति हुई। यह धारणा उसके सैकड़ो वर्ष पूर्व ऋग्वेद में हैं। ऋग्वेद में असत् से सत् प्रकट हुआ। लाउत्सु के कथन में अंधकार से प्रकाश पैदा हुआ। अंधकार और प्रकाश अलग अलग निरपेक्ष सत्ता नहीं है।

अंधकार प्रकाश के पूर्व की स्थिति है। प्रकाश अंधकार का विकास है। दोनो अलग अलग सत्ता होते तो सृष्टि सृजन या विकास की कार्रवाई में एक से दूसरे का जन्म न होता। अंधकार से प्रकाश, असत् से सत् या अव्यक्त से व्यक्त होने की धारणा ऋग्वेद 1⁄410.72 व 10.1291⁄2 में
है। लाउत्सु और ऋग्वेद की चिंतन भूमि भले ही अलग अलग है लेकिन निष्कर्ष एक हैं। प्रकाश प्रीति भारत के मन की मूल प्रकृति है। पूर्वज ऋषि इस प्रकाश का मूल केन्द्र जानना चाहते थे। वैसे प्रत्यक्ष रूप में सूर्य प्रकाश का केन्द्र है, फिर प्रकाशदाता चन्द्र और तारागण हैं। मेघों में कड़क के साथ उत्पन्न विद्युत प्रकाश भी प्रत्यक्ष है लेकिन इन सभी प्रकाश केन्द्रों का उद्भव भी हमारे पूर्वज ऋषियों की जिज्ञासा था। उपनिषद् साहित्य में कठोपनिषद्, मुण्डकोपनिषद् व श्वेताश्वतर उपनिषद में इसी प्रकाश अभीप्सा से जुड़ा एक ही मंत्र दोहराया गया है, “न तत्र सूर्यो भाति न चंद्रतारकं/नेमा विद्युतो भान्ति कुतोअयम् अग्निः – उस मूल केन्द्र पर न सूर्य, न चंद्रतारागण, न विद्युत और न ही अग्नि की दीप्ति। ये सब प्रकाश उसी एक प्रकाश से प्रकाशित हैं – तस्य मासा सर्वम् इदं विभाति।”

प्रकाश ज्ञान और प्रकाश प्राप्ति की ऐसी अभिलाषा दुनिया की अन्य राष्ट्रीयताओं में नहीं है। भारत प्रकाशरत राष्टंीयता है। भा-प्रकाश है। रत संलग्नता है। अंधकार प्रकाश का अभाव ही नहीं है। ऋग्वेद के ऋषियों ने रात्रि-अंधकार को अनुभव किया था। बताते हैं कि “रात्रि ने गांव वन, उपवन और धरती को अंधकार से भर दिया है।” दिवस और रात्रि का मिलन बड़ा प्यारा है। दिवस श्रम है, रात्रि विश्रम। दिवस बर्हिमुखी यात्रा है – स्वयं से दूर की ओर गतिशील। रात्रि दूर से स्वयं की ओर लौटना है। रात्रि आश्वस्ति है। रात्रि का संदेश है – “अब स्वयं को स्वयं के भीतर ले जाओ, बाहर नहीं अन्तर्जगत में। अपने ही आत्म में करो विश्राम।” दिन भर कर्म। कर्मशीलता में थके, टूटे, क्लांत चित्त को विश्राम की प्रशान्त मुहूर्त देती है रात्रि। तमस् हमारे जीवन का भाग है। इसीलिए हर माह एक रात गहन तमस के हिस्से।

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अमावस्या हर माह आती है। यही बताने कि तमस् भी संसार सत्य का अंग है। रात्रि को प्रकाशहीन कहा जाता है पर ऐसा है नहीं। रात्रि में चन्द्रप्रकाश होता है। क्रमशः घटता बढ़ता हुआ। अमावस्या अंधकार से परिपूर्ण रात्रि है। जान पड़ता है कि अमावस ही चन्द्रमा की अवकाश रात्रि है। अमावस का अंधकार उस रात प्रकाश का अभाव मात्र नहीं होता। अमावस की रात्रि में अंधकार होता है अस्तित्व रूप में। उस रात की आकाश गंगा खिलते और दीप्ति वर्षाते हुए बहती हैं। सभी तारे और नक्षत्र अपनी पूरी ऊर्जा में प्रकाश देने का प्रयास करते हैं लेकिन अमावस का अंधकार नहीं भेद पाते। जैसे अमावस अपने तमस् से भर देती है जीवन को वैसे ही पूर्णिमा भी। लेकिन तमस् और प्रकाश की यह अनुभूति प्रतिदिन भी उपस्थित होती है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक का काल प्रकाशपूर्ण रहता है और सूर्यास्त से सूर्योदय ऊषाकाल तक तमस् प्रभाव। तमस् और दिवस प्रतिपल भी घटते हैं जीवन में। आलस्य, प्रमाद, निष्क्रियता, निराशा और हताशा के क्षण तमस् काल हैं। सक्रियता, उत्साह और उल्लास के क्षण प्रकाश पे्ररणा हैं। प्रकाश ज्ञानवाचक है और तमस् अज्ञान का। ज्ञान और मूर्खता भी एक साथ रही रह सकते।

