बंगाल ‘हिन्दू नरसंहार’: अब कोई न बोले की …’लब आज़ाद हैं तेरे’

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बीजेपी के विरोध में चुनाव के दौरान ममता के ईशारे पर तुष्टीकरण के गिद्ध अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार जैसे नेता और हिन्दू हृदय सम्राट बाल ठाकरे के वारिस उद्धव ठाकरे भी समर्थन में खड़े हुए थे। आज हिंसा के तांडव पर मुंह बंद कर रखे हैं। 

बीजेपी को सत्ता से रोकने को मतांध राहुल गांधी व वामदल टीएमसी के पक्ष में चुनाव से ही पलायन कर गये थे

डॉ. मनोज तिवारी/ रिपोर्ट4इंडिया/ नई दिल्ली।

पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजे आने के बाद जिस प्रकार से बीजेपी समर्थकों यानी हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है, औरतों को रेप किया जा रहा, घरों में आग लगाई जा रही है, दुकानें व अन्य व्यवसायिक संस्थान लूटे जा रहे हैं, वह लोकतांत्रिक कहे जाने वाले इस देश को शर्म से डूब मरने जैसा है। इस लोकतंत्र से सौ गुणा बेहतर राजतंत्र व तानाशाही व्यवस्था है। कम से कम लोकतंत्र में चुनावी खेल के बाद इस तरह अपने ही देश में बहुसंख्यक हिन्दुओं को मरने और प्रताड़ित करने का मौका नहीं मिलता। एक राजा या तानाशाह के ईशारे पर सबकुछ होता, लोगों के सामने अपने अधिकार और कर्तव्य का एक स्पष्ट दायरा तो रहता।

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में बीजेपी को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों जिसमें अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव, सोनिया गांधी, वामदलों के नेताओं, उद्धव ठाकरे, संजय राउत, शरद पवार आदि नेताओं से समर्थन मांगा था और इन सभी लोगों और नेताओं ने उन्हें सपोर्ट किया था। अब बंगाल में जिस प्रकार से एक पार्टी के हिन्दू धर्म के नेताओं को मारा जा रहा है, इस पूरे कु-कृत्य पर मौन साधे हुए हैं। देश भर के हिन्दुओं को इन सभी नेताओं और उनकी पार्टियों से पूछा जाना चाहिए कि इस हिंसा पर वे मौन क्यों हैं। उनकी आवाज़ क्यों नहीं निकल पा रही है। क्या देश के हिन्दुओं की औकात यही रह गई है।

भारत की राजनीति से भी यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि आखिरकार मुसलमानों की आपराधिक मांग और उनके तांडव में लाखों-करोड़ों हिन्दुओं के मारे जाने के बाद संयुक्त भारत का एक चौथाई से ज्यादा करीब साढ़े नौ लाख  वर्ग किलोमीटर का भू-भाग मुसलमानों के लिए पाकिस्तान व बांग्लादेश के रूप में दे दिया गया तो फिर वो कौन-सी राजनीति है, जहां पर आज देश फिर उसी चौराहे पर खड़ा हो गया है, जहां से हिन्दुओं के फिर मारे जाने का वातावरण तैयार हो गया है। पश्चिम बंगाल इसका जीता-जागता उदाहरण है।

बंगाल में हिंसा का नग्न तांडव के बाद कट्टरपंथी यह जताने कि हिमाकत कर रहे हैं कि हमारी अब ताकत इतनी हो गई है कि इस देश की राजनीति को हम जिधर चाहे उधर मोड़ सकते हैं। यानी, वे सीधे तौर पर ‘गजवा-ए-हिन्द’ व देश की शासन-प्रणाली के इस्लामीकरण की फलसफा को समझा रहे हैं।

याद रखिए, ये तुष्टिकरण की राजनीति के सहारे फिलहाल सत्ता में बैठने वाले अखिलेश, मुलायम, तेजस्वी, राहुल, शरद पवार, केजरीवाल आदि तभी तक सत्ता में जबतक हिन्दू बहुसंख्यक है। क्या हिन्दुओं की राजनीतिक शक्ति क्षीण होने पर ये नेता सत्ता पर काबिज़ हो सकते हैं?….कभी नहीं। अत: भारत में लोकतंत्र सीधे तौर पर हिन्दुओं को नष्ट करने का साधन बनकर रह गया है। और यही बात, एक-दूसरे तरीके से औवैसी बता रहे हैं कि मुसलमानों की ताकत किसी को सपोर्ट कर कुर्सी पर बैठाने की नहीं, सीधे सत्ता पर काबिज़ होने की है।

ध्यान रखिए…बंगाल की ताज़ा हिंसा सीधी गवाही है कि चेतने का समय भी निकला जा रहा है। प्रधानमंत्री से गुजारिश है कि वे इस ‘तथाकथित लोकतंत्र’ और ‘सुप्रीम कोर्ट’ कि चिंता किए बगैर ठोस कदम उठाएं। जब सभी विपक्षी पार्टियां बीजेपी को हिन्दुओं की पार्टी होने का राग अलापकर मुसलमानों को अपने पाले में एकजुट करती है और साथ ही, हिंसा का तांडव भी करती है। फिर आपको हिन्दुओं के नेता होने की स्वीकारोक्ति से शर्म कैसा? सबका साथ, सबका विश्वास और सबका विकास की बात बिल्कुल बेमानी है। जब कांग्रेस मुसलमानों का वोट-सपोर्ट लेकर भी उन्हें ‘गटर’ में पड़े रहने को जायज ठहराती है और अपने को सामाजिक नहीं राजनीतिक पार्टी बताती है। …फिर आप पर तो मुसलमानों का वोट लेने का दोष भी नहीं है। आपसे निवेदन है कि आप अटल बिहारी वाजपेयी की आदर्शवादिता के खांचे में अपने को न ढाले जो आप पर राष्ट्रधर्म नहीं निभाने का ‘तोहमत’ लगाते हैं। आपका राष्ट्रधर्म वहीं है, जिसपर आप खड़े हुए हैं।

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