शास्त्री-सी सादगी अब कहां…

0
170

जय जवान, जय किसान के प्रणेता लाल बहादुर शास्त्री के जन्मजयंती पर विशेष

महात्मा गांधी से तनिक कम नहीं थी गुदड़ी के लाल की सादगी। मृत्यु के बाद शास्त्रीजी को वह सम्मान नहीं मिला जिसके वह हकदार थे।

रिपोर्ट4इंडिया ब्यूरो।

नई दिल्‍ली। पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री सादगी के साथ ही निर्णय में बेहद कठोर थे। देश के लोगों की जरूरतें और सरकार से उम्मीदें शास्त्रीजी को हमेशा निर्णय की दृढञता प्रदान करती थी। महात्मा गांधी के जन्मजयंती के दिन ही लाल बहादुर शास्त्री का जन्म जयंती है। महात्मी की सादगी की मिशाल दी जाती है परंतु, लाल बहादुर शास्त्री का जीवन व विचार सादगी-सरलता की मिशाल है।

आर्थिक रूप से बेहद कमजोर शास्त्रीजी ने जीवन में कभी भी अर्थतंत्र को अपने उपर हावी नहीं होने दिया। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनके जीवन में तनिक बदलाव नहीं आया। वे मितव्ययीता व सादगी के मिशाल थे और सबसे पहले पने परिवार के सदस्यों से चाहते थे कि वे सादगी का पालन करें। उनका मानना था कि प्रधानमंत्री होने के नाते उनका केवल अधिकार प्रधामंत्री के रूप में मिल रहे वेतन पर निर्भर है। वे सुविधाओं के गलत इस्तेमाल के बेहद खिलाफ थे और जितनी जरूरत है उतने के उपभोग के ही हिमायती थे।

शास्त्रीजी की सागदी के बारे में अनेक वाक्या है जो मिशाल है। परतंत्रता के काल में वे जेल में थे। उस समय आर्थिक रूप से कमजोर व अक्षम नेताओं की आर्थिक मदद के लिए लाला लाजपत द्वारा स्थापित सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी काम करती थी। जेल में रहने के चलते सोसाइटी की तरफ से शास्‍त्री जी का घर के खर्चा के लिए हर महीने 50 रुपये मिलती थी। परंतु, जब उन्हें पता चला कि खर्चे के लिए 40 रुपए काफी है तो उन्होंने सोसायटी को पत्र लिख कर आगे से 40 रुपए ही देने की गुजारिश की।

लाल बहादुर शास्त्री के सादगी व स्वाभाव का असर उनके पूरे परिवार पर था। उनकी पत्नी ललीता शास्त्री भी उनके पदचिन्हों पर जीवन भर चलती रहीं। निधन से पहले शास्त्रीजी ने कार खरीदने के लिए पीएनबी से 5 हजार रुपए का लोन लिया था। उनके बाद प्रधानमंत्री बनी इंदिरा गांधी ने वह लोन माफ करने की सिफारिश की। परंतु, ललिता शास्त्री ने इसे अस्वीकार कर दिया। उन्‍होंने प्रधानमंत्री शास्त्री के निधन के चार साल बाद तक अपनी पेंशन से लोन चुकातीं रहीं।

प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्रीजी सरकारी सुविधाओं का अपने परिवार के उपयोग के लिए हमेशा मना करते रहते थे। स्वयं भी सुविधाओं के उपभोग के खिलाफ थे। यहां तक कि वे घर में कूलर तक का इस्तेमाल नहीं किया। उनके पुत्र सुनील शास्त्री ने जब उनकी सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल कर लिया तो उन्होंने किमी के हिसाब से पैसा सरकारी कोष में जमा करवा दिया। अकाल के समय में शास्त्रीजी ने आगे आकर नियमित उपवास रखने के व्रत का पालन किया। उनके परिवार के लोगों ने भी सप्ताह में एक दिन का उपवास किया।

परंतु, प्रधानमंत्री के तौर पर शास्त्रीजी की मौत जिन परिस्थितियों में हुआ वह बेहद ही डरावनी व विवादित रहा है। परंतु, बाद की सरकारों ने उनके निधन को सामान्य मौत मान कर कुछ नहीं किया।

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here