पूजा निषेधात्मक प्रयत्नहीनता नहीं, साकार भावना-योग

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भावना योग का आधार प्रभु की अत्यन्त प्रेमपूर्ण प्रार्थना और हृदय से उनकी कृपादृष्टि की आकाँक्षा करते रहना  है। इस दृष्टि से यह भक्ति योग का एक अंग कहा जा सकता है।

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स्वामी ब्रह्मस्वरूपजी। प्रस्तुती- रिपोर्ट4इंडिया

मनुष्य ही ईश्वर का प्रतिरूप है जिसका आदि-अन्त उसी में होता है। हर मनुष्य के भीतर शक्तियों का प्रवाह रहता है और वह अगर दृढ़ निश्चय कर ले तो कोई भी कार्य मुश्किल नहीं। इसके लिए मनुष्य अपनी आत्मा को पहचाने, सांसारिक विषयों से बचकर निर्मल तथा शुद्ध बनाने का प्रयत्न करे। आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाने का यही माध्यम है। मनुष्य की श्रेष्ठता तभी विकसित हो सकती है जब हम शुद्ध आचार-विचार और निष्कपट आचरण से ईश्वर प्राप्ति के योग्य बना लें।

मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करने की कई विधियाँ हैं। ज्ञान, भक्ति और कर्म ये तीनों मार्ग प्रसिद्ध हैं पर इनके अलावा भी कई ऐसी विधियाँ हैं, जिनसे मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति के बल इश्वर का साक्षात्कार कर सकता है। योग ग्रन्थों में 16 प्रकार के योग हैं जिनमें राजयोग और हठयोग के सिवाय ज्ञानयोग, मन्त्रयोग, लययोग, जपयोग आदि अनेक साधन-विधियों का उल्लेख है। भावना-योग भी एक ऐसी ही साधन प्रणाली है जिसके अनुसार मनुष्य ईश्वर के परम नाम को स्मरण कर उसका साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है। हिन्दू-धर्म के नारद भक्ति -सूत्र” श्रीमद्भागवत्” आदि ग्रन्थों में इस प्रणाली का उल्लेख है। अंग्रेजी में इसे “मिस्टिसिज्म” कहा जाता है जिसका हिन्दी पर्यायवाची “रहस्य योग“ या ‘भावना योग‘ होता है। इसमें न तो राजयोग के समान प्राणायाम, धारणा, समाधि आदि जैसे गम्भीर साधन करने पड़ते हैं न हठयोग के समान षट्कर्म, आसन आदि की कठिन क्रियाओं की आवश्यकता पड़ती है। इसका आधार तो प्रभु की अत्यन्त प्रेमपूर्ण प्रार्थना करना और हृदय से उनकी कृपादृष्टि की आकाँक्षा करते रहना ही है। इस दृष्टि से इसे भक्ति योग का एक अंग कह सकते हैं।

भक्ति साधन में जिस प्रकार अपने इष्टदेव की मूर्ति की षोडशोपचार पूजा की प्रणाली विशेष रूप से चल पड़ी है वह “भावना-योग“ में आवश्यक नहीं। इसका आधार तो अपनी शुद्ध और अकृत्रिम भावना ही है, उसे चाहे जिस किसी विधि से काम में लाया जाय। यही कारण है कि “भावना-योग“ का साधन किसी एक धर्म से सम्बन्ध नहीं रखता। हिन्दू-मुसलमान, ईसाई, यहूदी आदि सभी इसे कर सकते हैं और करते हैं।

“ईश्वर और मनुष्य के बीच पुल बाँधने का कार्य प्रार्थना से होता है। मनुष्य के हृदय के भीतर चाहे दृढ़ निश्चय होवे कि ईश्वर हमको क्षमा प्रदान करेगा, चाहे उसे पूर्ण भरोसा होवे कि प्रभु कृपा हमें प्राप्त होगी, पर इतने निश्चय मात्र से काम न चलेगा। प्रार्थना ही वह जादू का कार्य है, जिससे पुल बँधता है। प्रार्थना के बिना यह चमत्कार नहीं हो सकता। इसलिये भावना-योग में प्रार्थना पर विशेष महत्त्व रखा गया है और मनुष्य की अपात्रता तथा अयोग्यता पर विशेष जोर इसलिये दिया जाता है कि उसमें अति दीनता का भाव उत्पन्न हो। प्रार्थना द्वारा जो जादू का कार्य होता है, इस दीनता-भाव की प्राप्ति से उसका निश्चय हो जाता है।

भावना योगी का प्रधान लक्षण बाह्य जगत की बातों की अपेक्षा अपने अंतर्जगत को अधिक महत्व देना होता है। उसका जीवन मुख्य रूप से अन्तः प्रवृत्ति पर ही आश्रित रहता है और बाहरी बातों से वह उन्हीं को स्वीकार करता है जो उसकी आन्तरिक भावनाओं के अनुकूल सिद्ध होती हैं। इस विषय का विवेचन में कहा गया है- “भावना-योगी और धर्मात्मा के अन्तर को भूलना नहीं चाहिए। वे दोनों धार्मिक हों और किसी एक ही पंथ या क्रिया-काण्ड में दोनों की एक सी श्रद्धा हो, पर दोनों में एक बड़ा अन्तर स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। धर्मात्मा का प्रमाण उसका पंथ, शास्त्र या उसकी क्रिया ही हैं, पर भावना योगी को ऐसे बाह्य प्रमाणों को अधिक महत्व देना योग्य नहीं जँचता। प्रचलित रूढ़ियों और नियमों के भावना योगी एक काँटा ही बना रहता है क्योंकि बाह्य प्रमाण उसे तब तक ही माननीय रहता है जब तक वह उसकी भावना के अनुकूल होता है। धर्मात्मा मनुष्य अपनी इच्छा को अपने से बड़े की इच्छा के अनुकूल बनाने को तैयार रहता है, पर भावनायोगी अपनी इच्छा का ही पालन करता है। सब प्रकार के भावना-योग मुख्यतः व्यक्तित्व-प्रधान होते हैं,पर सच्चे भावना-योग में ऐसा व्यक्तित्व रहता है जो सारे विश्व को अपने अमर आलिंगन में लिये रहता है।”

वास्तव में शुद्ध आत्मा होने पर सब का लक्ष्य एक ही रहता है और वे मार्ग की भिन्नता को जरा भी महत्व न देकर सबको आत्मस्वरूप मानते हैं। शंकराचार्य सन्त के लक्षण बतलाते हुये कहते हैं-

“के संति संतोऽखिल बीतरागाः अपास्तमोहाः शिव तत्व निष्ठाः”।

अर्थात्-”संत कौन है? जिनके सब राग और मोह निकल गये हैं और जो शिवतत्त्व (ईश्वर तत्त्व) के चिन्तन में सदैव लगे रहते हैं वे ही संत हैं।” यह भावना योगी की मान्यता और भावना होती है।

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