योग, आयुर्वेद से ही होंगे ‘स्‍व’ में ‘अस्‍त’

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“भारत के चिंतन-मनन, ध्यान-योग की प्रयोगशाला में हमारे ऋषियों ने जब शांतिपाठ किया तो इसमें सकल चराचर जगत के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक कल्याण की कामना किया। हजारों वर्षो के संघर्ष के कालखंड में भारत का वह ज्ञान-विज्ञान और विधाएं विलुप्त होती गई जो हमारे ऋषियों ने सतत साधना से अर्जित कर मानवता को समर्पित किया था। इन्हीं विधाओं में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा जैसा अमृतमय ज्ञान है, जिससे समस्त मानवता लाभाविंत हो सकती थी। देर से ही सही, लेकिन आजादी के 75 साल बाद एक बार फिर से भारत अपने प्राचीन ज्ञान के आधार पर विश्वगुरु बनने की तरफ आगे बढ़ रहा है।”

मार्कण्‍डेय पाण्‍डेय/ वरिष्ठ पत्रकार।

स्‍वस्‍थ अर्थात स्‍व में अस्‍त। स्‍व में अस्‍त हो जाना, वाहय जगत से अंतरजगत की यात्रा ही स्‍वस्‍थ होना है। इसे यह भी कह सकते हैं कि स्‍व में स्थित होना ही स्‍वस्‍थ होना है। सिर्फ शारीरिक तौर पर निरोग होना ही नहीं, मानसिक और आत्मिक स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता दुनियां में यदि कोई चिकित्‍सा पद्धति करती है तो वह सिर्फ भारत में योग और आयुर्वेद है। दुनिया में जितनी भी भौतिक प्रगति हुई है, वह मनुष्‍य के सुख के लिए हुई है। लेकिन मनुष्‍य है कौन ? और सुख किसे देना है? ‘सुख’ और ‘मै’ को अपने चिंतन में आवृत करने वाला थेरेपी सिर्फ भारतीय चिंतन मनन की प्रयोगशाला में है।

भारत के चिंतन-मनन, ध्यान-योग की प्रयोगशाला में हमारे ऋषियों ने जब शांतिपाठ किया तो इसमें सकल चराचर जगत के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक कल्याण की कामना किया। समस्त वसुधा को अपना परिवार मानते हुए शांति की कामना किया। हजारों वर्षो के संघर्ष के कालखंड में भारत का वह ज्ञान-विज्ञान और विधाएं विलुप्त होती गई जो हमारे ऋषियों ने सतत साधना से अर्जित कर मानवता को समर्पित किया था। इन्हीं विधाओं में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा जैसा अमृतमय ज्ञान है, जिससे समस्त मानवता लाभाविंत हो सकती थी। देर से ही सही, लेकिन आजादी के 75 साल बाद एक बार फिर से भारत अपने प्राचीन ज्ञान के आधार पर विश्वगुरु बनने की तरफ आगे बढ़ रहा है। हमारे योग शिक्षक, आयुर्वेद शिक्षक, हमारी प्राकृतिक चिकित्सा की मांग दुनिया में लगातार बढ़ती जा रही है तो वहीं दूसरी तरफ भारत भूमि पर हिमालय से लेकर गंगा के मैदानी इलाकों और सूदूर पूर्वोत्तर से लेकर दक्षिण हिस्से तक उगने वाली वनस्पतियां, आयुर्वेदिक औषधियों की मांग में तेजी आ रही है।