प्रकाश देखने का माध्यम हैं भारत ने प्रकाश को ज्ञानवाची कहा। सत्व, रज और तम प्रकृति के गुण हैं। तीनों परस्पर खेलते हैं। बड़ा दिलचस्प है गुणों का यह खेल। कपिल ने ठीक बताया था कि गुण ही गुणों के साथ खेल करते हैं। प्रकृति का कार्यव्यापार चला करता है। कृष्ण ने इसमें जोड़ा कि “जो गुणों का यह खेल देखते हुए अनासक्त हो जाता है। हे अर्जुन वही सच्चा योगी है।” पूर्णिमा परिपूर्ण चन्द्र आभा है। शरद् पूर्णिमा का कहना ही क्या? वैदिक ऋषि इसी तरह की सौ पूर्णिमा देखना चाहते थे।

‘जीवेम शरदं शतम्’ में 100 शरद चन्द्र देखने की प्यास है। जैसे शरद चन्द्र स्थावर जंगम पर अमृत रस बरसाता है वैसे ही शरद पूनो के ठीक 15 दिन बाद की अमावस्या अपने समूचे सघन तमस् के साथ गहन अंधकार लाती है। पूर्वजों ने बहुत सोच समझकर इसी अमावस्या को दीपोत्सव बनाया। पूर्वजों ने मधुमय वातायन की इस अमावस को भी झकाझक प्रकाश से भर दिया। शरद् पूर्णिमा की रात रस, गंध, दीप्ति, प्रीति, मधु, ऋत और मधुआनंद तो 15 दिन बाद झमाझम दीपमालिका। जहां जहां तमस् वहां वहां प्रकाश-दीप। सूर्य और शरद चन्द्र का प्रकाश प्रकृति की अनुकम्पा है तो दीपोत्सव मनुष्य की कर्मशक्ति का रचा गढ़ा तेजोमय प्रकाश है। प्रकाश ज्ञानदायी और समृद्धिदायी भी है। गजब के द्रष्टा थे हमारे पूर्वज। उन्होंने अमावस रात्रि को अवनि अम्बर दीपोत्सव सजाये। भारत इस रात ‘दिव्य दीपशिखा’ हो जाता है।

जनगण मन पुलक में होती है। आमोद प्रमोद परिपूर्ण उत्सवधर्मा होता है। वातायन मधुमय होता है। शीत और ताप का प्रेम प्रसंग चलता है। नगर, गांव, मकान, दुकान, ऊपर नीचे सब तरफ दीप शिखा। आनंदी अचम्भा है यह। प्रत्यक्ष रूप में शरद् पूनों को ही प्रकाश पर्व जानना चाहिए था। शरद् पूर्णिमा का प्रकाश अमृत कहा गया है। लेकिन तब गहन तमस् का क्या होता? ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय्’ की प्यास का क्या होता? अमावस का गहन अंधकार प्राकृतिक है। भारत के लोग प्रकृति की इस अनुकम्पा का आराधन करते हैं और अमावस को प्रकाश से भरते हैं।

दीपपर्व सांस्कृतिक सृजन है भारतीय जनगणमन का। तमस् आच्छादित लोकमन के भीतर और बाहर मधुर प्रकाश भरने का उत्सव। दीप उगते हैं। एक ही घर में अनेक। सबके सब निःस्वार्थी । वे तमस् से टकराते हैं। तिलतिल जलते हैं, अपनी काया जलाते हैं। प्रकाश दीप्ति फैलाते हैं। दूर-दूर तक लेकिन अपने नीचे के अंधकार की चिन्ता नहीं करते। दीप पर्व हमारी प्रकाश प्रीति का अनुष्ठान है। दीप भारत के मन प्राण में रचा बसा प्रकाश पुंज है।

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