नई विश्व‍ व्यवस्था में भारत ने अपनी भूमिका प्रभावी तरीके से निभानी शुरु कर दी है। आयुष मंत्रालय की ओर से हील इन इंडिया कार्यक्रम शुरु किया है। यह कार्यक्रम सिर्फ भारत के लिए नहीं तो पूरे विश्‍व और मानवता को आमंत्रण है। निसंदेह दुनिया में चिकित्सा‍ विज्ञान ने काफी प्रगति किया है और कहा जा रहा है कि जीवशास्त्र की प्रगति इतनी अधिक हुई है कि मानव कृत्रिम जीव बनाने तक पहुंच गया है। यूरोप में क्रेग हैंटर की प्रयोगशाला में ऐसे ही दैत्याकार जीव को बनाने के अंतिम चरण तक वैज्ञानिक पहुंच गए तो संसद ने कानून बनाकर उसे रोक दिया। ऐसे जीव खुद अपने नागरिकों और मानवता के लिए खतरनाक साबित हो सकते थे। प्राचीन भारत का ज्ञान-विज्ञान प्रकृति के साथ सामंजस्य से शुरु होता है। हमारा योग, आयुर्वेद शारीरिक, मानसिक और आत्मिक कल्याण के साथ हरप्रकार की व्याधियों से सुरक्षित रखता है। अब इसे वैश्विक स्तर पर पहचान मिलने लगी है।

जोसेफ एस नायर और डेविड फ्राले जैसे विद्वान इसे अपने शब्दों में “सॉफ्ट पावर” कहते हैं। वह चौथी और सातवीं शताब्दी के भारत को याद करते हुए कहते हैं कि भारतीय दर्शन और संस्कृति ने हवेनसांग और फाहयान को आकर्षित किया था। जब हम अपने दर्शन और संस्कृति की बात करते हैं तो योग और आयुर्वेद के बिना वह पूरी नहीं हो सकती। बल्कि यह कहे कि भारतीय दर्शन ही योग और आयुर्वेद से अभिन्न रुप से जुड़ा हुआ है। भारत के आधुनिक लोकतंत्र और साहित्य-सिनेमा की पृष्ठभूमि भी गहराई से हमारे संस्कृति से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि परस्पर मतभेद होते हुए भी एकम सदविप्रा बहुधा वदंति के अनुसार वैचारिक समन्वय है। भौतिक और आध्यात्मिक, चाहें चार्वाक हों या शंकराचार्य भारत में दोनों का समान महत्व है। भारत की इन्हीं विशेषताओं ने विदेशियों को हमेशा आकर्षित किया है। अब आधुनिक काल में जब दुनिया भौतिकता के चरमोत्कर्ष पर है तब उसे भारतीय योग, दर्शन, आयुर्वेद आकर्षित करने लगा है। अल्बानिया, कामरोस, क्यू‍बा, आयरलैंड, मॉरिशस, सउदी अरब, सिसली, श्रीलंका, दक्षिण अफ्रिका, स्वीटजरलैंड, तंजानिया, उक्रेन, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देश अपने स्तर पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन करने लगे हैं। करीब 10 हजार योग शिक्षक अकेले अमेरिका में कार्यरत हैं।

धीरे-धीरे दुनिया खुद ही शाकाहार की तरफ लौटने लगी है, विशेष रुप से विकसित कहे जाने वाले देशों में शाकाहार के आंदोलन चलने लगे हैं। जबकि भारतीय संस्कृति शाकाहार को शुरु से प्राथमिकता देती रही है। इसी प्रकार अधिकतम रोगों के उपचार में जड़ी-बूटी का प्रयोग होता रहा है। वर्तमान में मेडिकल टूरिज्म को सरकार नीतिगत रुप से प्रोत्साहित कर रही है जिससे दुनिया का ध्यान योग, आयुर्वेद की तरफ खींचा है। हील इन इंडिया अर्थात भारत में उपचार भारत को मेडिकल टूरिज्म का हब बनायेगा। प्रकृति और वनस्पतियों पर आधारित आयुर्वेद की चिकित्सा दुनिया की सीमाओं को लांघकर विश्व में सर्वस्वीकार्य होता जा रहा है। भारत में उपचार अर्थात हील इन इंडिया को वैश्विक तौर पर लोकप्रिय करने के लिए आयुष मंत्रालय अग्रसर की भूमिका में खड़ा है। मंत्रालय देश भर में आयुष संबंधित आधारभूत संरचना का तेजी से निर्माण कर रहा है तो वहीं शोध संस्थानों, आयुष उत्पादन केंद्रों को विश्व स्तरीय मानकों के अनुरुप बना रहा है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार के वैश्विक प्रयासों से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस दुनिया भर में लोकप्रिय होने के साथ लोगों की जीवन शैली का हिस्सा बनता जा रहा है। इसके अलावा, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने योग, आयुर्वेद को बढ़ावा देना शुरु किया है तो वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी आयुर्वेद के उत्पादों को मान्यता देते हुए प्रोत्साहित करने लगा है।

इसी क्रम में विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाईलेवल प्रिपरेटरी के 67 सत्र की बैठक बांग्लादेश की राजधानी ढाका में आयोजित हुई जिसमें सभी ने एकमत होकर परंपरागत दवाएं के लिए दिल्ली घोषणा का प्रस्ताव पारित किया। दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के लिए इस दिल्ली घोषणा पत्र में चार प्रमुख बातें कही गई। पहला कि परंपरागत दवाओं के गुणवत्ता को सुनिश्चित करना, अस्पतालों को मानक के अनुसार विकसित करना, इस संबंध में स्पष्ट नीतियों का निर्माण करना और प्रयोगशालाओं को राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला परीक्षण बोर्ड से अनुमोदित होना। डब्लूएचओ के इन सभी दिशानिर्देशों को भारत पहले ही लागू कर चुका है। बल्कि दो कदम आगे जाकर अपने आधारभूत संरचना को मजबूत करने के साथ ही विश्वस्तरीय गुणवत्ता का निर्माण भी कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने साल 2014 के अपने 69वें सत्र में प्रत्येक वर्ष 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया तो भारत की इस प्राचीन विधा पर दुनिया भर के देशों का ध्यान गया। इसके बाद दुनिया भर में योग करने वालों की संख्या कई गुना बढ़ गई है। साल 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 300 मिलियन लोग योग करते हैं, इसी रिपोर्ट के अनुसार यूएस राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका में 65 की आयु से अधिक के 6.7 लोग 2017 में योग करते थे जबकि 2007 में 3.3 प्रतिशत लोग योग करते थे।

कोविड महामारी के दौरान परंपरागत चिकित्सा ने देश के भीतर ही नहीं, दुनिया भर में लोगों को रक्षा कवच की तरह कार्य किया। इसी दौरान भारत ने आधुनिक दवाओं की तरह ही परंपरागत दवाओं को लेकर दर्जन भर संस्थाओं के बीच आपसी समन्वय और सहयोग स्थापित किया है। विभिन्न तरह के अध्ययन के बाद सरकार ने परंपरागत चिकित्सा को आधार बनाते हुए राष्ट्रीय चिकित्सकीय प्रोटोकाल कोविड 2019 जारी किया। इसके अलावा कोविड के रोकथाम को लेकर आयुर्वेद आधारित दवाओं को बडे स्तर पर वितरि‍त किया गया। भारत में चिकित्सकीय पर्यटन को देखें तो साल 2016 में 4.9 प्रतिशत था जो प्रतिवर्ष बढता रहा है। साल 2020 में कोविड के बावजूद यह संख्या बढकर 6.7 प्रतिशत हो गई है। सरकार की ओर से विदशों से भारत आकर इलाज कराने वालों की सुविधा के लिए वीजा सुविधा बढाई है। प्रधानमंत्री के प्रयासों से दुनिया के अनेक देशों में आयुर्वेद की दवाओं को मान्यता प्राप्त हुई है। यह कहना उचित होगा कि बदलती विश्व व्यवस्था के साथ ही आधुनिक चिकित्सा क्षेत्र में हो रहे नए प्रयोगों के साथ भारतीय आयुर्वेद और योग ने तेजी से कदम बढाया है। जो दुनिया में भारत के लिए सॉफ्ट पावर के रूप में उभर रहा है।